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SPPU में छात्र संगठनों का आरोप: वादे की बैठक नहीं हुई, कैंपस में पुलिस ने मारपीट की

SPPU में छात्र संगठनों का आरोप: वादे की बैठक नहीं हुई, कैंपस में पुलिस ने मारपीट की तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
जुर्म PT24 टीम

सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय में बुधवार को तनाव बढ़ गया। छात्र संगठनों का कहना है कि प्रशासन ने बैठक का भरोसा पूरा नहीं किया और पुलिस ने छात्रों के साथ मारपीट की।

पुणे, 4 नवंबर 2026: सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय (SPPU) में बुधवार को माहौल गरमा गया। कई छात्र संगठनों के प्रतिनिधियों का आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने उनके साथ बैठक करने का जो भरोसा दिया था, वह पूरा नहीं हुआ। उनका यह भी आरोप है कि कैंपस में हुई झड़प के दौरान पुलिस वालों ने छात्रों के साथ धक्का-मुक्की और मारपीट की।

छात्र प्रतिनिधि 2024 और 2026 में जारी दो विवादित सर्कुलर पर जवाब मांगने विश्वविद्यालय के अधिकारियों के पास पहुंचे थे। उनका दावा है कि इन सर्कुलरों से छात्रों की अभिव्यक्ति की आजादी, लोकतांत्रिक अधिकार और कैंपस में विरोध प्रदर्शन करने का हक सीमित हो जाता है।

इससे पहले 2 नवंबर को कई वामपंथी, प्रगतिशील और आंबेडकरवादी छात्र संगठनों ने प्रदर्शन किया था। वाइस चांसलर, प्रो-वाइस चांसलर और रजिस्ट्रार से बातचीत के दौरान प्रशासन ने कथित तौर पर भरोसा दिया था कि 4 नवंबर को छात्र प्रतिनिधियों के साथ बैठक कराई जाएगी। इसमें उनकी मांगों पर चर्चा होनी थी, खासकर मैनेजमेंट काउंसिल को भंग करने की मांग पर।

छात्र संगठनों का कहना है कि बुधवार को ऐसी कोई बैठक हुई ही नहीं। मैनेजमेंट काउंसिल की बैठक खत्म होने के बाद प्रतिनिधि उसके सदस्यों डॉ. देविदास वायदंडे, डॉ. धोंडीराम पवार और कार्यवाहक रजिस्ट्रार डॉ. प्रफुल्ल पवार के पास गए और पूछा कि वादा क्यों पूरा नहीं हुआ।

बातचीत में छात्रों ने यह भी पूछा कि सर्कुलरों में पाबंदियां होने के बावजूद विश्वविद्यालय कैंपस में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के रूट मार्च को किस आधार पर इजाजत दी गई। छात्र प्रतिनिधियों के मुताबिक प्रशासन ने संतोषजनक जवाब नहीं दिया। उन्हें बताया गया कि मैनेजमेंट काउंसिल की बैठक टल गई है और छात्र चाहें तो दिवाली के बाद सदस्यों के साथ बैठक कराई जा सकती है। सदस्यों ने कथित तौर पर यह भी साफ किया कि राष्ट्रीय मुद्दों पर प्रदर्शन करने का हक छात्र संगठनों के पास है।

हालात तब बिगड़े जब वाइस चांसलर और रजिस्ट्रार छात्रों की बात सुने बिना वहां से निकलने लगे। छात्र संगठनों का आरोप है कि पुलिस वालों ने छात्रों को जबरदस्ती परिसर से बाहर निकाला और उन पर हाथ उठाया, जिनमें छात्राएं भी शामिल थीं।

सम्यक विद्यार्थी आंदोलन के किरण सैंदाणे का आरोप है कि उन्होंने विवादित सर्कुलरों पर बात करने के लिए वाइस चांसलर से सिर्फ दो मिनट मांगे थे। उनके मुताबिक बोलने का मौका देने के बजाय पुलिस वालों ने कथित तौर पर उनके हाथ पकड़े, जबरदस्ती गाड़ी की तरफ ले गए और धक्का-मुक्की की। उन्होंने मांग की कि वाइस चांसलर इस घटना की जिम्मेदारी लें और जो लोग इसमें शामिल थे, उन पर कार्रवाई हो।

विश्वविद्यालय छात्र संघर्ष कार्रवाई समिति, SPPU इकाई के अध्यक्ष अभिषेक शेलकर ने कहा कि छात्रों की चिंताओं पर ध्यान न देने, वादे पूरे न करने और अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान न करने से विश्वविद्यालय प्रशासन पर छात्रों का भरोसा बुरी तरह हिल गया है। उनका कहना है कि संगठन संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीके से अपना संघर्ष जारी रखेंगे।

NSUI के पुणे अध्यक्ष एडवोकेट अभिजीत गोरे देशमुख ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने NSUI के पदाधिकारियों समेत छात्र प्रतिनिधियों के खिलाफ पुलिस का इस्तेमाल कर छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों को दबाने की कोशिश की। उन्होंने प्रदर्शन से जुड़े सर्कुलर तुरंत वापस लेने की मांग की।

रिपब्लिकन स्टूडेंट्स आर्मी के पुणे शहर अध्यक्ष हंसराज खुणे ने सर्कुलरों पर प्रशासन के रुख की आलोचना की। उन्होंने ऐलान किया कि उनका संगठन आंदोलन तेज करेगा और सीधे वाइस चांसलर के इस्तीफे की मांग करेगा।

SFI की पुणे सिटी कमेटी के उपाध्यक्ष आदित्य कासरे ने भी कथित पुलिस कार्रवाई की निंदा की। उन्होंने कहा कि प्रगतिशील, वामपंथी और आंबेडकरवादी छात्र संगठन कई दिनों से इन दो सर्कुलरों के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं। उनका आरोप है कि बातचीत कराने का लिखित भरोसा देने के बाद भी प्रशासन ने संवाद शुरू नहीं किया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस वालों ने आम छात्रों और छात्र संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ मारपीट की।

पृष्ठभूमि: 2 नवंबर का प्रदर्शन। उस दिन कई छात्र संगठनों ने सर्कुलर क्रमांक 316/2024 और 226/2026 के खिलाफ SPPU में प्रदर्शन किया था। उनका आरोप था कि विश्वविद्यालय ने छात्रों की निजी आजादी, अभिव्यक्ति की आजादी और लोकतांत्रिक गतिविधियों पर पाबंदियां लगाई हैं। प्रदर्शनकारियों ने दोनों सर्कुलर वापस लेने, मैनेजमेंट काउंसिल को भंग करने, कैंपस में मोरल पुलिसिंग बंद करने और छात्रों से जुड़े फैसले लेने से पहले छात्र प्रतिनिधियों से सलाह करने की मांग की थी।

प्रशासन से बातचीत के बाद दो मांगें मान ली गईं: छात्रों की निजी आजादी पर असर डालने वाली मोरल पुलिसिंग तुरंत बंद होगी, और छात्रों से जुड़े अहम फैसलों से पहले छात्र प्रतिनिधियों और संगठनों से सलाह ली जाएगी। प्रशासन ने कथित तौर पर यह भरोसा भी दिया था कि कैंपस में की गई बैरिकेडिंग हटाई जाएगी, जिससे वहां सिक्योरिटी कैंप जैसा माहौल बन गया था। लेकिन मैनेजमेंट काउंसिल वाली मांग और विवादित सर्कुलर वापस लेने की मांग अनसुलझी रही।

4 नवंबर की घटनाओं से छात्र संगठनों और विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच विवाद और गहरा गया है। आंदोलन कर रहे संगठनों ने फिर कहा है कि जब तक सर्कुलर वापस नहीं लिए जाते, छात्रों के अधिकार सुरक्षित नहीं होते और कथित पुलिस मारपीट की जवाबदेही तय नहीं होती, तब तक उनका आंदोलन संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीके से जारी रहेगा।

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