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05:29 IST

1936 में वर्धा से शुरू हुई राष्ट्र सेविका समिति, नौ दशक में देशभर में फैला महिलाओं का संगठन

विजयादशमी 25 अक्टूबर 1936 को लक्ष्मीबाई केलकर ने राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना की थी। आज समिति की 4886 से ज्यादा शाखाएं हैं।

1936 में वर्धा से शुरू हुई राष्ट्र सेविका समिति, नौ दशक में देशभर में फैला महिलाओं का संगठन तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

राष्ट्र सेविका समिति की शुरुआत विजयादशमी के दिन 25 अक्टूबर 1936 को वर्धा में हुई थी। संस्थापक लक्ष्मीबाई केलकर थीं, जिन्हें लोग मौसी जी भी कहते हैं। करीब नौ दशक बाद यह संगठन देशभर में और विदेशों में भी काम कर रहा है। यह जानकारी विदर्भ प्रांत की बौद्धिक प्रमुख प्रा. आरती तिवारी के लेख में दी गई है।

लेख के मुताबिक गुलामी के दौर में देश की अस्मिता को चोट पहुंची थी और हालात अस्थिर थे। मौसी जी को बचपन से इसकी बेचैनी थी। उनके मन में यह बात पक्की होती गई कि देश के पुनरुत्थान के लिए सिर्फ राजनीतिक आजादी काफी नहीं है, समाज की अंदरूनी ताकत को भी जगाना जरूरी है। इसी विश्वास से कि स्त्री राष्ट्र की आधारशिला है, समिति बनी। 'सम् इति समितिः' का मतलब है समान लक्ष्य, समान प्रेरणा और राष्ट्रनिष्ठा से अपने आप जुटी महिलाओं की संगठित ताकत।

लक्ष्मीबाई का जन्म 6 जुलाई 1905 को नागपुर में भास्करराव दाते और यशोदाबाई दाते के घर हुआ था। तब उनका नाम कमल था। घर के निर्भीक माहौल में बचपन से ही उन पर देशभक्ति के गहरे संस्कार पड़े। 1915 में उनकी शादी वर्धा के पुरुषोत्तमराव केलकर से हुई और वे लक्ष्मीबाई कहलाने लगीं। 1932 में पति के अचानक निधन से उन पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा, फिर भी उन्होंने आत्मचिंतन और समाजकार्य जारी रखा।

वे महात्मा गांधी की प्रार्थना सभाओं में जाती थीं। एक सभा में सवाल उठा कि स्त्रियों को किसका आदर्श रखना चाहिए। गांधीजी ने सीतामाता का आदर्श रखने को कहा, क्योंकि सीता के तेज, तप और पवित्रता से ही राम श्रीराम बने। रामायण पढ़ने के बाद लक्ष्मीबाई को लगा कि स्त्री को अपने सामर्थ्य से अपनी रक्षा करना सीखना चाहिए। उन्हें यह भी पक्का हुआ कि राष्ट्र के उत्थान के लिए स्त्री और पुरुष दोनों का बराबर सशक्त होना जरूरी है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार वर्धा आए थे। शाखा में अभिभावकों के लिए हुए सत्र के बाद लक्ष्मीबाई ने उनसे मुलाकात की और पुरुषों की तरह महिलाओं के संगठन की जरूरत रखी। हेडगेवार ने कहा कि महिलाओं के संगठन की जिम्मेदारी उन्हें खुद संभालनी चाहिए और संघ पूरा सहयोग करेगा। उनके मुताबिक संघ और महिलाओं का संगठन रेल की दो समानांतर पटरियों की तरह एक ही लक्ष्य के लिए काम करेंगे। इसके बाद 1936 में समिति की स्थापना हुई।

मौसी जी के नेतृत्व में शाखाओं का विस्तार हुआ और सम्मेलन, सेवाकार्य और रामायण प्रवचनों के जरिए समाजजागरण का काम बढ़ा। निष्ठावान विस्तारिकाओं और प्रचारिकाओं की मजबूत कतार खड़ी हुई। 27 नवंबर 1978 को लक्ष्मीबाई केलकर के निधन के बाद पुणे की सरस्वती ताई आपटे 1978 से 1994 तक प्रमुख संचालिका रहीं। फिर उषाताई चाटी और प्रमिलाताई मेढे ने नेतृत्व किया। अभी शांताक्काजी प्रमुख संचालिका हैं। समिति ने व्यक्ति के बजाय तत्त्व को प्राथमिकता देते हुए भगवा ध्वज को गुरुस्थान पर स्वीकार किया है।

समिति के काम की मुख्य इकाई शाखा है। वहां योग, सूर्यनमस्कार, दंड, यष्टि, खेल, देशभक्ति गीत, बौद्धिक चर्चा और वर्तमान घटनाओं पर विचार होता है। आज देशभर में 4886 से ज्यादा सक्रिय शाखाएं हैं, जिनमें करीब 591 दैनिक शाखाएं हैं। कामकाजी महिलाओं और युवतियों के लिए 1173 से ज्यादा मिलन होते हैं। समिति में एक साल की बच्ची से लेकर लकड़ी के सहारे शाखा आने वाली 90 साल की दादी तक सभी के लिए जगह है।

समिति करीब 2866 सेवा प्रकल्प चला रही है। साठ से ज्यादा केंद्रों में सिलाई, हस्तकला, कंप्यूटर प्रशिक्षण, खाद्य प्रसंस्करण और दूसरे व्यावसायिक प्रशिक्षण दिए जाते हैं। दूरस्थ और जनजातीय इलाकों में निःशुल्क चिकित्सालय और स्वास्थ्य शिविर लगते हैं। तमिलनाडु में सुनामी प्रभावित बच्चियों के लिए छात्रावास, गुजरात में भूकंप के बाद मयापुर गांव का पुनर्वास, कोरोना काल में मास्क और राशन का वितरण और हाल में नेपाल के बाढ़ग्रस्त इलाकों में मदद, ये समिति की 'नरसेवा ही नारायण सेवा' भावना के उदाहरण बताए गए हैं।

शिक्षा से वंचित या हिंसा, आतंकवाद और किसान आत्महत्या से प्रभावित परिवारों की बालिकाओं के लिए समिति करीब 27 निःशुल्क और 9 सशुल्क छात्रावास चलाती है। विदेशों में कुछ देशों में सेविकाएं हिंदू स्वयंसेवक संघ (HSS) के साथ काम कर रही हैं। लेख के अनुसार लक्ष्मीबाई केलकर का लगाया पौधा आज विशाल वटवृक्ष बन गया है।

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