बॉम्बे हाईकोर्ट ने ठुकराई 22 साल बाद पुणे की जमीन के विवाद को बढ़ाने की अर्जी
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
बॉम्बे हाईकोर्ट ने 1995 के जमीन मालिकाना हक के मुकदमे में गलत गट नंबर सुधारने की मांग खारिज कर दी।
क्या कोई पक्षकार तीस साल पुराने जमीन विवाद का दायरा यह कहकर बढ़ा सकता है कि शुरू के मुकदमे में गलत सर्वे नंबर लिख दिया गया था? बॉम्बे हाईकोर्ट ने ऐसी कोशिश को साफ तौर पर ठुकरा दिया है। कोर्ट ने कहा कि प्रक्रिया में संशोधन को मुकदमा खींचने, मियाद खत्म हो चुके दावों को फिर जिंदा करने या तीसरे खरीदारों के हक खतरे में डालने का जरिया नहीं बनाया जा सकता।
जस्टिस संदीप वी. मार्ने ने सुभद्राबाई तुकाराम काटे की रिट याचिका खारिज कर दी। काटे ने वडगांव मावल की दीवानी अदालत के 23 अप्रैल 2018 के आदेश को चुनौती दी थी। उस आदेश में 1995 में दायर जमीन मालिकाना हक के मुकदमे में संशोधन की इजाजत नहीं दी गई थी। विवाद पुणे जिले के मावल तालुका के कार्ला गांव की खेती की जमीन का है।
काटे की तरफ से सीनियर एडवोकेट सुरेल शाह ने दलील दी कि मूल वादपत्र में एक विवादित जमीन को गलती से गट नंबर 602 की जगह गट नंबर 612 लिख दिया गया था। उनका कहना था कि यह सुधार सिर्फ औपचारिक है और पक्षों के बीच असली झगड़े का फैसला करने के लिए जरूरी है।
शाह ने यह भी कहा कि वादियों ने विवादित बिक्री दस्तावेज खुद नहीं किए थे, इसलिए वे घोषणा मांग सकते हैं कि ये सौदे उनके मालिकाना हक पर बाध्यकारी नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट के शांति देवी बनाम जगन देवी फैसले का हवाला देकर उन्होंने कहा कि इन चुनौतियों को मियाद खत्म बताकर खारिज नहीं करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि मुकदमा 1995 में दायर हुआ था, इसलिए 2002 में सिविल प्रोसीजर कोड में आई सख्त शर्तें उस पर लागू नहीं होतीं। देरी हुई हो तो उसकी भरपाई जुर्माने से हो सकती है, संशोधन पूरी तरह नकारने की जरूरत नहीं।
याचिका का विरोध करते हुए सीनियर एडवोकेट अनिल अंतुरकर ने कहा कि जिसे टाइपिंग की गलती बताया जा रहा है, वह खुद वादियों के अपने रिकॉर्ड से मेल नहीं खाती। उन्होंने बताया कि मूल वादपत्र में गट नंबर 612 की चौहद्दी लिखी गई थी। वहीं 2013 में मांगे गए पिछले संशोधन में दिसंबर 2008 की बिक्री दस्तावेज को सिर्फ गट नंबर 583 के लिए चुनौती दी गई थी। यह दस्तावेज गट नंबर 583 और 602 दोनों का था, फिर भी वादियों ने गट नंबर 602 को जान-बूझकर अपनी चुनौती से बाहर रखा।
अंतुरकर ने कहा कि 2006 से 2008 के बीच हुए सौदों को 2017 में चुनौती देने की कोशिश मियाद के बाहर है। उन्होंने हाईकोर्ट से निचली अदालत का इनकार बरकरार रखने की गुजारिश की।
जस्टिस मार्ने ने पाया कि वादियों के अपने कागजात ही उनके दावे के खिलाफ जाते हैं। मूल वादपत्र में चौहद्दी के साथ गट नंबर 612 लिखा था। जिला कलेक्टर को 1994 में दी गई अर्जी में भी गट नंबर 583 और 612 का जिक्र था। इसके अलावा वादियों ने गट नंबर 612 का 7/12 उतारा भी दाखिल किया था। कोर्ट को यह मानना मुश्किल लगा कि बार-बार यही जिक्र अनजाने में हुई गलती से आया। कोर्ट ने यह भी देखा कि याचिकाकर्ता ने रिट याचिका में 2013 के पिछले संशोधन की बात नहीं बताई।
हाईकोर्ट ने तीसरे पक्ष के हक पर खास जोर दिया। कई खरीदारों ने गट नंबर 602 के हिस्से तब खरीदे थे जब वह जमीन चल रहे मुकदमे का हिस्सा नहीं थी। दशकों बाद उसे मुकदमे में लाने से विवाद का स्वरूप ही बदल जाता और उनके बन चुके हक पर असर पड़ता। कोर्ट ने कहा कि प्रस्तावित संशोधन से खरीदार लंबी कानूनी लड़ाई और बातचीत में भी खिंच सकते हैं।
शांति देवी के फैसले से इस मामले को अलग बताते हुए जस्टिस मार्ने ने कहा कि वादी पूरी जमीन का मालिकाना हक मांग रहे हैं, सिर्फ साझा जमीन में तय हिस्से की हिफाजत नहीं। इसलिए 2006 से 2008 के दस्तावेजों को दी गई चुनौतियां याचिकाकर्ता के बताए सिद्धांत से नहीं बचतीं।
हाईकोर्ट ने संशोधनों को मियाद के बाहर और नेकनीयती से खाली माना। जुर्माने से देरी की भरपाई की दलील ठुकराते हुए जस्टिस मार्ने ने कहा कि मियाद खत्म और बदनीयती वाला संशोधन सिर्फ जुर्माना भरने पर मंजूर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने याचिका बिना जुर्माने के खारिज कर दी, और मालिकाना हक का मूल विवाद अब दीवानी अदालत में आगे चलेगा।
कमेंट
अभी कोई कमेंट नहीं। पहले आप लिखिए।