डोवाल और वांग यी की बीजिंग बैठक में आठ मुद्दों पर सहमति, सीमा का अंतिम फैसला अभी बाकी
बीजिंग में विशेष प्रतिनिधियों की 25वीं बैठक में भारत और चीन आठ मुद्दों पर राजी हुए, पर सीमांकन अब भी अटका है।
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भारत और चीन के बीच सीमा का सवाल सिर्फ नक्शे पर लकीर खींचने का मामला नहीं है। यह एशिया की दो बड़ी ताकतों के बीच रणनीतिक खींचतान का केंद्र बन गया है। दो दशक से ज्यादा वक्त से दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधि इसका हल निकालने के लिए बातचीत करते आ रहे हैं।
25 अगस्त 2026 को बीजिंग में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच 25वीं अहम बैठक हुई। इसमें आठ अहम मुद्दों पर सहमति बनी। फिर भी जमीन पर सीमा का अंतिम सीमांकन और विवादित इलाकों पर दावे अब तक तय नहीं हुए हैं।
दूसरी तरफ इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस (ITBP) के महानिदेशक शत्रुघ्न कपूर (शत्रुजीत कपूर) ने अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हाल में हुई झड़पों और चल रहे तनाव की जानकारी दी है। यानी कूटनीति के स्तर पर बनी सहमति और वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) की सैन्य हकीकत में बड़ा फर्क दिख रहा है।
विवाद की जड़ें 1962 की जंग और उसके बाद के घटनाक्रम में हैं। 8 दिसंबर 2011 को भारत सरकार ने राज्यसभा में आधिकारिक जानकारी दी थी कि चीन ने जम्मू और कश्मीर में (अक्साई चिन) करीब 38,000 वर्ग किलोमीटर भारतीय जमीन पर गैरकानूनी कब्जा कर रखा है।
इसके अलावा 2 मार्च 1963 को पाकिस्तान और चीन के बीच हुए सीमा समझौते के तहत पाकिस्तान ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) की 5,180 वर्ग किलोमीटर जमीन चीन को सौंप दी। भारत शुरू से इस समझौते को पूरी तरह गैरकानूनी मानता है। सीमा के पूर्वी हिस्से में चीन पूरे अरुणाचल प्रदेश पर दावा करता है और करीब 90,000 वर्ग किलोमीटर इलाके को अपना बताता है।
दोनों देशों ने 2003 में सीमा के सवाल पर स्थायी राजनीतिक हल निकालने के लिए विशेष प्रतिनिधियों (Special Representatives, SR) की व्यवस्था बनाई। बातचीत के शुरुआती दौर के बाद 11 अप्रैल 2005 को दोनों ने सीमा विवाद सुलझाने के लिए राजनीतिक मापदंड और मार्गदर्शक सिद्धांतों वाले ऐतिहासिक समझौते पर दस्तखत किए।
इस समझौते का मकसद ऐसा हल निकालना था जो दोनों को मंजूर हो और जो न्यायसंगत व वाजिब हो। 2003 से 2026 के बीच 21 साल में विशेष प्रतिनिधियों की 25 बैठकें हुईं। इसके बावजूद 3,488 किलोमीटर लंबी पूरी सीमा पर अब तक ऐसा कोई अंतिम समझौता नहीं हुआ जो इस झगड़े को हमेशा के लिए खत्म कर सके।
बीजिंग की 25वीं बैठक में रिश्ते स्थिर करने के लिए दोनों देश इन आठ बातों पर राजी हुए। पहली, LAC पर शांति और स्थिरता बनाए रखना और दोनों देशों के रिश्ते पहले जैसे करने की दिशा में काम करना। दूसरी, 2005 के मार्गदर्शक सिद्धांतों के आधार पर दोनों को मंजूर हल खोजने की प्रक्रिया को तेज करना। तीसरी, सीमांकन और सीमा प्रबंधन से जुड़े दो कार्यसमूहों के काम का दायरा और शर्तें तय करके बातचीत आगे बढ़ाना।
चौथी, सीमा पर कोई भी तनाव की हालत बने तो सैन्य और कूटनीतिक रास्ते से फौरन संपर्क करना। पांचवीं, सेना के स्तर पर सीधी बातचीत के लिए पूर्वी और मध्य क्षेत्र में दो नई हॉटलाइन और सैन्य कमांडरों के लिए दो नए बैठक स्थल (Meeting Points) शुरू करना। छठी, रोके गए तीन सीमा व्यापार केंद्र फिर चालू करना और कैलास मानसरोवर यात्रा के लिए भारतीय श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ाना।
सातवीं, सीमा पार बहने वाली नदियों के पानी के बहाव की जानकारी (Hydrological Data) एक-दूसरे को देने के लिए सितंबर में विशेषज्ञ समूह की बैठक करना। आठवीं, अगले साल यानी 2027 में विशेष प्रतिनिधियों की 26वीं बैठक भारत में कराना।
जून 2020 में लद्दाख की गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद दोनों देशों के रिश्तों में भरोसा पूरी तरह टूट गया था। भारत ने सुरक्षा का हवाला देकर टिकटॉक समेत 59 से ज्यादा चीनी ऐप्स पर पाबंदी लगाई, निवेश के नियम सख्त किए और सीधी उड़ानें रोक दीं।
अक्टूबर 2024 में पूर्वी लद्दाख में सैनिक पीछे हटाने (Disengagement) के समझौते पर सहमति बनी। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच बातचीत हुई। 2025 में सीधी उड़ानें फिर शुरू हुईं और प्रधानमंत्री ने चीन में हुई SCO परिषद में हिस्सा लिया।
खास बात यह है कि सीमा पर तनाव रहते हुए भी 2025 में भारत और चीन के बीच दोतरफा व्यापार 12 फीसदी बढ़कर 155.6 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। इससे दिखता है कि दोनों देशों की आर्थिक निर्भरता सीमा की राजनीति से काफी हद तक अलग चल रही है।
कूटनीति के स्तर पर सहमति बनना और जमीन पर सीमा का अंतिम सीमांकन होना दो बिल्कुल अलग बातें हैं। अब जो हॉटलाइन और बैठक स्थल बनाए जा रहे हैं, उनसे गलतफहमी में होने वाली सैन्य झड़पें टल सकती हैं। लेकिन दोनों देशों ने अभी यह साफ नहीं किया है कि सीमांकन की प्रक्रिया किस इलाके से शुरू होगी और इसके लिए कितनी समयसीमा रहेगी।
विशेषज्ञ समूहों की आने वाली बैठकें और 2027 में भारत में होने वाली 26वीं बैठक सीमा विवाद की आगे की दिशा तय करने में बेहद अहम होंगी।
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