साइबेरिया में भालुओं का खौफ, सितंबर में सात की मौत; पर्यावरण मंत्रालय पर लापरवाही का केस
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साइबेरिया के क्रास्नोयार्स्क में भूरे भालुओं के हमलों से दहशत है। पिछले एक साल में 22 लोगों की जान गई है और सरकार ने शिकारियों को परमिट देना शुरू किया है।
रूस के सबसे ठंडे इलाकों में गिने जाने वाले साइबेरिया से इन दिनों डराने वाली खबर आ रही है। जंगलों से निकलकर बड़े-बड़े भूरे भालू (Brown Bears) सीधे इंसानी बस्तियों पर हमले करने लगे हैं। भालुओं की तादाद बढ़ी है और वे पहले से ज्यादा खूंखार भी हो गए हैं, इसलिए पूरे इलाके में दहशत फैली हुई है। पिछले एक साल में इन हमलों में 22 लोगों की जान जा चुकी है और कई लोग गंभीर रूप से जख्मी हुए हैं।
स्थानीय प्रशासन से मिली जानकारी के मुताबिक इस आफत का सबसे बड़ा केंद्र क्रास्नोयार्स्क (Krasnoyarsk) बन गया है। कहा जा रहा है कि सिर्फ इसी इलाके में 27,000 से ज्यादा भालू घूम रहे हैं। सितंबर में चंद दिनों के फर्क से सात लोगों को भालुओं ने फाड़ कर मार डाला। अब भालू जंगल की सरहद तक सीमित नहीं हैं। वे पब्लिक पार्कों, मुख्य सड़कों और लोगों के घरों के आंगन तक में बेखौफ घूमते दिख रहे हैं। लोगों ने खुद को घरों में बंद कर लिया है।
सरकारी आंकड़ों को देखें तो पिछले तीन दशक में रूस में भूरे भालुओं की गिनती करीब दोगुनी हो गई है और 3,08,000 के पार पहुंच चुकी है। इसकी एक बड़ी वजह जलवायु परिवर्तन (Global Climate Change) को माना जा रहा है। साइबेरिया में सर्दी अब पहले से छोटी और नरम होने लगी है, जिससे भालुओं की गहरी नींद (Hibernation) का वक्त घट गया है।
पर्यावरण के जानकारों का कहना है कि इस साल वसंत बहुत जल्दी आ गया और सूखा रहा। नतीजे में जंगल में बेरी जैसे फलों और दूसरे कुदरती खाने की भारी कमी हो गई। भूखे भालुओं को खाने की तलाश में सैकड़ों किलोमीटर भटकना पड़ा और उनका रास्ता सीधे इंसानी बस्तियों की तरफ मुड़ गया। बस्तियों के बाहर खुले में फेंका जाने वाला खाने का कचरा भी उन्हें आसानी से खाना मिलने का लालच देता है, और इसी वजह से वे आबादी वाले इलाकों में घुस रहे हैं।
क्रास्नोयार्स्क और आसपास के गांवों में आम जिंदगी पूरी तरह बिगड़ गई है। मां-बाप ने बच्चों को बाहर खेलने भेजना बंद कर दिया है। बूढ़ा हो या जवान, अकेले घर से निकलने की हिम्मत कोई नहीं करता। कई लोग अपनी हिफाजत के लिए हथियार या राइफल लेकर ही बाहर निकल रहे हैं। स्थानीय लोगों ने कहा, "हमें ऐसा लग रहा है जैसे हम अपने ही घरों में बंधक (Hostages) बन गए हैं।"
बगीचों में भालुओं का आराम से बैठे रहना या घरों के कचरे के डिब्बे उलट देना अब रोज की बात हो गई है। लोगों का गुस्सा प्रशासन पर फूट पड़ा है। आरोप लग रहा है कि वन्यजीव विभाग ने वक्त रहते सही कदम नहीं उठाए। बढ़ते जन आक्रोश के बीच जांच अधिकारियों ने स्थानीय पर्यावरण मंत्रालय के खिलाफ लापरवाही का केस दर्ज करके जांच शुरू कर दी है।
भालुओं की बढ़ती आक्रामकता से परेशान रूसी सरकार ने आखिरकार सख्त कदम उठाया है। इंसानी सुरक्षा और कुदरत का संतुलन दोनों खतरे में देखकर सरकार ने नियंत्रित शिकार मुहिम (Culling Process) को हरी झंडी दे दी है। जिन इलाकों में भालुओं का खतरा सबसे ज्यादा है, वहां शिकारियों को बुलाया गया है और उन्हें खास परमिट दिए जा रहे हैं।
जानकारों का कहना है कि वन्यजीवों को बचाना जरूरी है, लेकिन जब इंसानों की जान पर बन आए तो प्रशासन को ऐसे कड़े फैसले लेने ही पड़ते हैं। खतरनाक भालुओं की गिनती काबू में करने की कोशिशें फिलहाल युद्धस्तर पर चल रही हैं, ताकि साइबेरिया के लोग फिर से महफूज और सामान्य जिंदगी जी सकें।
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