बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

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मराठवाड़ा पदवीधर सीट पर सतीश चव्हाण हारे, विश्लेषण में सामने आईं छह संभावित वजहें

मराठवाड़ा पदवीधर सीट पर सतीश चव्हाण हारे, विश्लेषण में सामने आईं छह संभावित वजहें तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
सियासत PT24 राजनीति डेस्क

विधानपरिषद की पांच सीटों के नतीजे आ गए हैं। मराठवाड़ा पदवीधर में लगातार तीन बार जीते सतीश चव्हाण को डॉ. प्रतापसिंह पाटील ने हरा दिया।

राज्य में विधानपरिषद की पांच सीटों के नतीजे घोषित हो गए हैं। इनमें से तीन सीटें महायुति को मिली हैं और दो सीटें महाविकास अघाड़ी ने जीती हैं। लेकिन सबसे चौंकाने वाला नतीजा मराठवाड़ा स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से आया।

इस निर्वाचन क्षेत्र में लगातार तीन बार जीत चुके राष्ट्रवादी के सतीश चव्हाण इस बार महायुति के उम्मीदवार थे। उन्हें इस चुनाव में बड़ा राजनीतिक झटका लगा। डॉ. प्रतापसिंह पाटील ने उनके सामने कड़ी चुनौती खड़ी की थी। नतीजे को देखकर लगता है कि यह हार सिर्फ दो उम्मीदवारों की टक्कर का नतीजा नहीं है। इसमें 18 साल के राजनीतिक सफर का हिसाब, महायुति के भीतर की नाराजगी और जिले की राजनीति में बदलते समीकरण भी असर डालते दिख रहे हैं।

सतीश चव्हाण की हार का विश्लेषण करते हुए अलग-अलग कारण गिनाए जा रहे हैं। इनमें महायुति के भीतर के मतभेद, सत्ता विरोधी नाराजगी (एंटी-इनकंबेंसी) और निर्दलीय उम्मीदवारों को मिले वोट शामिल हैं। मोटे तौर पर छह कारण सामने आते हैं।

पहला कारण यह है कि लगातार तीन टर्म विधायक रहने की वजह से चव्हाण को इस बार 18 साल के काम का हिसाब देना था। विरोधियों ने सवाल उठाया कि इतने साल प्रतिनिधित्व करने के बाद स्नातकों के लिए आखिर क्या किया। चव्हाण ने अपने कामों का हिसाब रखा, फिर भी बड़ा सवाल यही है कि लंबे समय तक सत्ता में रहने से पैदा होने वाली नाराजगी का उन्हें नुकसान हुआ या नहीं।

दूसरा कारण जिले की राजनीति में चव्हाण का बढ़ता दखल बताया जा रहा है। सवाल है कि क्या यह कुछ स्थानीय नेताओं को खटका। भाजपा, शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस के स्थानीय मतभेदों के चलते महायुति की पूरी ताकत उनके पीछे खड़ी हुई या नहीं, इस पर भी सवाल उठे हैं। कुछ नेताओं की नाराजगी और कार्यकर्ताओं की बेचैनी वोटों के गणित पर असर डाल सकती है।

तीसरा कारण शिवसेना की नाराजगी को माना जा रहा है। खास तौर पर यह बात सामने आई कि अब्दुल सत्तार ने डॉ. प्रतापसिंह पाटील को तरजीह दी। जिला परिषद अध्यक्ष पद के चुनाव की राजनीति में चव्हाण ने शुरू में एकनाथ शिंदे की शिवसेना के साथ रहने का रुख रखा था। फिर भाजपा के खिलाफ जाकर अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने के रुख की चर्चा हुई। लेकिन ऐन वक्त पर चव्हाण भाजपा के खेमे में चले गए, जिससे शिवसेना के कुछ नेता मुश्किल में पड़ गए, ऐसी चर्चा थी। अगर इससे शिवसेना के स्थानीय नेताओं में नाराजगी बनी, तो स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की वोटिंग पर उसका असर होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। महायुति के वोटों का बंट जाना चव्हाण के लिए नुकसानदेह रहा या नहीं, यह नतीजे का अहम सवाल है।

चौथा कारण गंगापुर विधानसभा चुनाव के दौरान चव्हाण का राजनीतिक रुख है। पार्टी बदलना और फिर घर वापसी की घटनाओं से उनकी भूमिका पर सवाल उठे। अगर बदलते समीकरणों के हिसाब से भूमिका बदलने की छवि बनी हो, तो कुछ मतदाताओं पर उसका असर हो सकता है। स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में उम्मीदवार की छवि, निरंतरता और राजनीतिक भरोसा मायने रखते हैं। इसलिए यह जांचना जरूरी होगा कि इन घटनाओं का वोटिंग पर कितना असर पड़ा।

पांचवां कारण डॉ. प्रतापसिंह पाटील का बदलाव के मुद्दे को असरदार तरीके से उठाना है। शरद पवार, सुप्रिया सुले और रोहित पवार ने उनके प्रचार के लिए जो पहल की, वह भी अहम रही। एक ही नेतृत्व को लगातार तीन टर्म देने के बाद अब नए चेहरे को मौका दिया जाए, यह रुख कुछ मतदाताओं ने अपनाया हो सकता है। चव्हाण के खिलाफ नाराजगी को विकल्प देने में प्रतापसिंह पाटील कामयाब रहे या नहीं, यह उनकी जीत के विश्लेषण का अहम मुद्दा है।

छठा कारण मतदान का प्रतिशत है। बताया जाता है कि 2020 में करीब 65 प्रतिशत वोटिंग हुई थी, जबकि इस बार यह घटकर 58.67 प्रतिशत रह गई। वोटिंग में आई इस गिरावट का ठीक-ठीक फायदा किसे मिला, यह सिर्फ प्रतिशत से नहीं कहा जा सकता। लेकिन कम वोटिंग में उम्मीदवार की प्रचार मशीनरी की ताकत, मतदाताओं से संपर्क और समर्थकों को वोट डालने के लिए बाहर निकालने की क्षमता निर्णायक होती है। चव्हाण के पारंपरिक मतदाताओं में से कितने वोट डालने निकले और विरोधियों के वोट कितने एकजुट हुए, इसका बारीकी से अध्ययन हो तो हार का गणित और साफ हो सकता है।

इस बीच, चव्हाण की हार को सिर्फ एक चुनाव की हार के तौर पर नहीं देखा जा सकता। 18 साल के सफर के खिलाफ संभावित नाराजगी, जिले की राजनीति के बदलते समीकरण, शिवसेना का असंतोष, पार्टी बदलने के रुख से उठे सवाल और डॉ. प्रतापसिंह पाटील का खड़ा किया परिवर्तन का मुद्दा, इन सभी बातों का मिलाजुला असर रहा होने की संभावना है।

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