नागपुर में दशहरा संबोधन: भागवत ने OTT पर लगाम, नशे के खिलाफ मुहिम और कानून के दायरे में आंदोलन की बात कही
नागपुर में RSS के शताब्दी वर्ष समापन और विजयादशमी उत्सव पर सरसंघचालक मोहन भागवत ने स्वदेशी, OTT प्लेटफॉर्म्स, नशे और आंदोलनों पर अपनी बात रखी।
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नागपुर के रेशिमबाग मैदान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का विजयादशमी उत्सव हर साल की तरह हुआ। इस बार यह मौका खास था, क्योंकि संघ के सौ साल पूरे होने का साल यहीं खत्म हो रहा है। मंच से संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने लोगों को संबोधित किया। उन्होंने संघ के सौ साल के सफर, देश की सांस्कृतिक पहचान, समाज में बराबरी और मेलजोल और दुनिया के सामने खड़ी चुनौतियों पर बात की। उनकी अपील थी कि सब लोग मिलकर देश बनाने के काम में लगें।
भागवत ने कहा कि हर आदमी को अपने 'स्व' की पहचान होनी चाहिए और स्वदेशी को सिर्फ नारा नहीं, रोज की जिंदगी का हिस्सा बनाना चाहिए। संविधान का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि उसमें हम सबको 'हम भारत के लोग' कहा गया है, यानी इतनी विविधता के बाद भी एक ऐसा समाज, जो दिल से एक है। उनके मुताबिक यह आपसी जुड़ाव और गहरा होता रहे, यह बात संविधान के मार्गदर्शक सिद्धांतों में भी साफ लिखी हुई है।
अपने भाषण में उन्होंने कई बड़े नामों को याद किया। संत शिरोमणि रविदास जी की 650वीं जयंती है, स्वामी श्रद्धानंद को बलिदान हुए 100 साल हो गए हैं, और स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती के काम को भी उन्होंने याद किया। लोगों से कहा गया कि इनके जीवन से सीख लें। भागवत ने बताया कि जिस 'स्व' के लिए इन महापुरुषों ने अपनी जान दी, उसी आत्मबोध को स्वदेशी मेलों के सहारे जगाने की कोशिश बंगाल के राज नारायण बसु ने की थी। वे 'हिंदू मेला' के प्रेरक और शुरू करने वाले थे, और यह उनके जन्म का 200वां साल भी है।
पड़ोसी नेपाल में जो हुआ, उस पर भागवत ने फिक्र जताई। उन्होंने कहा कि वहां हजारों लोगों की जान चली गई और इसकी एक वजह यह भी है कि भारत, तिब्बत, भूटान और चीन तक फैले पूरे हिमालय इलाके में विकास एकतरफा तरीके से हुआ है। उनका कहना था कि अब विकास को पूरी तस्वीर देखकर और संतुलन के साथ सोचना पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि देश की एकता की असली नींव सनातन संस्कृति है, जो हर पंथ और हर जाति को इज्जत देती है। समाज को बेहतर बनाने के लिए उन्होंने पांच चीजें अपनाने को कहा: समरसता, परिवार के संस्कार (कुटुंब प्रबोधन), पर्यावरण की फिक्र, स्व-बोध और नागरिक अनुशासन।
मोबाइल, सोशल मीडिया और नई तकनीक के बुरे असर पर भी भागवत ने खुलकर बात की। उनका कहना था कि बच्चों और नौजवानों को सही और गलत में फर्क करना सिखाना जरूरी है, और OTT प्लेटफॉर्म्स पर ठीक से नियंत्रण होना चाहिए। उन्होंने माना कि पहले घर के बड़ों से, स्कूल की पढ़ाई से और आसपास के माहौल से यह समझ मिल जाती थी, लेकिन अब यह दिन पर दिन घटती जा रही है। कई देशों में नई पीढ़ी बिना सोचे-समझे इन चीजों में डूब गई, बुरे नतीजे सामने आए और तब जाकर वहां कुछ रोक-टोक और पाबंदियां लगाई गईं। भागवत के हिसाब से अपने देश में भी, खासकर OTT को लेकर, समाज यह जरूरत महसूस कर रहा है।
नशे को उन्होंने देश की गंभीर समस्या बताया। उनका कहना था कि समझ की कमी की वजह से दुनिया भर में नौजवान ड्रग्स की चपेट में आ रहे हैं। सरकार, प्रशासन और समाज, सबको वक्त रहते कदम उठाने होंगे। उन्होंने भरोसा दिलाया कि स्वयंसेवक सबको साथ लेकर पूरे देश में इसके खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश करेंगे।
'हिंदू भाव' का मतलब समझाते हुए भागवत ने कहा कि यह किसी एक तरह की पूजा या एक भाषा में बंधा हुआ नहीं है। यह अध्यात्म, इंसानियत और पूरी दुनिया को अपना मानने की सोच है, जो सारे संसार को जोड़ सकती है। इसके लिए कोई खास पूजा का तरीका, खाना-पीना, रहन-सहन, राजनीतिक या सामाजिक विचार, जाति, भाषा या इलाका जरूरी नहीं है।
भाषण का सबसे तीखा हिस्सा उन ताकतों के बारे में था, जो देश को कमजोर करना चाहती हैं। भागवत ने कहा कि वे जानते हैं कि श्रोता ये बातें अच्छी तरह समझते हैं, फिर भी दोहरा रहे हैं, क्योंकि माहौल ऐसा है या बनाया जा रहा है कि समझदार आदमी भी डगमगा जाए। उन्होंने एक तरफ भारत की बढ़ती साख की तारीफ की और दूसरी तरफ बाहरी और अंदरूनी ताकतों से चौकस रहने को कहा। उनके मुताबिक भारत समेत पूरी दुनिया में जो भी भलमनसाहत, शुभ और सांस्कृतिक व इंसानी संस्कार बचे हैं, उन्हें मिटाने का आसुरी इरादा लेकर पश्चिम से एक आंधी उठी है। इससे तथाकथित विकसित देश भी परेशान और बेबस हैं।
भागवत ने कहा कि बीते दशकों में भारत ने अपनी ताकत और सही नीति के बल पर दुनिया में धीरे-धीरे अपनी जगह बनाई है। समाज की मेहनत, मजबूत नीतियां, नेतृत्व, देश पर गर्व और दुनिया के प्रति जिम्मेदारी का एहसास जागने से देश हर क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है। उनका कहना था कि भारत की इस तरक्की से उन लोगों का खेल खत्म होगा, जो दूसरे मुल्कों में अराजकता फैलाकर अपने मोहरों को गद्दी पर बिठाते हैं और अपना मतलब साधते हैं। यही वजह है कि भारत उनके लिए सबसे बड़ा प्रतिस्पर्धी और आखिरी निशाना है। भागवत के मुताबिक ये ताकतें सोच-समझकर योजना बनाती हैं कि भारत, हिंदू समाज और संघ को कैसे तोड़ा जाए। उन्हें अपने जैसी सोच वाले कुछ लोग मदद के लिए मिल जाते हैं, और छोटे सत्तास्वार्थ और समझ की कमी के चलते देश के कुछ महत्वाकांक्षी नेता भी उनके साथ हो लेते हैं।
देश में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और विपक्ष की तरफ से चल रहे विरोध प्रदर्शनों की तरफ इशारा करते हुए भागवत ने कहा कि इतने बड़े समाज में दिक्कतें भी होंगी और व्यवस्था में खामियां भी, इसलिए आंदोलन होना स्वाभाविक है। लेकिन आंदोलन का मकसद हल निकालना होना चाहिए। उन्होंने कहा कि चाहे आंदोलन करने वाला कोई भी तबका हो, या शांति बनाए रखने के लिए कार्रवाई करने वाला प्रशासन या नेता, सबको ख्याल रखना होगा कि एक पूरे समाज के भीतर उनके कदम से मनमुटाव, नफरत, कड़वाहट या बंटवारा पैदा न हो। जज्बात कितने भी उबल रहे हों, सब कुछ संविधान और कानून की हद में और शालीनता के साथ होना चाहिए। साथ ही वोट, सस्ती लोकप्रियता या सियासी फायदे का लालच समझदारी और भाईचारे पर भारी न पड़े, इसकी फिक्र करनी ही पड़ेगी।
भागवत ने यह भी कहा कि समाज की हर समस्या का हल सिर्फ सरकार नहीं निकाल सकती और न ही हर समस्या आंदोलन से सुलझती है, ऐसा अब तक का अनुभव नहीं रहा। समाज खुद सक्रिय हो और लोग आपस में बातचीत करें, तो इस रास्ते से भी हल निकल सकता है।
आखिर में उन्होंने हर नागरिक से कहा कि वह अपना फर्ज निभाए और भारत को फिर से विश्वगुरु और हर तरह से संपन्न राष्ट्र बनाने का संकल्प लेकर आगे बढ़े।