शनिवार, 31 अक्टूबर 2026

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हनुमानजी के माता-पिता अंजनी और वानरराज केसरी की कथा

हनुमानजी के माता-पिता अंजनी और वानरराज केसरी की कथा तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
कल्चर PT24 टीम

हनुमानजी को अंजनीसुत और केसरीनंदन भी कहा जाता है। जानिए माता अंजनी और वानरराज केसरी के बारे में बताई जाने वाली कथा।

हिंदू धर्म में भगवान हनुमान को शक्ति, भक्ति, बुद्धि और समर्पण का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है। रामभक्त हनुमान माता अंजनी (अंजना) और वानरराज केसरी के बेटे थे। इसी वजह से उन्हें 'अंजनीसुत' यानी अंजनी का बेटा और 'केसरीनंदन' यानी केसरी का बेटा भी कहा जाता है। उनके जन्म और माता-पिता की कथा को बेहद पवित्र और प्रेरणा देने वाली बताया गया है।

कथा के मुताबिक माता अंजनी पिछले जन्म में स्वर्ग की एक बहुत सुंदर अप्सरा थीं, जिनका नाम 'पुंजिकस्थला' था। एक ऋषि के श्राप की वजह से उन्हें धरती पर वानर रूप में जन्म लेना पड़ा। हालांकि ऋषि ने उन्हें आशीर्वाद भी दिया कि उनकी कोख से एक बहुत पराक्रमी और अमर बेटा पैदा होगा, और उसी से उन्हें श्राप से मुक्ति मिलेगी।

वानरराज केसरी से शादी के बाद अंजनी ने संतान पाने के लिए जंगल में भगवान शिव की कठोर तपस्या की। उनकी भक्ति से खुश होकर शिव ने उन्हें बेटे का आशीर्वाद दिया। उसी समय अयोध्या के राजा दशरथ पुत्र की चाहत में 'पुत्रकामेष्टी यज्ञ' कर रहे थे। यज्ञ से मिली खीर का एक हिस्सा, यानी प्रसाद, एक चील उठा ले गई। पवनदेव (वायु) की मदद से वह प्रसाद तपस्या कर रहीं माता अंजनी के हाथ में आ गिरा। अंजनी ने उसे ग्रहण किया और उसी से हनुमानजी का जन्म हुआ। इसीलिए हनुमानजी को 'पवनपुत्र' या 'वायुपुत्र' भी कहा जाता है।

अब बात वानरराज केसरी की। वे हनुमानजी के पिता थे और एक महान, पराक्रमी वानर योद्धा माने जाते हैं। केसरी सुमेरू पर्वत के राजा थे। वे बहुत बलवान, बहादुर और धार्मिक स्वभाव के थे। उन्हें 'केसरी' नाम मिलने के पीछे भी एक कथा है। उन्होंने जंगल में 'शंभसादन' नाम के एक खतरनाक और हिंसक राक्षस को मारा था, जो हाथी जितना ताकतवर था। इसी पराक्रम की वजह से उन्हें 'केसरी' की पदवी मिली, जिसका मतलब सिंह होता है।

वानरराज केसरी भी भगवान शिव के परम भक्त थे। उन्होंने और माता अंजनी ने मिलकर शिव की आराधना की थी। कथा में कहा गया है कि इसी आराधना के बाद भगवान शिव ने खुद उनके घर हनुमानजी (रुद्रावतार) के रूप में जन्म लिया।

हनुमानजी के जन्म के बाद माता अंजनी को श्राप से मुक्ति मिल गई और वे फिर स्वर्ग लौट गईं। इसके बाद वानरराज केसरी ने हनुमानजी की परवरिश की। सूरज को फल समझकर निगल लेने जैसी हनुमानजी की बचपन की कई लीलाओं और पराक्रम में माता-पिता का साया और उनके संस्कार अहम रहे।

कुल मिलाकर, माता अंजनी की गहरी भक्ति और वानरराज केसरी की बहादुरी के मेल से ही हनुमानजी जैसे महापराक्रमी, बुद्धिमान और संकटमोचक बेटे का जन्म हुआ। आज हनुमानजी में जो शौर्य, शक्ति और भक्ति के गुण दिखते हैं, वे उन्हें माता-पिता से विरासत में मिले माने जाते हैं।

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