शनिवार, 31 अक्टूबर 2026

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पुणे के न्यूरोसर्जन पर आत्महत्या के लिए उकसाने का केस बॉम्बे हाईकोर्ट ने रद्द किया

पुणे के न्यूरोसर्जन पर आत्महत्या के लिए उकसाने का केस बॉम्बे हाईकोर्ट ने रद्द किया तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
जुर्म PT24 टीम

बॉम्बे हाईकोर्ट ने 30 साल के न्यूरोसर्जन के खिलाफ FIR और चार्जशीट रद्द कर दी। उन पर लिव-इन पार्टनर की मौत के लिए उकसाने का आरोप था।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुणे के एक 30 साल के न्यूरोसर्जन के खिलाफ दर्ज FIR और चार्जशीट को रद्द कर दिया है। इस डॉक्टर पर आरोप था कि उन्होंने अपनी 37 साल की लिव-इन पार्टनर को आत्महत्या के लिए उकसाया। कोर्ट ने कहा कि जो सामग्री सामने रखी गई, उससे यह साबित नहीं होता कि उन्हें आत्महत्या की तरफ धकेलने में डॉक्टर की सीधी भूमिका थी।

22 अक्टूबर के अपने आदेश में कोर्ट ने कहा कि मामले में ऐसा कोई सबूत नहीं है कि डॉक्टर ने कोई खास हरकत की हो, जिसे जानबूझकर उकसाना या महिला की मौत में सक्रिय मदद माना जाए। कोर्ट डॉक्टर की उस अर्जी पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग की थी।

महिला के पास मैनेजमेंट की डिग्री थी और वह एक प्राइवेट कंपनी में काम करती थीं। 24 सितंबर 2024 को वह हिंजवडी पुलिस स्टेशन के इलाके में अपने फ्लैट में मृत मिलीं। उस वक्त डॉक्टर एक नामी अस्पताल में न्यूरोसर्जरी की स्पेशलाइज्ड ट्रेनिंग के चौथे साल में थे।

केस की जानकारी के मुताबिक महिला की पहले दो शादियां हुई थीं, एक 2014 में और दूसरी 2017 में। दोनों तलाक पर खत्म हुईं। इसके बाद दोनों का रिश्ता बना और वे साथ रहने लगे।

बताया गया है कि मौत से एक रात पहले दोनों में झगड़ा हुआ। कहा गया है कि डॉक्टर का परिवार, जो बेंगलुरु में रहता है, उनके लिए दूसरा रिश्ता ढूंढने लगा था। बहस के बाद महिला डॉक्टर का फ्लैट छोड़कर अपने घर लौट गईं।

24 सितंबर को सुबह करीब 8.45 बजे वह अपने बेडरूम में फंदे से लटकी मिलीं। पुलिस को फ्लैट से एक नोट मिला। उसमें महिला ने आरोप लगाया था कि डॉक्टर उन्हें परेशान करते थे, और लिखा था कि उन्हें माफ नहीं किया जाना चाहिए।

मामला 16 अक्टूबर को दर्ज हुआ, यानी घटना के करीब तीन हफ्ते बाद। यह महिला की मां की शिकायत पर हुआ, जिसमें न्यूरोसर्जन पर बेटी को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाया गया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि नोट में सामान्य आरोप है कि महिला डॉक्टर के बर्ताव से परेशान थीं। लेकिन उसमें किसी खास घटना का जिक्र नहीं है, और यह भी नहीं बताया गया कि डॉक्टर की हरकतों का महिला के जान देने के फैसले से क्या ताल्लुक था।

बेंच ने यह भी कहा कि उसके सामने रखी सामग्री से रिश्ते में आई खटास के हालात का पता नहीं चलता, और न ही आरोपी की तरफ से परेशान करने की कोई खास हरकत दिखती है। उकसाने का आरोप टिकाने के लिए जो जरूरी तत्व चाहिए, वे नहीं थे। इसी आधार पर कोर्ट ने न्यूरोसर्जन के खिलाफ FIR और उसके बाद की चार्जशीट रद्द कर दी।

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