विधान परिषद की 28 सीटों में NDA को 16, कांग्रेस को सिर्फ नागपुर की एक सीट
स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के नतीजों में NDA आगे रहा, पर लेखक अनिकेत जोशी के आकलन में महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और बिहार की कुछ हारें भाजपा को चुभने वाली हैं।
अलग-अलग राज्यों में विधान परिषद का द्विवार्षिक चुनाव हुआ। स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की कुल 28 सीटों पर वोट पड़े, जिनमें से पाँच सीटें महाराष्ट्र की थीं। नतीजों में भाजपा ने 13 सीटें जीतीं और उसके सहयोगी दलों ने तीन। इस तरह NDA के खाते में कुल 16 सीटें आईं। कांग्रेस को सिर्फ एक सीट मिली और वह महाराष्ट्र की नागपुर स्नातक सीट है।
अनिकेत जोशी के आकलन के मुताबिक उत्तर प्रदेश में यह चुनाव इसलिए अहम था कि कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने पढ़े-लिखे स्नातक वोटरों के बीच "ज्ञानू ब्रो!" आंदोलन चलाया था और देखना था कि उसका असर वोटरों पर कितना हुआ। उनके मुताबिक अगले छह महीने में उत्तर प्रदेश में नई राज्य सरकार बनेगी और यह वोटिंग उसकी एक तरह की टेस्ट थी। वहाँ भाजपा ने 11 में से छह सीटें जीतकर अपनी संख्या बचा ली। फिर भी जोशी लिखते हैं कि वाराणसी और लखनऊ की हार योगी, मोदी और शाह को खटकने वाली है। पटना की हार के बारे में भी उनकी यही राय है।
जोशी के मुताबिक कर्नाटक में, जहाँ कांग्रेस की सरकार है, विपक्षी भाजपा और जदयू ने चारों सीटें जीत लीं। वे इसे राहुल गांधी के लिए पढ़े-लिखे वोटरों का संदेश बताते हैं। उनका यह भी कहना है कि ये सारे चुनाव मतपत्रों पर होते हैं और इनमें EVM इस्तेमाल ही नहीं होती, इसलिए मतपत्र पर चुनाव कराने की विपक्ष की चुनौती अब हास्यास्पद लगेगी।
नागपुर की हार को ठाकरे और राहुल गांधी जैसे नेता सत्ताधारी पक्ष की बड़ी हार बता रहे हैं, ऐसा जोशी ने लिखा है। उनके मुताबिक यह सीट पहले भी कांग्रेस के पास थी। अभिजीत वंजारी मौजूदा विधायक थे और उन्होंने सीट बचा ली। 2020 में वंजारी की जीत से पहले ज़्यादातर चुनावों में यह सीट भाजपा के पास रही थी। इस बार वंजारी को दूसरी पसंद की गिनती तक जूझना पड़ा। पहले राउंड में भाजपा के सुधाकर कोहळे आगे थे। दोनों राउंड मिलाकर वंजारी को 67 हजार 231 वोट मिले और कोहळे को 63960। जोशी के मुताबिक कोहळे करीब तीन हजार के फर्क से हारे।
राष्ट्रवादी शरद पवार पार्टी के नितेश कराळे तीसरे मज़बूत उम्मीदवार थे। जोशी के मुताबिक महाविकास आघाडी में टिकट न मिलने पर उन्होंने बगावत की और करीब 26 हजार वोट लिए। उनके लगभग दस हजार दूसरी पसंद के वोटों में से आठ हजार वंजारी को और दो हजार भाजपा को गए। आखिर में वंजारी कोटा पूरा किए बिना ही विजयी घोषित हुए।
जोशी का कहना है कि भाजपा को अंदरूनी कलह का नुकसान नागपुर और पुणे दोनों जगह हुआ। नागपुर में पूर्व विधायक अनिल सोले ने उम्मीदवारी माँगी थी, नहीं मिली तो निर्दलीय पर्चा भरा। फडणवीस से चर्चा के बाद उन्होंने नाम वापस लिया, मगर तय समय के भीतर नहीं, इसलिए मतपत्र पर वे निर्दलीय दिखते रहे। जोशी के मुताबिक उनके समर्थकों में से करीब पंद्रह हजार ने जानबूझकर मतपत्र रद्द कराया, ऐसा शक है। रद्द मतपत्रों में पहली पसंद नहीं थी और सीधे दूसरी पसंद दर्ज थी, जिनमें कम से कम दस हजार वोट कोहळे के नाम पर थे। वे लिखते हैं कि ये वोट कोहळे को मिलते तो वे पहले ही राउंड में जीत जाते।
पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में, जो भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितीन नबीन के लोकसभा क्षेत्र में आता है, भाजपा के पाँच बार के विधायक नवल यादव हारे और राजद के कुमार जीते। दरभंगा शिक्षक सीट प्रशांत किशोर की जन सुराज ने जीती। भाजपा से निकाले गए राहुल राज ने बिहार की सरन शिक्षक सीट निर्दलीय के तौर पर जीती।
जोशी के आकलन में महायुति के भीतर कड़वाहट बढ़ रही है और भाजपा तथा शिंदे के प्रवक्ता आपस में भिड़ रहे हैं। उनके मुताबिक मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस शिक्षा और परिवहन जैसे विभागों में शिंदे के मंत्रियों के फैसले बदल रहे हैं, जिससे सरनाईक नाराज़ हैं। पुणे, अमरावती और औरंगाबाद में भी महायुति के घटक एक-दूसरे के सामने दिखे, ऐसा उन्होंने लिखा है।
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