सामना के संपादकीय में शिवसेना (UBT) ने सूखा-पीड़ित किसानों को 5,000 रुपये की मदद को "खोखला" बताया
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शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने पार्टी के मुखपत्र सामना में महाराष्ट्र सरकार की 5,000 रुपये की अग्रिम सहायता पर सवाल उठाए हैं।
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने महाराष्ट्र सरकार की उस घोषणा की आलोचना की है, जिसमें सूखे से प्रभावित किसानों को 5,000 रुपये की अग्रिम रकम देने की बात कही गई है। पार्टी के मुखपत्र सामना में छपे संपादकीय में इसे "फ्रॉड और खोखला" दिखावा कहा गया है।
सरकार ने दिवाली से पहले सूखा-प्रभावित इलाकों के पात्र किसानों को अग्रिम सहायता देने का ऐलान किया है। सरकार का कहना है कि खरीफ सीजन में नुकसान झेल रहे किसान परिवारों को फौरन आर्थिक सहारा देने के लिए यह रकम दी जा रही है।
सामना के संपादकीय का आरोप है कि सरकार पूरे महाराष्ट्र में सूखे की मार झेल रहे करीब 1.5 करोड़ किसानों को पर्याप्त राहत देने में नाकाम रही है। संपादकीय के मुताबिक इस मदद के साथ 33 फीसदी फसल नुकसान की शर्त जुड़ी है, जिसकी वजह से बड़ी संख्या में परेशान किसान सहायता से बाहर रह सकते हैं।
संपादकीय में कहा गया है कि राहत सिर्फ उन्हीं इलाकों तक सीमित है, जहां नुकसान का आकलन यानी पंचनामा पूरा हो चुका है और फसल का नुकसान 33 फीसदी से ज्यादा है। उसका दावा है कि व्यापक सूखे के बावजूद इन शर्तों के कारण काफी किसान मदद से वंचित रह सकते हैं।
संपादकीय ने सत्ताधारी सरकार पर आरोप लगाया कि वह घोषणाएं तो करती है, पर यह पक्का नहीं करती कि लाभ आर्थिक संकट झेल रहे हर किसान तक पहुंचे। पार्टी का तर्क है कि राहत खेती के नुकसान के पैमाने और ग्रामीण इलाकों की मुश्किलों के हिसाब से होनी चाहिए।
संपादकीय में किसानों की दिक्कतों का भी जिक्र है। कम बारिश की वजह से खरीफ की फसल को नुकसान हुआ है और रबी की बुवाई की संभावनाएं भी कमजोर पड़ी हैं। उसके मुताबिक गांवों में पीने के पानी और चारे की कमी है, जिससे फसल के नुकसान और बढ़ते कर्ज का आर्थिक दबाव और भारी हो गया है।
लेख में सवाल उठाया गया है कि निजी फाइनेंस कंपनियों और साहूकारों द्वारा कर्ज वसूली के लिए किसानों को कथित तौर पर परेशान किए जाने के खिलाफ सरकार के निर्देशों पर असल में कितना अमल हो रहा है। उसका दावा है कि सख्त कार्रवाई की चेतावनी के बावजूद जबरन वसूली जारी है।
संपादकीय में नांदेड़ और लातूर में किसानों की कथित आत्महत्याओं का भी जिक्र है। इन मामलों को कर्ज से जुड़ी परेशानी से जोड़ते हुए सरकार की राहत और कार्रवाई की पहुंच पर सवाल उठाया गया है।
जल एवं मृदा संरक्षण विभाग के बारे में संपादकीय ने कहा कि वह मानसून लौट जाने के बाद पानी सोखने वाले गड्ढे खोदने जा रहा है। इस कदम को उसने "पोस्टमॉर्टम प्रयास" करार दिया। उसका सवाल है कि नई बारिश के बिना ये उपाय पानी की किल्लत झेल रहे गांवों के किस काम आएंगे। उसका आरोप है कि ऐसी परियोजनाओं से ठेकेदारों और बिचौलियों को फायदा हो सकता है, गांववालों को ठोस राहत नहीं मिलेगी।
संपादकीय का यह भी कहना है कि प्रशासनिक देरी और पात्रता की शर्तें सरकारी घोषणाओं को कमजोर कर रही हैं, और सूखा-पीड़ित किसानों के लिए ये अतिरिक्त रुकावटें हैं। अंत में उसने कहा कि सरकारी घोषणाओं और उनके अमल के बीच की खाई ग्रामीण इलाकों की मुश्किलें बढ़ा रही है। उसने नौकरशाही की अड़चनों और पात्रता की शर्तों की तुलना ऐसे "अल नीनो" से की, जो सूखे से भी ज्यादा नुकसानदेह है।
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