गुरूवार, 8 अक्टूबर 2026

अभी सब्सक्राइब करें
प्राइम अलर्ट
सारे लाइव अपडेट
21:29 IST

अंतरिक्ष में जाएगी स्कॉच व्हिस्की, 'स्पेस पफिन' मिशन में परखी जाएगी एजिंग

स्कॉटलैंड और जापान के शोधकर्ता 2028 में क्यूबसैट के जरिए व्हिस्की के नमूने अंतरिक्ष भेजेंगे।

अंतरिक्ष में जाएगी स्कॉच व्हिस्की, 'स्पेस पफिन' मिशन में परखी जाएगी एजिंग तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

अंतरिक्ष का नाम सुनते ही लोगों के दिमाग में सैटेलाइट, टेलीस्कोप और दूसरे ग्रहों पर जिंदगी की खोज आती है। लेकिन इस बार वैज्ञानिकों का प्रयोग थोड़ा हटकर है। स्कॉटलैंड और जापान के शोधकर्ता स्कॉच व्हिस्की के नमूने अंतरिक्ष के बेहद मुश्किल माहौल में भेजने वाले हैं।

इस प्रयोग से यह जांचा जाएगा कि अंतरिक्ष की माइक्रोग्रैविटी और तापमान में आने वाले तेज बदलावों का व्हिस्की की 'एजिंग' यानी पकने की प्रक्रिया पर क्या असर पड़ता है।

इस महत्त्वाकांक्षी प्रोजेक्ट का नाम 'स्पेस पफिन' (Space Puffin) रखा गया है। यह मिशन 2028 के लिए प्रस्तावित है। इसमें एक छोटा क्यूबसैट अंतरिक्ष भेजा जाएगा। इस सैटेलाइट में व्हिस्की के छोटे नमूने रखे जाएंगे, और साथ में वह सामग्री भी, जो व्हिस्की बनाने में इस्तेमाल होती है।

यह प्रोजेक्ट ग्लासगो यूनिवर्सिटी के डॉ. गाइल्स बैलेट की अगुवाई में चल रहा है। स्कॉटलैंड और जापान के इंजीनियर, केमिस्ट और स्टूडेंट्स इस रिसर्च में शामिल हैं।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, 2028 में स्पेसएक्स के कार्गो सप्लाई मिशन से यह क्यूबसैट इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) तक ले जाने की योजना है। इसके बाद जापानी एक्सपेरिमेंट मॉड्यूल के जरिए क्यूबसैट को पृथ्वी की कक्षा में छोड़ा जाएगा। करीब पांच साल तक यह सैटेलाइट धरती के चक्कर लगाते हुए व्हिस्की पर प्रयोग जारी रखेगा।

धरती पर व्हिस्की को पकाने के लिए उसे कई साल ओक की लकड़ी के पीपों में रखा जाता है। इस दौरान लकड़ी और स्पिरिट के बीच केमिकल रिएक्शन होता है, जिससे व्हिस्की को उसका खास रंग, स्वाद और खुशबू मिलती है।

अंतरिक्ष में बड़े और भारी पीपे भेजना तकनीकी और खर्च, दोनों नजरिए से मुश्किल है। इसलिए शोधकर्ताओं ने दूसरा तरीका चुना है। क्यूबसैट में एक खास चैंबर बनाया जाएगा, जिसमें थोड़ी मात्रा में स्पिरिट को ओक की लकड़ी के छोटे टुकड़ों के संपर्क में रखा जाएगा।

क्यूबसैट करीब 90 मिनट में पृथ्वी का एक चक्कर पूरा करेगा। इसलिए उसे अंतरिक्ष के बहुत अलग-अलग तापमानों से गुजरना पड़ेगा। तापमान के इन बदलावों से लकड़ी तेजी से सिकुड़ और फैल सकती है। अब यह देखा जाएगा कि क्या इससे लकड़ी और व्हिस्की के बीच केमिकल प्रक्रिया की रफ्तार बढ़ती है।

इस प्रयोग का सबसे अहम सवाल यही है। धरती पर व्हिस्की को पकने में कई साल लगते हैं। अगर अंतरिक्ष के हालात में यह प्रक्रिया तेज होती है, तो आगे चलकर कम वक्त में खास स्वाद और खुशबू वाली व्हिस्की बनाने का रास्ता खुल सकता है। डॉ. गाइल्स बैलेट के मुताबिक, अंतरिक्ष के बदलावों का लकड़ी पर असर और उससे व्हिस्की की एजिंग में होने वाले बदलाव समझना ही प्रयोग का मुख्य मकसद है।

यह सिर्फ व्हिस्की को अंतरिक्ष भेजने का प्रयोग नहीं है, बल्कि एक आधुनिक वैज्ञानिक रिसर्च प्रोजेक्ट है। क्यूबसैट में लगे सेंसर व्हिस्की के रंग में बदलाव, उसकी केमिकल बनावट और आणविक स्तर के बदलावों का अध्ययन करेंगे। इससे मिलने वाला डेटा धरती पर मौजूद रिसर्च सेंटरों को भेजा जाएगा।

इस रिसर्च से व्हिस्की के पकने के पीछे की केमिकल प्रक्रिया को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिल सकती है। शोधकर्ता यह उम्मीद भी जता रहे हैं कि आगे चलकर अंतरिक्ष के माहौल में पकाई गई व्हिस्की की अलग प्रीमियम श्रेणी बन सकती है।

क्या हम इस विज़िट को गिन लें? PT24 गूगल एनालिटिक्स से देखता है कि कौन सी खबरें किस पर पढ़ी जाती हैं। आपके हां कहने तक यह बंद है, आप सोच रहे हैं तब तक कुछ नहीं गिना जाता, और आप You पर कभी भी अपना मन बदल सकते हैं। हम क्या लेंगे