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पुणे: SPPU में कोलोन समर स्कूल का समापन, भारत और जर्मनी के शिक्षक एक मंच पर आए

पुणे: SPPU में कोलोन समर स्कूल का समापन, भारत और जर्मनी के शिक्षक एक मंच पर आए तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
पढ़ाई PT24 टीम

सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय में कोलोन समर स्कूल - इंडिया 2026 का समापन हुआ, जिसमें भारत और जर्मनी के शिक्षक, शोधकर्ता और छात्र शामिल हुए।

पुणे, 2 नवंबर 2026: सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय (SPPU) में कोलोन समर स्कूल - इंडिया 2026 का समापन हो गया। इसमें भारत और जर्मनी के शिक्षक, शोधकर्ता और छात्र एक साथ जुड़े। कार्यक्रम से यह बात सामने आई कि दुनिया भर के शैक्षणिक सहयोग, समावेशी शिक्षा और अलग-अलग संस्कृतियों से सीखने की अहमियत बढ़ती जा रही है।

यह अंतरराष्ट्रीय समर स्कूल SPPU के डिपार्टमेंट ऑफ एजुकेशन एंड एक्सटेंशन ने आयोजित किया था। दोनों देशों से आए प्रतिभागियों को यहां एक मंच मिला, जहां उन्होंने अपनी जानकारी साझा की, अलग-अलग शिक्षा व्यवस्थाओं को समझा और विशेष तथा समावेशी शिक्षा के नए तरीकों पर बात की।

SPPU के स्कूल ऑफ एजुकेशन के डायरेक्टर प्रो. विलास आढव के मुताबिक यह पहल सिर्फ लेक्चर और सेमिनार तक सीमित नहीं रही। अलग-अलग शैक्षणिक पृष्ठभूमि से आए छात्रों, शोधकर्ताओं और फैकल्टी सदस्यों को आपस में सार्थक बातचीत का मौका भी मिला।

कार्यक्रम में लेक्चर, सेमिनार और आपसी भागीदारी वाली शैक्षणिक गतिविधियां हुईं। इनका फोकस विशेष शिक्षा, समावेशी शिक्षा और तुलनात्मक शोध पर रहा। प्रतिभागियों ने भारत और जर्मनी में अपनाए जाने वाले तरीकों को देखा और पढ़ाने के अलग-अलग ढंग, शोध की पद्धतियां और शैक्षणिक परंपराएं समझीं।

समापन समारोह में प्रो. डॉ. क्लोफर, प्रो. डॉ. एवा, डिपार्टमेंट ऑफ एजुकेशन एंड एक्सटेंशन की प्रमुख प्रो. डॉ. गीता शिंदे और प्रो. विलास आढव ने अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक सहयोग के महत्व पर अपनी बात रखी।

वक्ताओं ने कहा कि आज की शिक्षा में वैश्विक नजरिया जरूरी है, खासकर तब जब अलग-अलग पृष्ठभूमि के विद्यार्थियों की जरूरतों पर काम करना हो। उन्होंने समावेशी शिक्षा, मिलकर किए जाने वाले शोध और देशों के बीच अनुभवों के आदान-प्रदान पर जोर दिया, ताकि शिक्षा के तौर-तरीके मजबूत हों।

समर स्कूल का एक अहम नतीजा यह रहा कि छात्रों को अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक माहौल का अनुभव मिला। जर्मन और भारतीय प्रोफेसरों, शोधकर्ताओं और साथी छात्रों से बातचीत के जरिए प्रतिभागियों ने अलग-अलग सांस्कृतिक नजरिए, पढ़ाने की परंपराओं और शैक्षणिक शोध के तरीकों को समझा।

प्रो. आढव ने कहा कि ऐसे कार्यक्रम छात्रों का शैक्षणिक दायरा बढ़ाने में अहम भूमिका निभाते हैं। भविष्य के शिक्षक और शोधकर्ता जब बाहर के नजरिए से रूबरू होते हैं, तो वे जाने-पहचाने सिस्टम से आगे देख पाते हैं और समझ पाते हैं कि दुनिया के दूसरे हिस्सों में शिक्षा की चुनौतियों से कैसे निपटा जाता है।

चर्चा में तुलनात्मक शोध की अहमियत भी सामने आई। इससे असरदार तरीकों की पहचान होती है और ज्यादा समावेशी सीखने का माहौल बनाया जा सकता है। अलग-अलग देश विशेष शिक्षा को कैसे देखते हैं, यह समझने से शिक्षक आपस में विचार साझा कर सकते हैं और ऐसे तरीके खोज सकते हैं जो उनके अपने हालात में अपनाए जा सकें।

समापन सत्र में आए प्रोफेसरों और छात्रों ने अपने अनुभव बताए और कार्यक्रम के दौरान हुए शैक्षणिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान पर अपनी राय रखी।

इस पहल को भारत और जर्मनी के बीच शैक्षणिक रिश्ते मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम माना गया। इससे आगे साझा शोध परियोजनाओं, फैकल्टी के आपसी संवाद और शैक्षणिक कार्यक्रमों की संभावनाएं भी खुलती हैं।

प्रो. आढव ने कहा कि कोलोन समर स्कूल जैसी अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक पहलें संस्थानों और लोगों के बीच टिकाऊ रिश्ते बनाती हैं। ऐसे सहयोग से शिक्षा व्यवस्था ज्यादा समावेशी, विविध और दुनिया से जुड़ी बन सकती है।

समर स्कूल सकारात्मक माहौल में खत्म हुआ और इसने यह संदेश दोहराया कि शिक्षा का भविष्य गढ़ने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग और ज्ञान का आदान-प्रदान जरूरी है।

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