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23:34 IST

हरियाणा के 68 साल के मरीज के गले के कैंसर का लेजर से मुंह के रास्ते ऑपरेशन

हेड एंड नेक कैंसर इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया (HNCII) के डॉ. कनव कुमार के मुताबिक गले के निचले हिस्से के शुरुआती कैंसर में ट्रांसओरल लेजर माइक्रोसर्जरी की गई और मरीज को अगली सुबह घर भेज दिया गया।

हरियाणा के 68 साल के मरीज के गले के कैंसर का लेजर से मुंह के रास्ते ऑपरेशन तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

हरियाणा के रहने वाले एक 68 साल के शख्स को गले में लगातार बेचैनी महसूस हो रही थी। उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि यह तकलीफ कैंसर की वजह से हो सकती है। जांच हुई तो गले के निचले हिस्से यानी हायपोफेरिंक्स में कैंसर निकला, और वह भी शुरुआती स्टेज में। हायपोफेरिंक्स गले का वह हिस्सा है जो स्वरयंत्र (लैरिंक्स) के पीछे होता है।

खबर में बताया गया है कि दुनिया के कई हिस्सों के मुकाबले भारत में हायपोफेरिंजियल कैंसर के मामले ज्यादा हैं। तंबाकू और शराब का सेवन इस कैंसर के अहम रिस्क फैक्टर हैं।

ऐसे कैंसर के इलाज में रेडिएशन थेरेपी एक अहम विकल्प है। इसके लिए मरीजों को कई हफ्तों तक हफ्ते में पांच दिन कैंसर सेंटर जाना पड़ सकता है। कुछ मामलों में रेडिएशन के साथ कीमोथेरेपी भी दी जाती है, और इन इलाजों के काफी साइड इफेक्ट भी हो सकते हैं।

इस मरीज को इलाज का एक और विकल्प दिया गया, ट्रांसओरल लेजर माइक्रोसर्जरी, यानी मुंह के रास्ते लेजर की मदद से की जाने वाली बारीक सर्जरी। यह जानकारी हेड एंड नेक कैंसर इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया (HNCII) के कंसल्टेंट सर्जिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. कनव कुमार ने दी।

यह कम से कम चीरफाड़ वाली सर्जरी है। इसमें ऑपरेटिंग माइक्रोस्कोप की मदद से मुंह के रास्ते कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) लेजर इस्तेमाल किया जाता है। माइक्रोस्कोप से गांठ बड़ी और साफ दिखती है, इसलिए आसपास के सामान्य टिशू को जितना हो सके बचाते हुए गांठ को बहुत सटीक तरीके से निकाला जा सकता है।

स्वरयंत्र (आवाज बनाने वाला हिस्सा) और हायपोफेरिंक्स के कुछ शुरुआती स्टेज के कैंसर में इस तकनीक से बोलने और निगलने जैसे जरूरी कामों पर खास असर डाले बिना कैंसर निकालना मुमकिन हो सकता है।

इस सर्जरी का एक व्यावहारिक फायदा यह बताया गया है कि सही मरीज चुने जाएं तो कई हफ्ते रोज अस्पताल जाने की जरूरत टालना संभव है। कैंसर का इलाज एक ही सर्जरी से हो सकता है। जो मरीज कैंसर सेंटर से दूर रहते हैं या जिनके लिए काम और घर की जिम्मेदारियों से हफ्तों का वक्त निकालना मुश्किल है, उनके लिए यह विकल्प खास तौर पर फायदेमंद हो सकता है।

यह सर्जरी गर्दन पर बाहर से चीरा लगाए बिना मुंह के रास्ते की जाती है। कई मरीज ऑपरेशन के बाद जल्दी खाना शुरू कर सकते हैं, और उन्हें लंबे वक्त तक कृत्रिम पोषण या सांस के लिए सहारे की जरूरत पड़े, यह जरूरी नहीं।

एक और संभावित फायदा यह है कि चुने हुए मरीजों में कैंसर दोबारा लौटे तो कभी-कभी दूसरी बार लेजर सर्जरी से इलाज मुमकिन होता है। इसके उलट, रेडिएशन के बाद कैंसर लौटे तो इलाज ज्यादा पेचीदा हो सकता है। कैंसर की जगह और फैलाव के हिसाब से कुछ मरीजों को बड़े ऑपरेशन की भी जरूरत पड़ सकती है।

ट्रांसओरल लेजर माइक्रोसर्जरी गले या स्वरयंत्र के हर तरह के कैंसर के लिए सही हो, यह जरूरी नहीं। सर्जरी या रेडिएशन में से सही इलाज चुनने से पहले गांठ की प्रकृति और मरीज की हालत का ध्यान से मूल्यांकन करना जरूरी होता है। इस प्रक्रिया के लिए खास उपकरण, ऑपरेटिंग माइक्रोस्कोप और इस तकनीक में प्रशिक्षित, अनुभवी सर्जन चाहिए। HNCII में सही मरीजों को यह इलाज देने के लिए जरूरी सुविधाएं और विशेषज्ञता मौजूद है।

डॉ. कनव कुमार ने बताया, "इस मामले में गर्दन पर बाहर से चीरा लगाए बिना मुंह के रास्ते कैंसर निकाला गया। ऑपरेशन के बाद मरीज जल्दी खाना खाने लगे और करीब 24 घंटे बाद, दूसरे दिन सुबह उन्हें अस्पताल से घर भेज दिया गया। बाद की जांचों में उनकी सेहत अच्छी पाई गई।"

इस मरीज के लिए इस इलाज का मतलब सिर्फ कैंसर निकालना नहीं था। बोलने और निगलने जैसे जरूरी काम जितना हो सके बचाए रखना और रोजमर्रा की जिंदगी में कम से कम रुकावट के साथ अपनी आम दिनचर्या में लौटने का मौका देना भी इसका मकसद था।

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