एआई के जमाने में बच्चों को सिखाएं ये 10 बातें, वरना हाल अभिमन्यु जैसा होगा
पुणे के शिक्षाविद प्रणीत मुंगाली के मुताबिक एआई के साथ बच्चों को इंसानी मूल्य भी सिखाने होंगे, वरना उनकी हालत अभिमन्यु जैसी हो सकती है।
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
आज शायद ही कोई क्षेत्र बचा हो जहां एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल न हो रहा हो। स्कूल और पढ़ाई भी इससे अछूते नहीं हैं। जैसे-जैसे तकनीक हमारी जिंदगी में फैल रही है, विद्यार्थियों और पालकों के मन में सवाल उठ रहा है कि क्या एआई इंसानों और स्कूलों की जगह ले लेगा। क्लास में बैठकर पढ़ना और ब्लैकबोर्ड पर समझना क्या पुराना हो गया है? इस चुनौती को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
संस्कृति ग्रुप ऑफ स्कूल्स, पुणे के ट्रस्टी और शिक्षाविद प्रणीत मुंगाली का कहना है कि एआई किसी वरदान से कम नहीं है। लेकिन इसे वरदान बनाए रखना आज के युवाओं और पूरी शिक्षा व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी परीक्षा है। वे महाभारत में अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र चलाने और उसके नतीजों की कहानी का हवाला देते हैं। उनके मुताबिक कहानी यही सिखाती है कि किसी भी ताकत को इस्तेमाल करने से पहले उसकी समझ होनी चाहिए। यही नियम आज एआई पर भी लागू होता है। मुंगाली ने बताया कि स्कूलों को बच्चों में ये 10 खास हुनर विकसित करने चाहिए।
पहली बात, बच्चों को साफ समझाना होगा कि एआई मंजिल नहीं, मंजिल तक पहुंचने का साधन है। तकनीक से अपनी क्षमता बढ़ानी चाहिए, सोचने का काम उसके हवाले नहीं करना चाहिए। जरूरत और चाहत का फर्क समझना ही असली समझदारी है।
दूसरी बात, भावना और संवेदनशीलता। मशीनें कितनी भी स्मार्ट हो जाएं, किसी के आंसू या दर्द को महसूस नहीं कर सकतीं। बच्चों में करुणा, सहानुभूति और टीमवर्क की भावना जगाना जरूरी है। जब विद्यार्थी मिलकर प्रोजेक्ट पर काम करते हैं, तो वे दूसरों का नजरिया समझना सीखते हैं। यह किसी रोबोट या अल्गोरिदम के बस की बात नहीं।
तीसरी बात, तर्क और क्रॉस-चेकिंग की आदत। अधूरा ज्ञान हमेशा खतरनाक होता है। एआई के हर जवाब पर आंख मूंदकर भरोसा करने के बजाय बच्चों में सवाल पूछने की आदत डालनी होगी। वे तथ्य जांचें, तर्क की कसौटी पर परखें और फिर खुद फैसला लें। तभी उनमें आत्मनिर्भरता आएगी।
चौथी बात, तकनीक दोधारी तलवार है। विज्ञान की हर खोज की तरह एआई का सही इस्तेमाल इंसानों की भलाई के लिए वरदान बन सकता है, जबकि गलत इस्तेमाल तबाही की वजह बन सकता है। बच्चों को लक्ष्मणरेखा खींचना सीखना चाहिए कि कहां तकनीक का इस्तेमाल करना है और कहां अपने दिमाग का।
पांचवीं बात, लीक से हटकर सोचने वाली रचनात्मकता। एआई अक्सर वही जवाब देता है जो उसके डेटा में डाला गया हो। असली पढ़ाई घिसे-पिटे दायरे से बाहर सोचने में है। कल्पनाशक्ति और क्रिएटिविटी बढ़ने से बच्चे नए हल खोज सकेंगे और हर चीज की गहराई में जाकर खुद नए सवाल खड़े कर सकेंगे।
छठी बात, नकारात्मकता को सकारात्मक ऊर्जा में बदलना। मुश्किलें जिंदगी का हिस्सा हैं। मशीन फेल होने पर एरर मैसेज दिखाती है, पर इंसान गिरकर फिर संभलना जानता है। स्कूलों का माहौल ऐसा हो जहां नाकामी को डर नहीं, बल्कि सीखने और खुद को बेहतर बनाने के नए मौके की तरह देखा जाए।
सातवीं बात, जिंदगी भर सीखने का शौक। बदलती दुनिया में डिग्रियां कुछ साल बाद पुरानी हो जाती हैं, लेकिन सीखने की कला हमेशा काम आती है। बच्चों में रोज कुछ नया जानने की उत्सुकता और भूख बनी रहनी चाहिए, ताकि वे हर दौर के बदलाव के साथ खुद को ढाल सकें।
आठवीं बात, दिमागी विकास के साथ मानसिक और व्यावहारिक शिक्षा। रटने के पुराने तरीके से सिर्फ किताबी कीड़ा बना, उससे कभी किसी की शख्सियत नहीं बनी। बच्चों के मनोविज्ञान को समझते हुए उनकी मानसिक और भावनात्मक जरूरतों पर ध्यान देना होगा। किताबी ज्ञान के साथ दुनिया की व्यावहारिक समझ देना आज की सबसे बड़ी जरूरत है।
नौवीं बात, आत्मनियंत्रण और डिजिटल डिटॉक्स। किस चीज का कितना इस्तेमाल करना है, इसका रिमोट कंट्रोल अपने ही हाथ में होना चाहिए। बच्चों में आत्मनियंत्रण जरूरी है, ताकि वे तय कर सकें कि कब स्क्रीन से दूर रहना है और कब अपनी कुदरती समझ से काम लेना है।
दसवीं बात, बुनियादी इंसानी मूल्यों से कभी समझौता नहीं। सच, ईमानदारी, मेहनत और परोपकार जैसे मूल्य कभी पुराने नहीं होते। प्रणीत मुंगाली के मुताबिक अगर हमने बच्चों को आधुनिक तकनीक सिखाई, लेकिन इंसानी मूल्य नहीं दिए, यानी एआई के साथ ये 10 मूल्य नहीं सिखाए, तो उनकी हालत अभिमन्यु जैसी हो जाएगी।
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