हड्डियों की सेहत का पता फ्रैक्चर के बाद चलता है, सरकारी अस्पतालों में साल भर में साढ़े तीन हजार जांच
विश्व ऑस्टियोपोरोसिस दिवस पर हड्डियों की घनता की जांच का सवाल सामने आया है। सरकारी अस्पतालों की मौजूदा सुविधा में बीते साल भर में करीब साढ़े तीन हजार जांच हुईं।
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हड्डियां भुरभुरी होने की बीमारी ऑस्टियोपोरोसिस अक्सर कोई साफ लक्षण दिखाए बिना बढ़ती रहती है। मरीज को इसका पता चलते-चलते हड्डी में फ्रैक्चर हो चुका होता है। इसलिए फ्रैक्चर का इंतजार किए बिना हड्डियों की घनता की जांच करना और वक्त पर इलाज शुरू करना जरूरी बताया गया है।
आज विश्व ऑस्टियोपोरोसिस दिवस के मौके पर हड्डियों की सेहत का यह मुद्दा फिर सामने आया है। सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध सुविधा के तहत पिछले एक साल में करीब साढ़े तीन हजार जांच की गई हैं। इनमें लगभग 70 फीसदी महिलाएं और 30 फीसदी पुरुष शामिल हैं।
ऑस्टियोपोरोसिस में हड्डियों की घनता कम हो जाती है, जिससे हड्डियां कमजोर और भुरभुरी हो जाती हैं। नतीजा यह कि मामूली गिरने या रोजमर्रा की सीधी-सादी हरकतों से भी फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है। इस बीमारी की पहचान के लिए डेक्सा स्कैनिंग मशीन से हड्डियों की घनता जांची जाती है। मुंबई में केईएम और नायर, इन दो महानगरपालिका अस्पतालों में यह सुविधा है। निजी अस्पतालों में डेक्सा स्कैनिंग पर आम तौर पर चार से पांच हजार रुपये का खर्च आता है।
नायर अस्पताल के एंडोक्राइनोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. निखिल भागवत ने एक मामले का जिक्र किया। उनके मुताबिक 58 साल के एक पुरुष मरीज की जांच में यह खतरा साफ हुआ। उसका एक्स-रे लगभग सामान्य दिख रहा था और हड्डियों की घनता की जांच भी ज्यादा खराब नहीं थी। लेकिन रीढ़ के फ्रैक्चर देखने के लिए वर्टेब्रल फ्रैक्चर असेसमेंट किया गया तो रीढ़ में 25 से 30 फीसदी कॉम्प्रेशन फ्रैक्चर मिला। इसके बाद दवा, कसरत और फिजियोथेरेपी शुरू की गई। साल भर बाद हुए स्कैन में सुधार दिखा। डॉ. भागवत के अनुसार सिर्फ हड्डियों की घनता की रिपोर्ट देखना काफी नहीं है, रीढ़ में छिपे फ्रैक्चर की जांच भी अहम है।
उम्र बढ़ रही है और जीवनशैली बदल रही है, इसलिए ऑस्टियोपोरोसिस जैसी गैर-संक्रामक बीमारियों को गंभीरता से लेने की जरूरत बताई गई है। खास तौर पर महिलाओं में माहवारी बंद होने के बाद हड्डियों की घनता घटने का खतरा बढ़ जाता है। फिर भी लोगों में इस बीमारी को लेकर अब तक काफी जागरूकता नहीं है। कई बार डॉक्टर के जांच सुझाने के बाद ही मरीज जांच कराते हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक माहवारी बंद हो चुकी महिलाओं, हड्डियां भुरभुरी होने का खतरा झेल रहे पुरुषों और बुजुर्गों को डॉक्टर की सलाह से हड्डियों की घनता की जांच करानी चाहिए। बीमारी पकड़ में आने पर मरीज की हालत के हिसाब से दवा, इंजेक्शन, कसरत और फिजियोथेरेपी से इलाज किया जा सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि वक्त पर पहचान और इलाज से खतरा कम करने में मदद मिलती है, क्योंकि फ्रैक्चर के बाद चलने-फिरने पर पाबंदी आ जाती है और गंभीर असर हो सकता है।
डॉ. निखिल भागवत ने कहा कि ऑस्टियोपोरोसिस अक्सर लक्षण दिखाए बिना बढ़ने वाली बीमारी है और महिलाओं में माहवारी बंद होने के बाद हड्डियां भुरभुरी होने का खतरा बढ़ जाता है। उनके मुताबिक इसलिए वक्त पर घनता की जांच जरूरी है, और सही समय पर पहचान और इलाज से फ्रैक्चर का खतरा घटाकर मरीज की जिंदगी की गुणवत्ता बनाए रखी जा सकती है।