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पुलिस स्मृति दिवस पर नागपुर में शहीदों को सलामी, 153 नाम पढ़े गए

नागपुर सिटी पुलिस मुख्यालय के शहीद स्मारक पर बुधवार को पुलिस स्मृति दिवस मनाया गया।

पुलिस स्मृति दिवस पर नागपुर में शहीदों को सलामी, 153 नाम पढ़े गए तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

नागपुर में बुधवार को पुलिस स्मृति दिवस मनाया गया। सिटी पुलिस मुख्यालय के शहीद स्मारक पर हुए कार्यक्रम में देश की सेवा में जान गंवाने वाले पुलिसवालों को श्रद्धांजलि दी गई। वरिष्ठ न्यायिक और पुलिस अधिकारी, रिटायर्ड अफसर, ड्यूटी पर तैनात जवान और आम नागरिक वहां जमा हुए। सबने उन लोगों की हिम्मत, लगन और सर्वोच्च बलिदान को याद किया, जो देश और लोगों की हिफाजत करते हुए मारे गए।

कार्यक्रम नागपुर सिटी पुलिस कमिश्नरेट और शहर की दूसरी पुलिस इकाइयों ने मिलकर किया। मुख्य अतिथि बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच के प्रशासकीय जज जस्टिस अनिल किलोर थे। उनके साथ पुलिस कमिश्नर विश्वास नांगरे पाटिल, संयुक्त पुलिस आयुक्त नवीनचंद्र रेड्डी और दूसरे वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।

समारोह में देशभर में ड्यूटी के दौरान जान गंवाने वाले 153 पुलिस अफसरों और जवानों के नाम पढ़े गए। नागपुर सिटी पुलिस, नागपुर ग्रामीण पुलिस, रेलवे पुलिस और राज्य रिजर्व पुलिस बल (SRPF) समूह क्रमांक 4 के कुल 120 जवानों ने परेड में हिस्सा लिया और शहीदों को सलामी दी। पुलिस बैंड भी इस मौके पर शामिल था।

परेड की अगुवाई नागपुर सिटी पुलिस मुख्यालय के रिजर्व पुलिस इंस्पेक्टर विनोद तिवारी ने की। कार्यक्रम का संचालन सहायक पुलिस आयुक्त नरेंद्र हिवरे ने किया। देशभर के 153 शहीदों के नाम सहायक पुलिस आयुक्त शिवप्रसाद पारवे और पुलिस इंस्पेक्टर अरुण क्षीरसागर ने पढ़े। नाम पढ़े जाने के बाद मुख्य अतिथि, वरिष्ठ अफसरों, पुलिसकर्मियों और नागरिकों ने शहीद स्मारक पर पुष्पचक्र और फूल चढ़ाए। माहौल गमगीन रहा और लोगों ने शहीदों के परिवारों के बोझ को भी याद किया।

यह दिन हर साल 21 अक्टूबर को मनाया जाता है। यह 1959 में लद्दाख के हॉट स्प्रिंग्स में चीनी फौज से हुई भिड़ंत में जान देने वाले पुलिसवालों की याद में है। उस साल 21 अक्टूबर को CRPF के सब-इंस्पेक्टर करम सिंह की अगुवाई में भारतीय पुलिस की 10 सदस्यों वाली गश्ती टुकड़ी उस दूरदराज और ऊंचाई वाले इलाके में ड्यूटी पर थी। तभी उसका सामना दुश्मन चीनी फौज से हुआ। मुश्किल जमीन और भारी ठंड की वजह से वहां गश्त वैसे ही कठिन थी।

टुकड़ी पर automatic हथियारों से गोलीबारी हुई। भारी हथियारों से लैस विरोधी के सामने भी भारतीय जवानों ने अपनी जगह की हिफाजत में गजब की हिम्मत दिखाई। टुकड़ी के दस सदस्यों ने सर्वोच्च बलिदान दिया। यह घटना फर्ज, बहादुरी और देश के प्रति समर्पण की मिसाल बन गई।

शहीद हुए जवानों में धरम सिंह, पूरन सिंह, नारबू लांबा, बेग राज मल, माखन लाल, इमान सिंह, तेशरिंग बोखू, नारबू, हंगजीत सुब्बा और शिव नाथ प्रताप शामिल थे। उनके पार्थिव शरीर भारत को सौंपे गए और 14 नवंबर 1959 को हॉट स्प्रिंग्स में पूरे सरकारी सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। बाद में वहीं उनकी याद में स्मारक बनाया गया। उस पर लिखा है: "जब तुम घर जाओ तो उन्हें हमारे बारे में बताना, उनके आने वाले कल के लिए हमने अपना आज दे दिया।" यह संदेश याद दिलाता है कि नागरिकों को जो सुरक्षा मिलती है, वह उन जवानों की वजह से है जो फर्ज को अपनी जान से ऊपर रखते हैं।

कार्यक्रम में जस्टिस किलोर और पुलिस कमिश्नर नांगरे पाटिल के अलावा SRPF के विशेष पुलिस महानिरीक्षक निसार तंबोली और नागपुर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक संदीप पाटिल भी आए। अतिरिक्त पुलिस आयुक्त विनीता साहू, वसंत परदेशी और राजेंद्र डभाडे, नागपुर ग्रामीण के पुलिस अधीक्षक हर्ष पोद्दार, हाईवे पुलिस अधीक्षक लोहित मटानी, SRPF समूह 4 के कमांडेंट बच्चन सिंह, रेलवे पुलिस अधीक्षक मंगेश पोपट शिंदे, जेल पुलिस अधीक्षक वैभव आगे और वायरलेस एवं सिग्नल्स विभाग के सुनील सावंत भी मौजूद रहे।

पुलिस उपायुक्त अन्नपूर्णा सिंह, रश्मिता राव, नित्यानंद झा, माहेक स्वामी, आदित्य मिरखेलकर, रमेश धुमाल, डॉ संदीप पाखले और राहुल माकणीकर भी कार्यक्रम में पहुंचे। नागपुर ग्रामीण के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अनिल म्हस्के, जेल विभाग की अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक दीपा आगे, सहायक आयुक्त, अलग-अलग पुलिस स्टेशनों के सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर, रिटायर्ड अफसर, जवान और आम लोग श्रद्धांजलि में शामिल हुए।

पुलिस स्मृति दिवस सिर्फ सालाना रस्म नहीं है। यह उन खतरों को मानने का दिन है, जो पुलिस को अपराधियों से भिड़ते, जुर्म रोकते, कानून-व्यवस्था संभालते, आपात हालात में पहुंचते और मुश्किल व अनिश्चित हालात में लोगों को बचाते वक्त उठाने पड़ते हैं। पुलिस अफसर और कांस्टेबल अक्सर लंबे घंटे काम करते हैं, परिवार से दूर रहते हैं और कठिन हालात में ड्यूटी निभाते हैं। कई बार रोज की एक ड्यूटी ही उनकी आखिरी ड्यूटी बन जाती है। समारोह इस संकल्प के साथ खत्म हुआ कि शहीदों के मूल्य, यानी हिम्मत, अनुशासन, ईमानदारी और फर्ज के प्रति अटूट निष्ठा, कायम रखे जाएंगे।

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