स्ट्रोक सिर्फ दिमाग से नहीं, दिल से भी शुरू हो सकता है, सुबह के लक्षण न करें नजरअंदाज
पुणे के न्यूरोसर्जन डॉ. राकेश रंजन के मुताबिक दिल में बनी खून की गांठ से भी स्ट्रोक आ सकता है, और सुबह दिखे लक्षणों पर फौरन अस्पताल पहुंचना जरूरी है।
पुणे: रात को कोई तकलीफ नहीं थी, आदमी आराम से सोया। सुबह उठा तो अचानक बोल नहीं पा रहा, चेहरा एक तरफ झुका हुआ है या हाथ-पैरों में कमजोरी लग रही है। ऐसे में कई लोगों को समझ ही नहीं आता कि हुआ क्या है। ये लक्षण स्ट्रोक के हो सकते हैं।
खास बात यह है कि कई बार स्ट्रोक की शुरुआत दिमाग में नहीं, बल्कि दिल में बनी खून की गांठ से होती है। नींद में स्ट्रोक आ जाए और लक्षण सुबह दिखें, तो मेडिकल भाषा में इसे 'वेक-अप स्ट्रोक' कहते हैं।
पुणे के आदित्य बिर्ला मेमोरियल हॉस्पिटल के न्यूरोसाइंसेस विभाग के वरिष्ठ निदेशक और न्यूरोसर्जन डॉ. राकेश रंजन ने इस बारे में अहम जानकारी दी। उनका कहना है, "स्ट्रोक सिर्फ दिमाग की बीमारी है, ऐसा कई लोग मानते हैं। असल में दिल की कुछ बीमारियों से भी स्ट्रोक का खतरा बढ़ता है। अक्सर इन दिल की बीमारियों के साफ लक्षण नहीं दिखते। इसलिए सुबह उठकर स्ट्रोक के लक्षण मिलें, तब भी यह न मानें कि इलाज में देर हो चुकी है। मरीज को फौरन अस्पताल में भर्ती करा दिया जाए तो उसे सही इलाज मिल सकता है।"
दिल की धड़कन अनियमित होने की समस्या को 'एट्रियल फिब्रिलेशन' कहते हैं। इसमें दिल के ऊपरी खानों में खून जमकर गांठ बन सकती है। यह गांठ खून के बहाव के साथ दिमाग तक पहुंच जाए तो नस में रुकावट आ जाती है और स्ट्रोक हो सकता है। एट्रियल फिब्रिलेशन से स्ट्रोक का खतरा करीब पांच गुना बढ़ सकता है। दिल के वाल्व की बीमारियां और दिल के कुछ दूसरे रोग भी इसकी वजह बन सकते हैं।
वेक-अप स्ट्रोक में सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि पता नहीं चलता स्ट्रोक आया कब। रात को सोने के बाद सुबह लक्षण दिखने तक कितना वक्त गुजरा, इसका अंदाजा लगाना कठिन होता है। फिर भी आज के सीटी स्कैन और एमआरआई जांच से दिमाग की नसों की हालत और दिमाग के प्रभावित हिस्से की जानकारी मिल जाती है। उसके आधार पर चुने हुए मरीजों को खून की गांठ घोलने वाली दवाएं दी जा सकती हैं, या 'मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी' से गांठ निकाली जा सकती है।
स्ट्रोक के लक्षण पहचानने के लिए 'बी फास्ट' (BE FAST) तरीका काम आता है। अचानक संतुलन बिगड़ना, नजर धुंधली होना, चेहरा टेढ़ा हो जाना, हाथ में कमजोरी आना या बोलने में दिक्कत होना, ये स्ट्रोक के मुख्य लक्षण हैं। ऐसे लक्षण दिखते ही एंबुलेंस बुलाकर उस अस्पताल में ले जाना चाहिए जहां इलाज की सुविधा हो।
कुछ देर बाद लक्षण कम हो जाएं, तब भी उन्हें हल्के में न लें। यह आगे आने वाले गंभीर स्ट्रोक की चेतावनी हो सकती है। डॉक्टर की सलाह के बिना एस्पिरिन जैसी दवाएं न दें। मरीज को खाने या पीने के लिए भी कुछ न दें।
स्ट्रोक का खतरा घटाने के लिए ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और कोलेस्ट्रॉल काबू में रखना, रोज कसरत करना, तंबाकू से दूर रहना और दिल की नियमित जांच कराना जरूरी है। दिल की धड़कन अनियमित हो तो डॉक्टर की सलाह से सही इलाज लेना अहम है।
डॉ. रंजन ने साफ किया कि स्ट्रोक भले अचानक आता हो, उसके पीछे का जोखिम अक्सर पहले से मौजूद रहता है। दिल और दिमाग के रिश्ते को समझना, लक्षण वक्त पर पहचानना और फौरन इलाज लेना, इससे मरीज की जान बचाई जा सकती है और हमेशा की विकलांगता का खतरा भी कम होता है।
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