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21:14 IST

नवरात्रि में घट के जवारे: हरे-भरे हों या मुरझाए, क्या है मान्यता और कैसे होता है विसर्जन

घटस्थापना में बोए गए जवारों को समृद्धि और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। जानिए इस परंपरा का धार्मिक अर्थ और विसर्जन के तरीके।

नवरात्रि में घट के जवारे: हरे-भरे हों या मुरझाए, क्या है मान्यता और कैसे होता है विसर्जन तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

नवरात्रि शुरू होते ही घर-घर में घट बैठाया जाता है। घटस्थापना की बड़ी अहमियत है। पहले दिन लोग घट बैठाकर देवी की पूजा करते हैं। इसी दौरान मिट्टी के बर्तन में गेहूं, जौ जैसा अनाज बोया जाता है। कुछ दिन बाद उसमें छोटे-छोटे हरे अंकुर निकल आते हैं, जिन्हें जवारे कहा जाता है। यह सिर्फ एक पौधा नहीं है, हमारी परंपरा में इसका बड़ा मतलब है। हरा पौधा समृद्धि, नए जीवन और अच्छे बदलाव की निशानी माना जाता है।

जवारे बोने का तरीका सीधा है। नवरात्रि के पहले दिन घट बैठाते समय एक मिट्टी के बर्तन में गेहूं बोया जाता है। कोई जौ बोता है, तो कोई अपने गांव की रीत के हिसाब से दूसरा अनाज डालता है। रोज उस पर थोड़ा पानी छिड़का जाता है। तीन-चार दिन में ही हरे अंकुर फूटने लगते हैं। नवरात्रि के नौ दिनों में इन पौधों को बढ़ते देखना अपने आप में एक विधि है। हरियाली देखकर मन खुश होता है, और इसे नए जीवन और प्रकृति की ताकत का प्रतीक माना जाता है।

धार्मिक नजरिए से देखें तो अनाज को अन्न माना जाता है और अन्न का मतलब लक्ष्मी। इसलिए घट में बोए अनाज में अंकुर फूटना देवी की कृपा से घर में सुख-समृद्धि आने का संकेत माना जाता है। नवरात्रि में दुर्गा माता की पूजा होती है, जो शक्ति का रूप हैं, और ये पौधे भी शक्ति और सृजन के ही प्रतीक हैं। एक छोटा-सा बीज जमीन से ऊपर आकर पौधा बनता है, यानी खत्म हो चुकी चीज से फिर नई शुरुआत होती है। इससे यह संदेश भी मिलता है कि संकट के बाद इंसान को फिर खड़ा होना चाहिए और उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए।

हरे पौधे को समृद्धि का प्रतीक इसलिए माना जाता है कि हमारी संस्कृति खेती से जुड़ी है। पहले से यही समझा जाता रहा है कि फसल अच्छी आई तो घर में अनाज भरपूर होगा, यानी खुशहाली आएगी। इसी वजह से यह मान्यता है कि घट का अनाज अच्छा बढ़े तो फसल अच्छी होगी और घर में बरकत रहेगी। पौधे के बढ़ने के लिए पानी, हवा और धूप, सब कुछ ठीक चाहिए। प्रकृति का साथ हो तभी बीज अंकुरित होता है। इसलिए यह विधि सिर्फ धर्म से नहीं, प्रकृति के चक्र से भी जुड़ी है।

नवरात्रि में लोग रोज इन पौधों को देखते हैं। पौधे हरे-भरे और ऊंचे बढ़ें तो उसे शुभ माना जाता है। लेकिन असल में पौधों की बढ़त इस पर निर्भर करती है कि बीज कैसा था, मिट्टी कैसी है, पानी कितना डाला गया और धूप मिली या नहीं। पौधा ऊंचा बढ़ा तो पैसा आएगा या कम बढ़ा तो बुरा होगा, इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। इसलिए इसे श्रद्धा और सकारात्मकता के प्रतीक के तौर पर देखना चाहिए।

नौ दिन पूरे होने पर दसवें दिन घट का विसर्जन किया जाता है। हर घर में इसका तरीका अलग होता है। कुछ लोग ये पौधे देवी को चढ़ाते हैं। कुछ लोग इन्हें टोपी पर या सिर पर रखते हैं और प्रसाद के तौर पर लेते हैं। कुछ जगह इन पौधों को खेत में ले जाकर मिट्टी में मिला दिया जाता है। गांव-गांव में यह रीत अलग-अलग है।

कुल मिलाकर घट के जवारे सिर्फ पूजा का हिस्सा नहीं हैं। इनसे देवी की शक्ति, भक्ति और प्रकृति का संदेश मिलता है। देवी की पूजा से मन को बल मिलता है और इन हरे पौधों को देखकर नई शुरुआत की प्रेरणा मिलती है। इसीलिए इस परंपरा को सिर्फ विधि नहीं, बल्कि प्रकृति से रिश्ते के प्रतीक के रूप में देखा जाना चाहिए।

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