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ठाणे के नौपाडा में घंटाली देवी मंदिर, डेढ़ से ढाई सौ साल पुरानी आस्था की कहानी

ठाणे के नौपाडा इलाके का श्री घंटाली देवी मंदिर कोली और पाठारे प्रभू समाज की कुलदेवता का स्थान है। इसका इतिहास करीब 150 से 250 साल पुराना बताया जाता है।

ठाणे के नौपाडा में घंटाली देवी मंदिर, डेढ़ से ढाई सौ साल पुरानी आस्था की कहानी तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

ठाणे शहर की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में श्री घंटाली देवी मंदिर की खास जगह है। नौपाडा इलाके के घंटाली पथ पर बना यह पुराना मंदिर कई ठाणेवासियों की आस्था का केंद्र है। देवी पर पक्का भरोसा, पीढ़ियों से निभाई जा रही परंपराएं और मंदिर से जुड़ी ऐतिहासिक यादें इसे खास बनाती हैं। शहर जितना फैलता गया, मंदिर ने अपना धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व उतना ही बनाए रखा।

मंदिर का इतिहास करीब 150 से 250 साल पुराना बताया जाता है। अलग-अलग लेखों में यही जिक्र मिलता है। लेकिन मंदिर किस साल बना, किसने बनवाया और देवी की मूर्ति कैसे प्रकट हुई, इसके बारे में सबको मान्य ऐतिहासिक रिकॉर्ड आसानी से नहीं मिलते। इसलिए इसका इतिहास समझने के लिए स्थानीय परंपरा, भक्तों की श्रद्धा और मौजूद ऐतिहासिक उल्लेखों को साथ रखकर देखना पड़ता है।

ठाणे को पुराने समय से धार्मिक, व्यापारी और सांस्कृतिक विरासत मिली है। कोंकण तट से रिश्ता, अलग-अलग समाजों का बसेरा और स्थानीय देवताओं के आसपास बनी परंपराओं की वजह से यहां के मंदिर सामाजिक जीवन में अहम रहे हैं। घंटाली देवी मंदिर भी इसी परंपरा का एक अहम हिस्सा माना जाता है। देवी को इलाके के भक्तों की रक्षा करने वाली और मन्नतें पूरी करने वाली माना जाता है। मुसीबत में देवी को पुकारना, मन्नत मांगना और मुराद पूरी होने पर दर्शन करके शुक्रिया अदा करना, यह सब यहां भक्तों की धार्मिक जिंदगी का हिस्सा है।

मंदिर को लेकर एक मशहूर कथा है। कहा जाता है कि पहले इस इलाके में घनी झाड़ियां और एक तालाब था। तालाब के किनारे भगवान शंकर का मंदिर था। वहां रोज दर्शन के लिए आने वाले एक भक्त को सपने में दिखा कि तालाब के पास आम के पेड़ के पीछे देवी की मूर्ति है। स्थानीय परंपरा के मुताबिक इसके बाद मूर्ति मिली और विधि-विधान से पूजा करके उसकी स्थापना की गई। भक्तों का विश्वास है कि देवी की मूर्ति स्वयंभू है।

नाम के पीछे भी एक लोकपरंपरा बताई जाती है। घंटाली नाम को 'घंटा' और 'टाली' शब्दों से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि मन्नत पूरी होने पर मंदिर में घंटा बांधने की रीत थी, इसी से देवी का नाम घंटाली पड़ा।

श्री घंटाली देवी को कोली और पाठारे प्रभू समाज की कुलदेवता माना जाता है। इन समाजों के कई परिवारों की धार्मिक परंपराओं में देवी के दर्शन और पूजा का खास स्थान है। घर के शुभ काम, त्योहार या खास मौकों पर देवी का आशीर्वाद लेने की रीत इसी श्रद्धास्थान से जुड़ी है। कुलदेवता की पूजा सिर्फ निजी आस्था तक सीमित नहीं रहती। इससे परिवार की परंपरा, पुरखों से रिश्ता और समाज की सांस्कृतिक एकता भी बची रहती है।

मंदिर के मुख्य गर्भगृह में घंटाली देवी, महिषासुरमर्दिनी और दुर्गा देवी की मूर्तियां हैं। मंदिर के उपलब्ध ब्योरों में यही बताया गया है। देवी के इन रूपों में शक्ति और बुरी प्रवृत्तियों का नाश करने वाली आदिशक्ति की सोच दिखती है।

पुरानी बनावट में मंदिर लकड़ी का था और भगवान शंकर तथा घंटाली देवी के लिए अलग-अलग गर्भगृह थे। बाद में ढांचे में बदलाव हुए। सन 1901 में इन दोनों गर्भगृहों के बीच नया गर्भगृह बनाकर श्रीराम की मूर्ति स्थापित की गई। मंदिर में महादेव की पिंड के साथ श्रीराम, लक्ष्मण, सीता और हनुमान की मूर्तियों के भी दर्शन होते हैं। आहाते में दीपमालाएं और बड़ा दर्शन मंडप है, जिससे परिसर में धार्मिक माहौल बनता है। आधुनिक शहरी इलाके में होने के बावजूद मंदिर ने पारंपरिक देवस्थान का रूप बचाकर रखा है।

इतिहास के लिहाज से सन 1882 के Gazetteer of the Bombay Presidency में आए उल्लेख को अहम माना जाता है। मौजूद संदर्भों के मुताबिक मंदिर का जिक्र इस गजेटियर के चौदहवें खंड में है। उस समय मंदिर का परिसर 'बॉम्बे रोड' कहलाने वाले रास्ते के पास था। संदर्भों में यह भी दर्ज है कि मंदिर को तब की ब्रिटिश सरकार से सालाना चार रुपये का भत्ता मिलता था। इन रिकॉर्ड से साफ होता है कि उन्नीसवीं सदी में भी मंदिर मौजूद था और उसका धार्मिक महत्व था। फिर भी मंदिर किस साल बना, इसका कोई पक्का सबूत नहीं है।

मंदिर के निर्माण का श्रेय रावसाहेब केशवराज भास्करजी कोठारे के पूर्वजों को दिया जाता है। आगे चलकर देखभाल, मरम्मत और आसपास के बदलाव होते रहे। सन 1940 और 1972 में मंदिर का जीर्णोद्धार होने के उल्लेख भी मिलते हैं।

नवरात्रि मंदिर का खास उत्सव है। नौ दिनों में देवी की पूजा, आरती, धार्मिक कार्यक्रम और रंगीन बिजली की सजावट होती है। इन दिनों दर्शन के लिए आने वाले भक्तों की तादाद बढ़ जाती है और पूरा इलाका भक्ति के माहौल में डूब जाता है।

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