छोटे कारोबारों के पास टेक्नोलॉजी है, कमी सिस्टमों को आपस में जोड़ने की है
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
आरएचए वनएआई के सह-संस्थापक अरुण मीणा का कहना है कि भारत के एसएमई सॉफ्टवेयर की कमी से नहीं, बिखरे हुए सिस्टमों से जूझ रहे हैं।
पुणे, 2 नवंबर 2026: भारत के छोटे और मध्यम कारोबारों के बारे में अक्सर कहा जाता है कि वे टेक्नोलॉजी अपनाने में पीछे रहते हैं। RHA OneAI और RHA Technologies के सह-संस्थापक और सीईओ अरुण मीणा के मुताबिक यह बात अब सही नहीं है। उनका कहना है कि आज किसी बढ़ती मैन्युफैक्चरिंग कंपनी, हेल्थकेयर सेवा, लॉजिस्टिक्स कंपनी, रिटेलर या प्रोफेशनल सर्विस फर्म में जाइए, तो आम तौर पर अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर, CRM, इन्वेंटरी टूल, WhatsApp Business, स्प्रेडशीट, क्लाउड स्टोरेज और अब किसी न किसी तरह का AI असिस्टेंट मिल जाएगा। दिक्कत टेक्नोलॉजी की कमी की नहीं है। दिक्कत यह है कि ये सारे सिस्टम आपस में बात नहीं करते।
मीणा बताते हैं कि सेल्स का डेटा एक सिस्टम में पड़ा रहता है और इन्वेंटरी दूसरे में। ग्राहकों से बातचीत WhatsApp पर होती है। हिसाब का मिलान महीने के आखिर में होता है। ऑपरेशन्स की टीमें अपने अलग ट्रैकर रखती हैं। मैनेजमेंट तक जो रिपोर्ट पहुंचती है, वह हफ्तों पुरानी हो चुकी होती है। सब व्यस्त हैं, लेकिन कारोबार की पूरी और ताजा तस्वीर किसी के पास नहीं है।
उनके अनुसार यह कई भारतीय एसएमई की चुपचाप चल रही ऑपरेशनल मुश्किल है। बैलेंस शीट में यह किसी नाम के खर्च के तौर पर नहीं दिखती। यह देर से होने वाले फैसलों, बार-बार के हाथ के काम, टाली जा सकने वाली गलतियों, गलत जगह फंसी वर्किंग कैपिटल और ऐसी ग्रोथ के रूप में सामने आती है जिसे संभालना तब और कठिन हो जाता है, जब उसे आसान होना चाहिए।
मीणा ने अलग-अलग क्षेत्रों के उदाहरण दिए। ऑटो-एंसिलरी यूनिट में सेल्स ऑर्डर, प्रोडक्शन प्लान और खरीद अक्सर अलग सिस्टमों में होते हैं। ग्राहक डिलीवरी का शेड्यूल बदले तो सेल्स को पहले पता चल सकता है, जबकि प्लानिंग और खरीद पुरानी जरूरत के हिसाब से काम करती रहती हैं। नतीजा ज्यादा इन्वेंटरी, छूटी हुई डिस्पैच या फालतू ओवरटाइम हो सकता है। रेस्टोरेंट ग्रुप ऑनलाइन ऑर्डर के लिए एक प्लेटफॉर्म, डाइन-इन बिलिंग के लिए दूसरा, रिजर्वेशन के लिए WhatsApp और सप्लायर की खरीद के लिए स्प्रेडशीट इस्तेमाल कर सकता है। जोड़ाई न हो तो मैनेजमेंट को जल्दी पता नहीं चलता कि किस आउटलेट का मार्जिन घट रहा है, किन मेन्यू आइटम से वेस्ट बन रहा है या डिलीवरी का समय क्यों बदलता है।
स्कूलों में भी यही चुनौती है। एडमिशन, फीस, अटेंडेंस, ट्रांसपोर्ट और पैरेंट्स से संवाद अक्सर अलग-अलग टूल पर चलते हैं। फीस की जानकारी देर से मिले या ट्रांसपोर्ट में कोई गड़बड़ी हो, तो कैश फ्लो और पैरेंट्स का अनुभव दोनों पर असर पड़ सकता है। मॉल में फुटफॉल, पार्किंग, किराएदारों की बिक्री, प्रमोशन, मेंटेनेंस और सिक्योरिटी देखनी होती है। ये सिस्टम कटे रहें तो मैनेजमेंट को पता हो सकता है कि कितने लोग आए, पर यह नहीं कि उनसे बिक्री हुई या नहीं, या खर्च कहां बढ़ रहा है। मीणा के मुताबिक हर मामले में रुकावट सॉफ्टवेयर की गैरमौजूदगी नहीं, बल्कि जुड़े हुए और फैसले के लिए तैयार ऑपरेशन्स की गैरमौजूदगी है।
डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन को लेकर वे कहते हैं कि सालों तक इसे सीधे समीकरण की तरह बेचा गया: सॉफ्टवेयर खरीदो, डिजिटल हो जाओ। कई कारोबारों ने टूल खरीदे, फाइलें क्लाउड पर डालीं, वेबसाइट और ऐप बनाए और फॉर्म डिजिटल किए। फिर भी कंपनी चलाने का रोजमर्रा का अनुभव ज्यादा नहीं बदला। वजह साफ है कि किसी प्रक्रिया को डिजिटल करना और उसे बेहतर बनाना एक बात नहीं है। टेक्नोलॉजी को सिर्फ दर्ज नहीं करना चाहिए कि कारोबार क्या कर रहा है। उसे समझाना चाहिए कि क्या हो रहा है, किस पर ध्यान चाहिए और लोगों को तेजी से काम करने लायक बनाना चाहिए।
डेटा पर मीणा का कहना है कि भारतीय कारोबार पहले से ज्यादा डेटा बनाते हैं, पर अकेले डेटा की कीमत सीमित है। नंबरों से भरा डैशबोर्ड समझ नहीं है, और फैसला हो जाने के बाद पहुंची रिपोर्ट जानकारी नहीं है। डेटा काम का तभी है, जब वह भरोसेमंद हो, समय पर मिले और किसी फैसले से जुड़ा हो। इसके लिए साफ डेटा पाइपलाइन, साझा परिभाषाएं, तय जिम्मेदारी और ऐसे वर्कफ्लो चाहिए जो जानकारी को कार्रवाई से जोड़ें। कई संगठन डैशबोर्ड खरीदकर एनालिटिक्स शुरू करते हैं और फिर पाते हैं कि नीचे का डेटा बेमेल, दोहराया हुआ या अधूरा है। तब डैशबोर्ड साफ तस्वीर की जगह उलझन का एक और जरिया बन जाता है।
उनकी सलाह है कि शुरुआत अलग तरह से हो। पहले उन फैसलों को पहचानें जो सबसे ज्यादा मायने रखते हैं: कीमत, खरीद, क्षमता, उधार, ग्राहकों को रोके रखना, वर्किंग कैपिटल या सेवा की डिलीवरी। फिर उल्टी दिशा में चलकर तय करें कि कौन सा डेटा चाहिए, वह कहां से आता है और उसकी गुणवत्ता का जिम्मेदार कौन है।
AI के बारे में मीणा कहते हैं कि वह दस्तावेज पढ़ सकता है, बातचीत का सार बना सकता है, गड़बड़ियां पकड़ सकता है, जवाब का मसौदा लिख सकता है, मांग का अनुमान लगा सकता है और दोहराए जाने वाले काम ऑटोमेट कर सकता है। लेकिन AI उसी कारोबार की हालत को बढ़ाता है जिस पर उसे लगाया जाए। ग्राहक डेटा बेमेल हो तो AI की निकाली जानकारी भी बेमेल होगी। मंजूरी की प्रक्रिया साफ न हो तो ऑटोमेशन उलझन को ही तेज करेगा। वित्तीय और ऑपरेशनल डेटा का मिलान न हो तो AI से किया गया अनुमान कमजोर नींव पर भरोसे के साथ जवाब देगा। AI का फायदा तब है जब वह तय प्रक्रिया पर लगे, भरोसेमंद डेटा पर टिके और इंसानों की साफ जवाबदेही के तहत चले। उनके मुताबिक व्यावहारिक तरीका यह है कि शुरुआत ज्यादा झंझट वाले और दोहराए जाने वाले कामों से हो, जैसे इनवॉइस प्रोसेसिंग, ग्राहकों के सवाल सही जगह भेजना, दस्तावेज से जानकारी निकालना, इन्वेंटरी अलर्ट या मैनेजमेंट रिपोर्टिंग।
मीणा के अनुसार RHA Technologies और RHA OneAI जैसी कंपनियां इसी क्षेत्र में काम करती हैं। वे संगठनों को डेटा, एप्लिकेशन और जानकारी जोड़ने में मदद करती हैं, ताकि AI असली वर्कफ्लो में काम आए और अकेला प्रयोग बनकर न रह जाए। उनका कहना है कि सवाल यह नहीं कि कौन सा AI टूल खरीदें, बल्कि यह है कि AI को जिम्मेदारी से लाने पर कौन सा फैसला या कौन सी प्रक्रिया बेहतर होगी।
फाउंडर की भूमिका पर वे कहते हैं कि कई भारतीय एसएमई में फाउंडर ही कारोबार का केंद्रीय तंत्रिका तंत्र है। उसे हर बड़ा ग्राहक, हर अहम सप्लायर और हर जरूरी आंकड़ा पता होता है। शुरुआती सालों में यह ताकत है, पर संगठन बड़ा होने पर यह सीमा बन सकती है। फाउंडर खुद हर अपवाद नहीं देख सकता, हर खरीद मंजूर नहीं कर सकता और हर ऑपरेशनल विवाद नहीं सुलझा सकता। एक मोड़ पर कारोबार को ऐसे सिस्टम चाहिए जो संस्थागत जानकारी संभालें, एकरूपता लागू करें और अपवाद अपने-आप सामने लाएं। इसका मतलब इंसानी विवेक हटाना नहीं, उसे उन फैसलों के लिए खाली करना है जिनमें वह सच में जरूरी है।
मीणा के अनुसार सबसे असरदार लीडर ज्यादा रिपोर्ट नहीं मांगते, बेहतर सवाल पूछते हैं: पिछले हफ्ते से क्या बदला? कौन से ग्राहक खतरे में हैं? हम समय कहां गंवा रहे हैं? कौन से फैसले मानक बनाए जा सकते हैं? किन अपवादों पर मेरा ध्यान चाहिए? टेक्नोलॉजी ऐसी बने कि इन सवालों के जवाब जल्दी दे। तब लीडरशिप की बैठकें इतिहास खंगालने से हटकर अगली चाल तय करने पर आ जाती हैं।
आगे क्या करें, इस पर उनकी राय है कि कारोबारों को सब कुछ एक साथ बदलने की जरूरत नहीं। व्यावहारिक रास्ता यह है कि कोई एक ऑपरेशनल तकलीफ चुनें जो राजस्व, कैश फ्लो या ग्राहक अनुभव पर असर डालती हो। मौजूदा प्रक्रिया को ईमानदारी से नक्शे पर उतारें। देखें कि डेटा कहां बनता है, कहां दोहराया जाता है और फैसले कहां अटकते हैं। फिर जुड़े सिस्टमों को जोड़ें, डेटा का मानक तय करें और ऑटोमेशन वहीं लाएं जहां प्रक्रिया स्थिर हो। लक्ष्य नापने लायक हो: टर्नअराउंड टाइम घटाना, फोरकास्ट की सटीकता बढ़ाना, वित्तीय क्लोज जल्दी करना, स्टॉक-आउट घटाना या मैनेजमेंट का समय बचाना। टेक्नोलॉजी पार्टनर सिस्टम बना और लागू कर सकते हैं, लेकिन डेटा की परिभाषाएं, प्रक्रियाएं और फैसले के अधिकार कारोबार के अपने हाथ में होने चाहिए, वरना सबसे अच्छा प्लेटफॉर्म भी धीरे-धीरे हाथ के जुगाड़ पर लौट आएगा।
मीणा के मुताबिक भारत के एसएमई सेक्टर में महत्वाकांक्षा की कमी नहीं, ऑपरेशनल लीवरेज की कमी है। अगले दशक में टिकाऊ ग्रोथ वही कारोबार करेंगे जो अपने ऑपरेशन्स साफ देख सकें, अपवादों पर जल्दी प्रतिक्रिया दें और भरोसेमंद जानकारी पर फैसले लें, जरूरी नहीं कि सबसे एडवांस टेक्नोलॉजी वाले ही हों। उनका कहना है कि अगला प्रतिस्पर्धी फायदा एक और टूल खरीदने से नहीं, बल्कि कारोबार का ऑपरेटिंग सिस्टम बनाने से आएगा: जुड़ा हुआ डेटा, अनुशासित प्रक्रियाएं, जहां फायदा हो वहां ऑटोमेशन और जहां विवेक बेहतर हो वहां AI। उनके शब्दों में टेक्नोलॉजी कारोबार के ऊपर रखी परत नहीं होनी चाहिए, ठीक से हो तो वह इस सोच का हिस्सा बन जाती है कि कारोबार कैसे सोचता है। इसके लिए ऐसा टेक्नोलॉजी पार्टनर चाहिए जो फाउंडर की प्राथमिकताएं समझे और हर फैसले में एप्लिकेशन-पहले की जगह कारोबारी नजरिया लाए।
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