नरक चतुर्दशी पर भी हनुमान जयंती क्यों मनाते हैं, जानिए हनुमान जी की दो तिथियों की कहानी
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कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी यानी नरक चतुर्दशी पर भी हनुमान जी का जन्मोत्सव मनाने की परंपरा है। चैत्र पूर्णिमा से इसका क्या रिश्ता है, यहां समझिए।
हिंदू धर्म में भगवान हनुमान को संकटमोचक माना जाता है। उन्हें शक्ति, भक्ति और बेमिसाल सेवा का प्रतीक कहा जाता है। दिवाली के पवित्र त्योहार में जहां माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा होती है, वहीं हनुमान जी की पूजा का भी खास महत्व है। कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी, यानी नरक चतुर्दशी के दिन उनका जन्मोत्सव मनाया जाता है।
हिंदू ग्रंथों में हनुमान जी के जन्म की दो अलग तिथियों का जिक्र मिलता है। शास्त्रों और पुराणों के हिसाब से दो मुख्य तिथियां मानी जाती हैं, और इलाके के हिसाब से इनके पीछे के कारण भी अलग-अलग हैं।
पहली तिथि चैत्र पूर्णिमा की है। इस दिन को महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और पूरे दक्षिण भारत में बड़े उत्साह से हनुमान जयंती के तौर पर मनाया जाता है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव के 11वें रुद्र अवतार के रूप में माता अंजनी की कोख से हनुमान जी का जन्म हुआ था। कहा जाता है कि वे सूर्योदय के वक्त प्रकट हुए थे, इसीलिए यह जन्मोत्सव सुबह के पवित्र माहौल में मनाया जाता है।
दूसरी तिथि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी यानी नरक चतुर्दशी की है। उत्तर भारत में और कुछ खास धार्मिक परंपराओं में इस दिन हनुमान जी का जन्मोत्सव या "विजय उत्सव" मनाया जाता है। यह दिन दिवाली की हलचल के बीच, लक्ष्मीपूजन से एक दिन पहले पड़ता है। इसी वजह से दो अलग मत बन गए हैं। कुछ ग्रंथों के मुताबिक माता अंजनी ने कठोर तपस्या की और उसके बाद कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को आधी रात या शाम के वक्त हनुमान जी को जन्म दिया। एक दूसरी कथा कहती है कि इसी दिन माता सीता हनुमान जी की भक्ति से खुश हुईं, उन्हें अमरता का वरदान दिया और उन पर सिंदूर लगाया। इसलिए इस दिन को हनुमान जी का "दूसरा जन्म" या "वरदान दिवस" भी माना जाता है।
दिवाली के समय हनुमान जी की पूजा के पीछे रामायण की कथा भी है। भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण का वध किया और 14 साल का वनवास पूरा करके माता सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटने वाले थे। तब उन्होंने हनुमान जी को संदेशवाहक बनाकर पहले अयोध्या भेजा। हनुमान जी ने ही भरत को प्रभु राम के आने की खुशखबरी दी थी। जिस दिन राम अयोध्या लौटे, वह कार्तिक अमावस्या यानी दिवाली का दिन था। पूरी अयोध्या दीपों से जगमगा उठी थी, और प्रभु के प्यारे भक्त हनुमान का भी अयोध्या के लोगों ने धूमधाम से स्वागत किया। इसीलिए दिवाली के उत्सव में हनुमान जी को याद करना बेहद जरूरी माना जाता है।
माता सीता के वरदान की कथा भी कार्तिक चतुर्दशी से जुड़ी है। जब हनुमान जी सीता माता को ढूंढते हुए लंका की अशोक वाटिका पहुंचे, तो उन्होंने प्रभु राम की मुद्रिका (अंगूठी) माता सीता को दी। राम का संदेश सुनकर माता सीता भावुक भी हुईं और खुश भी। उन्होंने हनुमान जी को "अष्ट सिद्धि और नव निधि" का दाता होने और चिरंजीवी यानी अमर रहने का वरदान दिया। श्रद्धा है कि चूंकि यह कार्तिक चतुर्दशी का दिन था, इसलिए इस दिन हनुमान जी की पूजा करने से अकाल मृत्यु का डर नहीं रहता।
नरक चतुर्दशी दिवाली के पांच दिनों में दूसरा दिन है। इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध किया था। हनुमान जी खुद संकटमोचक हैं, इसलिए मान्यता है कि इस दिन उनकी पूजा से घर की बाधाएं टलती हैं और नकारात्मक ऊर्जा खत्म होती है। यह भी माना जाता है कि कार्तिक चतुर्दशी को हनुमान चालीसा या सुंदरकांड का पाठ करने से शनि की साढ़ेसाती और दूसरे ग्रहों के बुरे असर दूर होते हैं। इस दिन हनुमान जी को तेल और सिंदूर चढ़ाने की प्रथा है, जिससे सुख, समृद्धि और अच्छी सेहत मिलने की मान्यता है।
कुल मिलाकर, चैत्र पूर्णिमा को हनुमान जी की प्रकट तिथि यानी जन्म तिथि माना जाता है, जबकि कार्तिक चतुर्दशी उनकी वीरता, भक्ति और माता सीता से मिले अमरता के वरदान का उत्सव है। तिथि कोई भी हो, हनुमान जी की भक्ति इंसान को मुश्किलों से लड़ने की ताकत देती है।
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