बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

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डॉ. नितीन थोरवे को हाईकोर्ट से राहत, फ्रॉड केस में रोक; पुलिस पर 15 करोड़ मांगने का आरोप

डॉ. नितीन थोरवे को हाईकोर्ट से राहत, फ्रॉड केस में रोक; पुलिस पर 15 करोड़ मांगने का आरोप तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
जुर्म PT24 टीम

विरार के कारोबारी डॉ. नितीन थोरवे के खिलाफ 20 करोड़ रुपये की कथित धोखाधड़ी के केस पर मुंबई हाईकोर्ट ने रोक लगाई है। थोरवे ने पुलिस पर पैसे मांगने का आरोप लगाया है।

विरार के जाने-माने कारोबारी और निदान हेल्थकेयर के डायरेक्टर डॉ. नितीन थोरवे के खिलाफ दर्ज 20 करोड़ रुपये की कथित धोखाधड़ी के मामले में मुंबई हाईकोर्ट ने रोक लगा दी है। इसके बाद थोरवे ने पुलिस पर ही गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि इस केस से बाहर निकालने और मामला सेटल कराने के नाम पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के नाम का इस्तेमाल करके 15 करोड़ रुपये मांगे गए। यह आरोप उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में लगाया।

थोरवे ने इसी मामले में 20 करोड़ रुपये की मांग का दावा भी किया है। दोनों रकम अलग-अलग बताई गई हैं, इसलिए सवाल उठ रहा है कि कथित मांग असल में क्या थी। बताया जा रहा है कि इन आरोपों को गंभीरता से लेते हुए पुलिस कमिश्नर निकेत कौशिक ने क्राइम ब्रांच से जांच कराने के निर्देश दिए हैं।

विवाद की जड़ 2001 का एक जमीन सौदा है। थोरवे के मुताबिक उन्होंने 2001 में दहिसर के मेस्त्री परिवार के साथ विरार की एक जगह को लेकर सौदा किया था। उनका दावा है कि इस सौदे में उन्होंने मेस्त्री परिवार को 66 लाख रुपये दिए और लेनदेन के सबूत उनके पास हैं। उनके अनुसार कई साल बाद यह पुराना सौदा विवाद बन गया और बात पुलिस स्टेशन तक पहुंच गई।

जुलाई 2026 में मेस्त्री परिवार ने थोरवे के खिलाफ 20 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी का केस दर्ज कराया। थोरवे का कहना है कि इतने साल पुराने सौदे पर अचानक केस दर्ज होने से उन्हें झटका लगा। उन्होंने सवाल उठाया कि जब रकम दी जा चुकी थी, तो उनके खिलाफ धोखाधड़ी का केस कैसे बन गया।

शिकायत में धोखाधड़ी की रकम 20 करोड़ रुपये बताई गई है। रकम बड़ी होने की वजह से बताया जाता है कि मामला वसूली विरोधी दस्ते यानी एंटी-एक्सटॉर्शन सेल को सौंपा गया। इसके बाद थोरवे ने कानूनी रास्ता अपनाया और मुंबई हाईकोर्ट पहुंचे। उनका दावा है कि उन्होंने कोर्ट में 66 लाख रुपये देने के सबूत पेश किए और केस की वैधता पर भी सवाल उठाए।

थोरवे की याचिका के बाद हाईकोर्ट ने इस केस की कार्यवाही पर रोक लगाई है। इससे थोरवे को राहत मिलने की बात कही जा रही है। हालांकि कोर्ट ने ठीक किस कार्यवाही पर रोक लगाई, किन शर्तों पर आदेश दिया और अपनी टिप्पणी में क्या कहा, यह आधिकारिक आदेश से ही साफ होगा। रोक मिलने का मतलब यह नहीं कि केस हमेशा के लिए खत्म हो गया या शिकायतकर्ताओं के सारे आरोप झूठे साबित हो गए।

पुलिस पर लगे आरोप में थोरवे ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि केस से बाहर निकालने और मामला निपटाने के लिए उनसे बार-बार संपर्क किया गया। उन्होंने बोलिंज पुलिस स्टेशन के असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर रुपेश दलवी और वसूली विरोधी दस्ते के पुलिस सब-इंस्पेक्टर शिवाजी खाडे समेत कुछ अधिकारियों के नाम लिए। उनका दावा है कि वरिष्ठ अधिकारियों के नाम पर 15 करोड़ रुपये मांगे गए, और मामला निपटाने के लिए 20 करोड़ रुपये मांगने का आरोप भी उन्होंने लगाया।

ये आरोप बेहद गंभीर हैं, लेकिन अभी साबित नहीं हुए हैं। 15 करोड़ और 20 करोड़ की मांग के बारे में कब, किस तरह और किसकी भूमिका थी, इसका आधिकारिक ब्योरा आना बाकी है। फोन बातचीत, मैसेज या पैसों के लेनदेन के सबूत हैं या नहीं, इसकी जांच होनी है।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में थोरवे ने मुंबई के पूर्व पुलिस अधिकारी सचिन वाझे से जुड़े वसूली मामले का हवाला भी दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि बड़े कारोबारियों को केस में फंसाकर उनसे पैसे वसूले जाते हैं और इस आधार पर पुलिस के कामकाज पर सवाल उठाए। पर दूसरे मामलों से तुलना करना और अपने आरोपों को तथ्यों का आधार मिलना, ये दो अलग बातें हैं।

थोरवे के आरोपों के बाद पुलिस कमिश्नर निकेत कौशिक ने जांच क्राइम ब्रांच के असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर को सौंपी है, ऐसा बताया जा रहा है। जांच में यह देखा जाएगा कि संबंधित अधिकारियों ने थोरवे से संपर्क क्यों किया, उनका मूल केस की जांच से क्या वास्ता था, कथित मांग का कोई सबूत है या नहीं और वरिष्ठ अधिकारियों के नाम का इस्तेमाल हुआ या नहीं।

असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर रुपेश दलवी ने आरोपों पर अपनी बात रखी है। उन्होंने कहा, "यह केस वसूली विरोधी दस्ते को सौंपा गया था। मेरा जांच से कोई संबंध नहीं है।" दलवी का यह भी कहना है कि थोरवे के खिलाफ केस दर्ज होने के गुस्से में वे आरोप लगा रहे हैं। यानी थोरवे के आरोप और अधिकारी की सफाई एक-दूसरे के उलट हैं।

अब दो अलग सवाल सामने हैं। पहला, 2001 के जमीन सौदे पर 2026 में दर्ज 20 करोड़ रुपये की कथित धोखाधड़ी के केस की असलियत क्या है। दूसरा, क्या पुलिस की तरफ से सेटलमेंट के लिए पैसे मांगे गए थे। पहले सवाल का जवाब जमीन सौदे के कागजात, लेनदेन के सबूत और कोर्ट की प्रक्रिया से मिलेगा, जबकि दूसरे का जवाब पुलिस कमिश्नर के आदेश पर होने वाली जांच से मिलने की उम्मीद है। अब सबकी नजर इस जांच के नतीजे पर है।

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