अमेरिकी मध्यावधि चुनाव में AI विज्ञापनों पर करीब 1,300 करोड़ खर्च, 81% रिपब्लिकन के
अमेरिका के 2026 के मध्यावधि चुनाव में AI से बने 220 से ज्यादा राजनीतिक विज्ञापनों पर करीब 137 मिलियन डॉलर खर्च हुए हैं।
अमेरिका के 2026 के मध्यावधि चुनाव (US Midterm Elections 2026) के प्रचार में इस बार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, यानी AI का जमकर इस्तेमाल हो रहा है। पहले पार्टियों का डिजिटल काम पोस्टर बनाने, लिखने-पढ़ने और सोशल मीडिया पोस्ट संभालने तक सीमित रहता था। अब AI टूल्स की मदद से हू-बहू असली लगने वाले डीपफेक वीडियो, नकली बातचीत और भ्रम फैलाने वाले वीडियो विज्ञापन बनाए जा रहे हैं, ताकि वोटरों के दिमाग पर असर डाला जा सके।
वेस्लेयन मीडिया प्रोजेक्ट (Wesleyan Media Project) के रिसर्चरों और विज्ञापन खर्च का हिसाब रखने वाली संस्था AdImpact के साझा विश्लेषण में चौंकाने वाली बात सामने आई है। इस चुनाव में अब तक AI से बने 220 से ज्यादा खास राजनीतिक विज्ञापन आ चुके हैं। इन्हें टीवी चैनलों, डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया पर चलाने के लिए करीब 137 मिलियन डॉलर खर्च हुए हैं। भारतीय करेंसी में यह रकम लगभग 1,200 से 1,300 करोड़ रुपये बैठती है। इतने बड़े खर्च को देखकर दुनिया भर में राजनीति में AI की बढ़ती दखलअंदाजी पर चिंता जताई जा रही है।
रिसर्च के आंकड़ों के मुताबिक AI से बने इन विज्ञापनों में से 81% रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवारों या उनसे जुड़ी पॉलिटिकल एक्शन कमेटियों (PACs) ने बनवाए हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी और उसके समर्थक गुटों का हिस्सा सिर्फ 12% के आसपास है। यानी रिपब्लिकन पार्टी ने विरोधियों को घेरने और अपनी बात वोटरों तक पहुंचाने के लिए AI को अपना मुख्य हथियार बना लिया है।
राजनीतिक विश्लेषण के मुताबिक AI का इस्तेमाल विरोधियों की छवि बिगाड़ने और अपनी पार्टी की नीतियों को ज्यादा आकर्षक ढंग से पेश करने के लिए हो रहा है। AI से किसी भी नेता को ऐसे मौकों पर या ऐसे नेताओं के साथ दिखाया जा सकता है, जिनसे उसका असल में कभी कोई वास्ता नहीं रहा। इससे वोटरों में उलझन पैदा करना और उनकी राय को प्रभावित करना आसान हो गया है।
इस मुहिम के दो ताजा उदाहरण न्यूयॉर्क और ओक्लाहोमा में दिखे। न्यूयॉर्क में गवर्नर पद के रिपब्लिकन उम्मीदवार ब्रूस ब्लेकमन के प्रचार अभियान ने AI से बना एक पूरा वीडियो जारी किया। उसमें न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी और गवर्नर कैथी होचुल एक पार्क में साथ टहलते और बागवानी करते दिखाए गए। इस वीडियो में 'पॉलिटिकल डिल्यूजन पिल' (राजनीतिक भ्रम की गोली) नाम की एक काल्पनिक दवा का विज्ञापन किया जा रहा था।
वीडियो में बढ़ती महंगाई और अपराध जैसे गंभीर मुद्दों पर गवर्नर और मेयर की नीतियों का मजाक उड़ाया गया। वीडियो इतना असली लगता था कि आम वोटर उसे सच मान सकता था। सबसे चिंता की बात यह है कि विज्ञापन में कहीं ऐसा कोई डिस्क्लेमर या सफाई नहीं दी गई थी कि इसे AI से बनाया गया है।
ऐसा ही दूसरा मामला ओक्लाहोमा में हुआ। वहां एक रिपब्लिकन उम्मीदवार के समर्थन में चले टीवी विज्ञापन में उसके विरोधी को हिलरी क्लिंटन को गले लगाते और उनका हाथ थामे दिखाया गया। वीडियो की पृष्ठभूमि में "क्लिंटन प्रेमी, ट्रम्प द्वेषी" का संदेश चलाकर उस उम्मीदवार को ट्रम्प विरोधी साबित करने की कोशिश हुई। AdImpact की रिपोर्ट के मुताबिक इस नकली AI वीडियो को टीवी पर चलाने में 2,000,000 डॉलर (करीब 1.6 करोड़ रुपये) से ज्यादा खर्च हुए।
पुराने तरीके से वीडियो विज्ञापन बनाने में कलाकार चुनना, अलग-अलग जगह शूटिंग करना और एडिटिंग करना पड़ता था। इसमें लाखों डॉलर लगते थे और कई हफ्ते निकल जाते थे। AI टूल्स से अब कुछ ही घंटों में और बहुत कम खर्च में कोई भी काल्पनिक घटना या बातचीत तैयार हो जाती है। पार्टियां अलग-अलग इलाकों के वोटरों के लिए अलग विज्ञापन बना रही हैं। कहीं महंगाई का मुद्दा है, कहीं अपराध का और कहीं शरणार्थियों का। इसे माइक्रो-टारगेटिंग (Micro-targeting) कहा जाता है।
AI से प्रचार तेज और सस्ता तो हो रहा है, लेकिन लोकतंत्र के सामने बड़ी चुनौती भी खड़ी हो रही है। गलत जानकारी (Misinformation), नकली वीडियो और संदर्भ के बिना पेश किए गए तथ्यों की वजह से वोटरों के लिए सच और झूठ में फर्क करना मुश्किल हो गया है। आने वाले समय में राजनीतिक विज्ञापनों में पारदर्शिता लाना और AI से बनी सामग्री पर कानूनी पाबंदी लगाना अमेरिका समेत पूरी दुनिया की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के लिए बड़ी चुनौती होगी।
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