शनिवार, 31 अक्टूबर 2026

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गोरेगांव रीडेवलपमेंट में देरी: हाईकोर्ट ने बिल्डर पर 2.67 करोड़ का हर्जाना कायम रखा

गोरेगांव रीडेवलपमेंट में देरी: हाईकोर्ट ने बिल्डर पर 2.67 करोड़ का हर्जाना कायम रखा तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
कारोबार PT24 टीम

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कुमार अर्बन डेवलपमेंट की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि पहले से तय हर्जाने के मामले में सटीक नुकसान साबित करना जरूरी नहीं था।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने गोरेगांव की एक हाउसिंग सोसायटी के रीडेवलपमेंट में हुई देरी के मामले में आर्बिट्रल अवॉर्ड को रद्द करने से मना कर दिया है। इस अवॉर्ड में कुमार अर्बन डेवलपमेंट प्राइवेट लिमिटेड को ब्याज के साथ 2.67 करोड़ रुपये देने को कहा गया था। कोर्ट ने कहा कि जब दोनों पक्ष लिक्विडेटेड डैमेजेस की एक वाजिब पूर्व-अनुमानित रकम पर राजी हुए हों, तो इस केस के हालात में सटीक आर्थिक नुकसान या कानूनी चोट साबित करना जरूरी नहीं है।

जस्टिस आरती साठे ने बिल्डर की याचिका खारिज की। यह याचिका 3 मार्च 2017 के आर्बिट्रल अवॉर्ड के खिलाफ थी, जो जल रत्न दीप को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी लिमिटेड के साथ उसके विवाद में आया था। फैसला 23 अक्टूबर 2026 को सुनाया गया।

विवाद बांगुर नगर, गोरेगांव (वेस्ट) में पांच इमारतों के रीडेवलपमेंट का है, जिनमें 97 फ्लैट हैं। 12 जनवरी 2011 के मूल डेवलपमेंट एग्रीमेंट की क्लॉज 26 के तहत, अगर देरी 60 दिन से आगे खिंचती तो बिल्डर को हर हफ्ते, या हफ्ते के किसी हिस्से के लिए भी, 10 लाख रुपये देने थे।

आर्बिट्रेटर ने 62 हफ्तों के लिए लिक्विडेटेड डैमेजेस 6.20 करोड़ रुपये तय किए थे। इसमें से 1.10 करोड़ रुपये की सिक्योरिटी डिपॉजिट और 2.425 करोड़ रुपये का हार्डशिप कंपनसेशन/कॉर्पस घटाया गया। इसके बाद अवॉर्ड में बिल्डर को सोसायटी को ब्याज समेत कुल 2.675 करोड़ रुपये देने का आदेश दिया गया।

बिल्डर ने अरबिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट, 1996 की धारा 34 के तहत अवॉर्ड को चुनौती दी। उसकी दलील थी कि सोसायटी ने देरी से हुआ कोई असली आर्थिक नुकसान या कानूनी चोट साबित नहीं की। उसके वकील ने कहा कि 10 लाख रुपये हफ्ते की रकम का कोई दिखाया गया कमर्शियल आधार नहीं है और यह भी नहीं दिखाया गया कि यह हर्जाने का वाजिब पूर्व-अनुमान है।

बिल्डर ने यह भी कहा कि सोसायटी के सदस्य अपने पुराने घरों में ही रह रहे थे और उन्हें किसी दूसरे आवास में नहीं भेजा गया। उसने बताया कि सदस्यों के पास सिक्योरिटी डिपॉजिट और हार्डशिप कंपनसेशन भी रहा। उसका कहना था कि अवॉर्ड में बिना किसी भरपाई-योग्य नुकसान की पहचान किए हर्जाना दे दिया गया।

सोसायटी ने इस चुनौती का विरोध किया। उसने कहा कि यह रकम कॉन्ट्रैक्ट में लिक्विडेटेड डैमेजेस के तौर पर तय हुई थी और देरी के संभावित नतीजों का वाजिब पूर्व-अनुमान थी। उसके वकील ने कहा कि आर्बिट्रेटर ने देरी और उल्लंघन के निष्कर्ष दर्ज किए हैं, इसलिए धारा 34 के तहत अवॉर्ड में दखल की जरूरत नहीं है।

हाईकोर्ट ने डेवलपमेंट एग्रीमेंट की क्लॉज 26 को इंडियन कॉन्ट्रैक्ट एक्ट, 1872 की धारा 74 के साथ पढ़ा। कोर्ट ने देखा कि क्लॉज में साफ लिखा है कि हर हफ्ते 10 लाख रुपये लिक्विडेटेड डैमेजेस हैं और यह रकम पेनल्टी नहीं है। कोर्ट ने सोसायटी की यह बात मानी कि दोनों पक्षों की कमर्शियल समझ से निकली यह रकम नुकसान का वाजिब पूर्व-अनुमान है। कोर्ट के मुताबिक, जब सबूतों से देरी और उल्लंघन साबित हो गया, तो इस केस में सटीक नुकसान या कानूनी चोट का और सबूत जरूरी नहीं था।

फैसले में आर्बिट्रेटर के उन निष्कर्षों का भी जिक्र है जो बिल्डर के बर्ताव के बारे में हैं। इनमें इंटिमेशन ऑफ डिसअप्रूवल (IOD) के आवेदन पर करीब पांच महीने की निष्क्रियता, IOD की प्रक्रिया में लगभग 11 महीने की एक और निष्क्रियता, और प्रोजेक्ट आगे बढ़वाने की सोसायटी की बार-बार की कोशिशें शामिल हैं। आर्बिट्रेटर ने यह भी दर्ज किया था कि देरी से सोसायटी तंग आ गई थी और उसका बिल्डर पर से भरोसा उठ गया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि आर्बिट्रेटर ने सबूतों को परखकर विवाद पर एक संभव राय बनाई थी। धारा 34 में आर्बिट्रल अवॉर्ड में दखल की गुंजाइश सीमित है, इसलिए कोर्ट को अवॉर्ड रद्द करने की कोई वजह नहीं मिली।

याचिका खारिज कर दी गई। कोर्ट ने निर्देश दिया कि अगर कोर्ट में कोई रकम जमा है, तो फैसला हाईकोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड होने की तारीख से एक महीने के भीतर जारी की जाए। कोई खर्च नहीं लगाया गया। बिल्डर की तरफ से सीनियर एडवोकेट झल अंध्यारुजिना पेश हुए, जबकि हाउसिंग सोसायटी की तरफ से एडवोकेट रोहन कामा ने पैरवी की।

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