घाटटेमनी में सारस बचाने और प्राकृतिक खेती का देश का पहला पायलट प्रोजेक्ट, गोंदिया में ट्रेनिंग
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गोंदिया के आमगाव तालुका के घाटटेमनी गांव में सारस के घर वाले करीब 100 एकड़ खेत में सारस संरक्षण और प्राकृतिक खेती का देश का पहला संयुक्त पायलट प्रोजेक्ट चलाने की योजना है।
गोंदिया, 30 अक्टूबर: गोंदिया जिले में सारस पक्षियों को बचाने, उनके प्राकृतिक आवास की हिफाजत करने और पर्यावरण के अनुकूल टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने के लिए एक जिलास्तरीय ट्रेनिंग हुई। यह कार्यक्रम सारस आवास क्षेत्र के किसानों के लिए 'सारस पक्षी संवर्धन व प्राकृतिक खेती' विषय पर रखा गया था। इसे मित्रा, जिला प्रशासन और गुजरात प्राकृतिक खेती विज्ञान विश्वविद्यालय ने मिलकर आयोजित किया। कलेक्टर कार्यालय के जिला नियोजन समिति सभागार में यह कार्यक्रम सफलतापूर्वक पूरा हुआ।
ट्रेनिंग में मुंबई में मुख्यमंत्री कार्यालय के वरिष्ठ सलाहकार (कृषि) डॉ. परशराम पाटील ने मार्गदर्शन किया। उनके अलावा अतिरिक्त जिलाधिकारी अभिजीत घोरपडे, उप वन संरक्षक पवन जोंग, जिला अधीक्षक कृषि अधिकारी और आत्मा के परियोजना संचालक निलेश कानवडे, गुजरात प्राकृतिक खेती विज्ञान विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ. स्वप्निल देशमुख और डॉ. रघुनंदन बी. एल. तथा मित्रा के प्रतिनिधि विनय झोटे ने भी किसानों को जानकारी दी। बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी (BNHS) के मुकुंद धुर्वे, सेवा संस्था के सावन बहेकर और मित्रा के प्रतिनिधि तेजस बनकर भी मौजूद थे।
मुख्यमंत्री की सोच के मुताबिक अगले दो साल में राज्य के 25 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में प्राकृतिक खेती फैलाने का लक्ष्य है। इसी दिशा में गोंदिया जिले में अहम कदम उठाया जा रहा है। आमगाव तहसील के घाटटेमनी गांव में, जहां सारस रहते हैं, करीब 100 एकड़ खेती के इलाके में सारस संरक्षण और प्राकृतिक खेती का देश का पहला संयुक्त पायलट प्रोजेक्ट चलाने की योजना बनी है। इसमें किसानों की आमदनी, मिट्टी की सेहत, जैव विविधता और सारस के आवास को एक साथ देखा जाएगा।
प्रोजेक्ट को आगे चलाने, उस पर नियमित नजर रखने और जरूरी मार्गदर्शन के लिए गोंदिया के जिलाधिकारी की अध्यक्षता में जिलास्तरीय प्राकृतिक खेती समिति बनाई गई है। यह समिति अलग-अलग विभागों के बीच तालमेल बिठाएगी और प्रोजेक्ट की रफ्तार, किसानों की भागीदारी और मैदानी कामों की समय-समय पर समीक्षा करेगी।
उम्मीद है कि इससे सारस के आवास के साथ स्थानीय जैव विविधता को बढ़ावा मिलेगा। रासायनिक चीजों पर निर्भरता घटने से किसानों का उत्पादन खर्च भी बचने की उम्मीद है। प्रोजेक्ट में BNHS और सेवा (SEWA) संस्था सक्रिय हिस्सा लेंगी। मुख्यमंत्री कार्यालय, मित्रा मुंबई, जिला प्रशासन, कृषि विभाग, आत्मा और वन विभाग भी तालमेल से इसमें शामिल रहेंगे।
तकनीकी मार्गदर्शन के लिए महाराष्ट्र सरकार की संस्था 'मित्रा' ने गुजरात के हलोल स्थित गुजरात प्राकृतिक खेती विज्ञान विश्वविद्यालय के साथ समझौता किया है। इस विश्वविद्यालय को प्राकृतिक खेती को समर्पित दुनिया का पहला विश्वविद्यालय माना जाता है। इसके विशेषज्ञों से प्राकृतिक खेती के तरीके, जैविक निविष्टियां, मिट्टी की सेहत, प्रदर्शन और किसानों की क्षमता बढ़ाने पर मार्गदर्शन मिलेगा।
ट्रेनिंग की शुरुआत में निलेश कानवडे ने कार्यक्रम की प्रस्तावना रखी और गोंदिया जिले में सारस संरक्षण और प्राकृतिक खेती के लिहाज से ट्रेनिंग की जरूरत समझाई। डॉ. परशराम पाटील ने सारस संरक्षण की पृष्ठभूमि, जैव विविधता की अहमियत और प्राकृतिक खेती की भूमिका पर बात की। उन्होंने कहा कि सारस को बचाते समय खेती के पूरे तंत्र, पानी वाले इलाकों और स्थानीय जैव विविधता को साथ में देखना जरूरी है।
उप वन संरक्षक पवन जोंग ने सारस के आवास की जरूरतें, उनके वजूद के सामने मुख्य खतरे और पानी वाले इलाकों व खेती के परिसर की हिफाजत पर जानकारी दी। उन्होंने साफ किया कि सारस के संरक्षण के लिए वन विभाग, कृषि विभाग, स्थानीय संस्थाओं और किसानों का तालमेल अहम है। अतिरिक्त जिलाधिकारी अभिजीत घोरपडे ने सारस संरक्षण और प्राकृतिक खेती, दोनों को एकजुट नजरिए से देखने की अहमियत बताई। उन्होंने जैव विविधता की सुरक्षा और टिकाऊ खेती के विकास के लिए विभागों के तालमेल और किसानों की सक्रिय भागीदारी पर जोर दिया।
तकनीकी सत्र में गुजरात प्राकृतिक खेती विज्ञान विश्वविद्यालय के सह प्राध्यापक डॉ. स्वप्निल देशमुख ने प्राकृतिक खेती के बुनियादी सिद्धांत, फसल की योजना, बीज की व्यवस्था, रासायनिक चीजों का इस्तेमाल घटाना और मिट्टी व खेती के परिसर की सेहत सुधारने पर विस्तार से बताया। इसी विश्वविद्यालय के सह प्राध्यापक डॉ. रघुनंदन बी. एल. ने प्राकृतिक खेती में जैविक निविष्टियों, मिट्टी की सेहत, जमीन की उर्वरता और पर्यावरण के अनुकूल खेती के प्रबंधन की तकनीकी जानकारी दी।
प्रोजेक्ट की पूर्व तैयारी के तौर पर 28 अक्टूबर को घाटटेमनी (आमगाव तहसील) और झिलमिली (गोंदिया तहसील) इलाके में सारस के आवास, पानी वाले क्षेत्रों और प्राकृतिक खेती के इलाकों का अध्ययन करने के लिए क्षेत्र दौरा तय किया गया था। इसका मकसद स्थानीय खेती के तरीकों, सारस के आवास और जैव विविधता के आपसी रिश्ते को समझना था।
पायलट प्रोजेक्ट में करीब 40 हेक्टेयर (लगभग 100 एकड़) क्षेत्र के 40 खातेदार किसान शामिल होंगे। योजना है कि यह प्रोजेक्ट एक साल में तीन फसल मौसमों के लिए चलाया जाए। प्रस्तावित बातों में तीनों मौसमों के लिए बीज, खेती के औजार और दूसरी जरूरी निविष्टियों के लिए आर्थिक मदद शामिल है। हर पांच किसानों पर एक के हिसाब से किसानों के मालिकाना हक वाले जैविक निविष्टि संसाधन केंद्र (BRC) बनाए जाएंगे। हर किसान को ज्यादा से ज्यादा दो देसी गायों के पालन के लिए प्रोत्साहन के तौर पर आर्थिक मदद देने का भी प्रस्ताव है।
सारस संरक्षण के लिए लोहे के स्थायी सूचना व जागरूकता फलक लगाने और प्रचार सामग्री उपलब्ध कराने की बात है। मिट्टी में जैविक कार्बन (OC) और सूक्ष्मजीवों की संख्या जांचने के लिए नमूने इकट्ठा कर उनका विश्लेषण होगा। कीटनाशक के अवशेष की जांच के लिए भी नमूने लेकर टेस्ट किए जाएंगे। प्राकृतिक खेती के प्रमाणीकरण, किसान उत्पादक संस्था (FPO) की स्थापना और क्षमता बढ़ाने, किसानों की ट्रेनिंग, प्रदर्शन और अध्ययन दौरों की भी योजना है।
प्रोजेक्ट को आसान बनाने, निगरानी, मूल्यांकन, दस्तावेजीकरण, ब्रांडिंग, पैकेजिंग और मार्केटिंग के कामों में सेवा संस्था का सहयोग प्रस्तावित है। सारस की निगरानी, संरक्षण के नतीजों के मूल्यांकन और केस स्टडी के दस्तावेजीकरण में BNHS शामिल रहेगी।
इस प्रस्तावित प्रोजेक्ट के सिलसिले में मुख्यमंत्री कार्यालय की टीम ने घाटटेमनी गांव जाकर स्थानीय किसानों से बात की। सारस के आवास वाले खेतों की मौजूदा हालत, प्राकृतिक खेती अपनाने, किसानों की अपेक्षाओं और प्रोजेक्ट के अमल के लिए जरूरी बातों की जानकारी ली गई।
ट्रेनिंग के दौरान सारस संरक्षण में समुदाय की भागीदारी, किसानों में जागरूकता, प्राकृतिक खेती के विस्तार, जैव विविधता की सुरक्षा और विभागों के तालमेल पर खास जोर रहा। कृषि विभाग, आत्मा, BNHS और सेवा (SEWA) संस्थाओं की भागीदारी से सामुदायिक संरक्षण के अलग-अलग पहलुओं पर चर्चा हुई। कार्यक्रम के आखिर में प्रतिभागियों की राय ली गई और आत्मा गोंदिया के उप परियोजना संचालक रुपेश मेश्राम ने मौजूद मान्यवरों, मार्गदर्शक वैज्ञानिकों, अधिकारियों और किसानों का आभार माना।
ट्रेनिंग के बाद जिला प्रशासन और गुजरात प्राकृतिक खेती विज्ञान विश्वविद्यालय के प्रतिनिधियों के साथ गोंदिया जिले में प्राकृतिक खेती की मौजूदा स्थिति, मैदानी अमल, तकनीकी मदद, क्षमता बढ़ाने, प्रदर्शन और आगे के सहयोग के मौकों पर बातचीत हुई। गोंदिया जिले में सारस संरक्षण और प्राकृतिक खेती को फैलाने के साझा प्रयासों को दिशा देने वाला यह कार्यक्रम अहम रहा।
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