असोचैम ने बजट से पहले मांगी कर राहत, सीमा शुल्क विवादों के लिए एमनेस्टी योजना
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उद्योग संस्था असोचैम ने केंद्रीय अर्थसंकल्प 2027-28 के लिए अपने बजट पूर्व निवेदन में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों पर कई सिफारिशें की हैं।
उद्योग संस्था असोचैम ने केंद्रीय अर्थसंकल्प 2027-28 से पहले सरकार को अपना बजट पूर्व निवेदन सौंपा है। इसमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष, दोनों तरह के करों में सुधार को लेकर कई अहम सिफारिशें की गई हैं। असोचैम चाहती है कि कर व्यवस्था पारदर्शी हो, उसका अंदाज़ा पहले से लगाया जा सके और वह निवेश के अनुकूल रहे। संस्था के मुताबिक इससे भारत की आर्थिक वृद्धि को रफ्तार मिलेगी, देश में बनने वाले सामान को ताकत मिलेगी, दुनिया भर का निवेश खिंचकर आएगा और ईज़ ऑफ डुइंग बिज़नेस यानी कारोबार की सुविधा बेहतर होगी।
इन सिफारिशों का मकसद कर का माहौल स्थिर करना, कानूनी विवाद घटाना, कर के प्रावधानों को सरल बनाना और वैश्विक निवेश व मैन्युफैक्चरिंग के केंद्र के तौर पर भारत की होड़ करने की ताकत बढ़ाना है।
प्रत्यक्ष करों में असोचैम ने सबसे पहले नई मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों की बात उठाई है। संस्था ने डिफेंस जैसे रणनीतिक क्षेत्रों समेत सभी नई मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए रियायती कर दर की सिफारिश की है। साथ ही आयकर कानून 1961 की धारा 115 बीएबी की तर्ज़ पर, वाजिब शर्तों के साथ, लंबी अवधि की कर छूट योजना फिर से लागू करने का सुझाव दिया गया है। इसका मकसद लंबे समय के निवेश, रोज़गार पैदा करने और निर्यात को बढ़ावा देना है।
डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर की बढ़ती अहमियत को देखते हुए डेटा सेंटर की इमारतों, फाइबर ऑप्टिक, कूलिंग सिस्टम और ऊर्जा बचाने वाले 5जी इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए अलग एसेट कैटेगरी और तेज़ डेप्रिसिएशन का फायदा देने की मांग की गई है। इसके अलावा भारतीय रीसेलर संस्थाओं के ज़रिए डिजिटल कंटेंट और क्लाउड सर्विस देने वाली विदेशी कंपनियों के लिए कर निश्चितता के प्रावधानों पर स्थिति साफ करने को कहा गया है।
रिसर्च और डेवलपमेंट को बढ़ावा देने के लिए असोचैम ने उद्योग और शिक्षा क्षेत्र के बीच सहयोग मज़बूत करने का प्रस्ताव रखा है। इसमें मान्यता प्राप्त यूनिवर्सिटी और रिसर्च संस्थाओं के साथ होने वाले खर्च पर पूरी या अतिरिक्त कटौती देना शामिल है।
लंबे समय के निवेश को प्रोत्साहन देने के लिए असोचैम ने लिस्टेड सिक्योरिटीज पर लंबी अवधि के कैपिटल गेन टैक्स (एलटीसीजी) को सरल करने की मांग की है। सिफारिश यह है कि 1 से 2 साल तक रखी गई सिक्योरिटीज पर एलटीसीजी 10% हो और 2 साल से ज़्यादा रखने पर यह शून्य या 5% हो। विकल्प के तौर पर लंबी अवधि की सिक्योरिटीज के लिए सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स का क्रेडिट देने का प्रस्ताव भी रखा गया है।
कर प्रशासन को पारदर्शी बनाने के लिए असोचैम ने मिनिमम अल्टरनेट टैक्स व्यवस्था में सुधार की मांग की है। संस्था चाहती है कि विवाद निवारण समिति की सीमा 10 लाख रुपये से बढ़ाकर 10 करोड़ रुपये की जाए। साथ ही एडवांस रूलिंग बोर्ड को नए सिरे से बनाया जाए, ताकि वह तय समय के भीतर फैसले दे।
अप्रत्यक्ष करों में असोचैम ने करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये के अटके हुए सीमा शुल्क विवाद निपटाने के लिए एक बार की सीमा शुल्क विवाद निवारण (एमनेस्टी) योजना लाने की सिफारिश की है। इसमें ब्याज और जुर्माना माफ करने और मूल शुल्क में चरणबद्ध छूट देने का प्रस्ताव है।
इसके अलावा विशेष आर्थिक क्षेत्र की यूनिटों को देश के टैरिफ क्षेत्र में अपना सामान बेचने के लिए स्थायी और आसान ढांचा देने की मांग की गई है। वेयरहाउस नियमों में लचीलापन और अधिकृत आर्थिक ऑपरेटर कार्यक्रम को सरल बनाने की मांग भी इसमें शामिल है।
असोचैम का कहना है कि उसकी ये सिफारिशें कर राजस्व और निवेश की सुविधा के बीच संतुलन की अहमियत को सामने रखती हैं। संस्था का विश्वास है कि सरल, स्थिर और पारदर्शी कर प्रणाली भारत की आर्थिक आकांक्षाओं को सहारा देगी, उत्पादन क्षमता मज़बूत करेगी और विकसित भारत का सपना पूरा करने में अहम भूमिका निभाएगी।
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