शुक्रवार, 6 नवंबर 2026

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नागालैंड के लोंगवा में सीमा गांव प्रमुख के घर के बीच से गुजरती है, एक हिस्सा म्यांमार में

कल्चर PT24 टीम

मोन जिले का लोंगवा गांव भारत और म्यांमार की सीमा पर बसा है। यहां अंतरराष्ट्रीय सीमा गांव के पारंपरिक प्रमुख आंग के घर से होकर जाती है।

दुनिया में कई ऐसी जगहें हैं जिनके बारे में सुनकर हैरानी होती है। नागालैंड का लोंगवा (Longwa) गांव ऐसी ही एक जगह है। यह गांव भारत और म्यांमार (Myanmar) की सीमा पर बसा है और अपनी बनावट के साथ-साथ अपनी जीवनशैली की वजह से भी पूरी दुनिया में चर्चा में रहता है। आम तौर पर सीमा रेखा किसी नदी या मैदान से गुजरती है, मगर यहां अंतरराष्ट्रीय सीमा सीधे गांव के प्रमुख के रहने के घर के बीच से जाती है।

लोंगवा नागालैंड के मोन (Mon) जिले में है और इस जिले के सबसे बड़े और अहम गांवों में गिना जाता है। गांव के चारों तरफ हरी-भरी पहाड़ियां, गहरी घाटियां और घना जंगल है, जो यहां की खूबसूरती बढ़ाते हैं। लेकिन इन सबसे बड़ी खासियत यहां की अंतरराष्ट्रीय सीमा है। भारत और म्यांमार के बीच की आधिकारिक सीमा रेखा गांव के ठीक बीचोबीच से गुजरती है। इसी वजह से गांव का एक हिस्सा भारत की हद में आता है और बाकी हिस्सा म्यांमार की हद में चला जाता है। इसी कारण इसे पूरे एशिया में एक अनोखे सीमावर्ती गांव के तौर पर जाना जाता है।

गांव का सबसे बड़ा आकर्षण वहां के पारंपरिक ग्रामप्रमुख, यानी आंग (Ang), का घर है। जिस जगह यह घर बना है, अंतरराष्ट्रीय सीमा ठीक वहीं से निकलती है। आसान भाषा में कहें तो अगर ग्रामप्रमुख घर के एक कमरे में बैठकर खाना खाते हैं तो वे भारत में माने जाते हैं, और अगर दूसरे कमरे में या पलंग पर चले जाएं तो वे म्यांमार की हद में पहुंच जाते हैं। इस अजीब बनावट की वजह से यह घर सैलानियों और शोधकर्ताओं के लिए खास आकर्षण बन गया है। घर में दाखिल होने के लिए पर्यटकों को पासपोर्ट या वीजा की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि यह गांव और यहां के लोग आज भी एक खास सांस्कृतिक रिश्ते से जुड़े हुए हैं।

लोंगवा सिर्फ अपनी सीमा के लिए नहीं, बल्कि यहां रहने वाले कोन्याक नागा (Konyak Naga) समुदाय की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए भी दुनियाभर में मशहूर है। कोन्याक नागा नागालैंड की एक बड़ी और सम्मानित जनजाति है। इनके पुरखे सैकड़ों साल से इस दूरदराज के पहाड़ी इलाके में रहते आए हैं। आधुनिक राजनीति या देशों के बंटवारे ने भले ही भारत और म्यांमार के बीच रेखा खींच दी हो, लेकिन इन स्थानीय आदिवासी समुदायों के लिए यह रेखा सिर्फ कागज पर है। उनके आपसी रिश्ते, रीति-रिवाज, पुरानी परंपराएं और सामुदायिक जीवन आज भी सीमा के पार जाकर एकजुटता बनाए हुए हैं।

कोन्याक नागा लोगों की पारंपरिक लकड़ी की कारीगरी, शरीर पर गोदना गुदवाने की कला (Tattoos), उनके खास पहनावे और त्योहार देखने के लिए देश-विदेश से कई अध्ययनकर्ता और पर्यटक यहां आते हैं। गांव के सामाजिक और सांस्कृतिक मामलों पर नियंत्रण रखने के सारे अधिकार पारंपरिक आंग के पास होते हैं, जिन्हें पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा मान-सम्मान मिलता है।

यहां का पानी भी दो देशों में बंटा हुआ है। मोन जिला प्रशासन की पर्यटन जानकारी के मुताबिक लोंगवा गांव से कुल चार नदियां बहती हैं। इनमें से ठीक दो नदियां भारतीय भूभाग की तरफ बहती हैं और बाकी दो म्यांमार की तरफ। एक ही गांव में रहने वाले लोग भले ही दो अलग देशों के नागरिक माने जाते हों, पर उनकी भाषा, खान-पान की आदतें, खेती और सुख-दुख हमेशा एक ही रहे हैं।

भारत और म्यांमार की सीमा कई आदिवासी इलाकों से गुजरती है, फिर भी लोंगवा जैसी मिसाल दुनिया में कम ही मिलती है। सीमा के दोनों तरफ रहने वाले कई परिवार आपस में रिश्तेदार हैं और आसानी से एक-दूसरे के घर आ-जा सकते हैं। नागालैंड घूमने आने वाले सैलानियों के लिए लोंगवा अब जरूर देखने लायक जगह बन गया है। यहां की शांति, मेहमाननवाजी और दो देशों की सीमा पर एक ही छत के नीचे जीने का अनोखा अनुभव पर्यटकों को हमेशा याद रहता है।

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