तोतरेपन पर "ठीक से बोलो" का दबाव बढ़ा सकता है बोलने का डर, नायर अस्पताल की डॉक्टर ने बताया
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अंतरराष्ट्रीय तोतरेपन जागरूकता दिवस पर नायर अस्पताल की ऑडियोलॉजी और स्पीच थेरेपी विभाग प्रमुख डॉ. ज्योती मोहिते ने बच्चों के बोलने की दिक्कत और स्पीच थेरेपी पर जानकारी दी।
"ठीक से बोल", "अटक मत", "क्या कह रहा है, साफ-साफ बता"। बच्चों से अक्सर यूं ही कह दिए जाने वाले ये शब्द कभी-कभी उनके मन में बोलने का ही डर बैठा सकते हैं। कोई बच्चा भाषा सीखते वक्त अटक रहा हो और उसे बार-बार टोका जाए, चिढ़ाया जाए या डांटा जाए, तो उसका आत्मविश्वास डगमगा सकता है। आगे बोलते हुए फिर अटक जाऊंगा, यह सोच उसकी जुबान को और ज्यादा अटका सकती है। इसलिए तोतरेपन को बोलने की खराबी के तौर पर नहीं, बल्कि इंसान के आत्मविश्वास से जुड़ी समस्या के तौर पर देखना जरूरी बताया गया है।
22 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय तोतरेपन जागरूकता दिवस मनाया जाता है और इसी मौके पर यह मुद्दा फिर चर्चा में आया है। तोतरेपन का मतलब है बोलते समय शब्दों या अक्षरों का दोहराया जाना, आवाज का खिंच जाना या बोलने में रुकावट आना। छोटे बच्चों में भाषा सीखने के दौर में अटकना दिख सकता है, लेकिन हर बार वह तोतरेपन की निशानी हो, ऐसा जरूरी नहीं। अटकने का तरीका क्या है, वह कितने समय से है और बातचीत पर उसका क्या असर पड़ रहा है, इसकी जांच विशेषज्ञों से करवाना अहम है।
नायर अस्पताल के ऑडियोलॉजी और स्पीच थेरेपी विभाग की प्रमुख डॉ. ज्योती मोहिते के मुताबिक बोलते समय सांस, आवाज और उच्चारण के बीच सही तालमेल होना चाहिए। इस प्रक्रिया में कहीं रुकावट आए तो बोलने में अटकना दिख सकता है। इसके ऊपर कोई बुरा अनुभव, लोगों के सामने बोलने का डर या पहले हुई खिल्ली मानसिक दबाव बढ़ा सकती है। कुछ लोगों को अनजान लोगों के सामने बोलने में दिक्कत होती है, जबकि कुछ को जान-पहचान वालों के सामने भी बोलते हुए तनाव होता है।
तोतरेपन समेत कई तरह की बोलने की दिक्कतों पर स्पीच थेरेपी के जरिए काम किया जाता है। नायर अस्पताल में हर दिन स्पीच थेरेपी की ओपीडी चलती है, जहां कम से कम 50 से 60 मरीजों को थेरेपी दी जाती है। नियमित इलाज के लिए आने वाले मरीजों के साथ नए मरीज भी भर्ती होते हैं। इनमें ऐसे मरीज भी हैं जो निजी अस्पतालों में इलाज के बाद भी जरूरी मदद न मिलने पर नायर आते हैं।
स्पीच थेरेपी की जरूरत सिर्फ तोतरेपन में नहीं पड़ती। लकवे की वजह से बोलने में दिक्कत झेलने वाले मरीजों, कटे होंठ के कारण बोलने पर असर पड़े मरीजों और दूसरी बातचीत संबंधी समस्याओं वाले लोगों को भी इसकी जरूरत होती है। यानी इस इलाज का मकसद सिर्फ साफ बोलना नहीं है, बल्कि इंसान फिर से बातचीत कर सके और रोजमर्रा की जिंदगी में आत्मविश्वास से शामिल हो सके, यह भी है।
डॉ. ज्योती मोहिते ने बताया कि स्पीच थेरेपी की जानकारी न होने से कई लोग इलाज के लिए देर से आते हैं। थेरेपी में कुछ तकनीकें सिखाई जाती हैं और सत्रों में उनका अभ्यास करवाया जाता है। उन्होंने कहा कि नायर 60 साल पहले शुरू हुआ स्पीच थेरेपी केंद्र है और दक्षिण-पूर्व एशिया का पहला केंद्र है। स्पीच थेरेपी सिखाने वाले केंद्र भी कम हैं, इसे प्रशासन नोट करे। राज्य में नायर, अलियावर जंग और भारती विद्यापीठ, ये तीन ही केंद्र हैं।
डॉ. मोहिते के अनुसार, परिवार में कोई अटक कर बोलता हो और थेरेपी लगातार जारी रखी जाए, तो वह बिना अटके बोल सकता है। उन्होंने कहा कि इसके लिए प्रशासन और माता-पिता, दोनों की तरफ से जागरूकता चाहिए।
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