माणगाव के शंतनु कुवेसकर बने रायगड जिले के मानद वन्यजीव रक्षक
महाराष्ट्र सरकार के वन विभाग ने वन्यजीव अध्येता और प्रकृति फोटोग्राफर शंतनु कुवेसकर को रायगड जिले का मानद वन्यजीव रक्षक (Wildlife Warden) नियुक्त किया है।
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माणगाव के वन्यजीव अध्ययनकर्ता, प्रकृति फोटोग्राफर और डॉक्यूमेंट्री निर्माता शंतनु कुवेसकर को रायगड जिले का मानद वन्यजीव रक्षक (Wildlife Warden) बनाया गया है। यह नियुक्ति महाराष्ट्र सरकार के वन विभाग की तरफ से की गई है। कुवेसकर कई सालों से रायगड जिले की जैवविविधता को बचाने, वन्यजीवों की हिफाजत और पर्यावरण संवर्धन के लिए लगातार काम करते आ रहे हैं।
इस नियुक्ति से उनके लंबे समय के वन्यजीव अध्ययन, जन-जागरूकता, वन्यजीव बचाव कार्य और प्रकृति संवर्धन के काम को सरकार की तरफ से पहचान मिली है और साथ में एक नई आधिकारिक जिम्मेदारी भी। माणगाव समेत पूरे रायगड जिले के जंगल, पहाड़ी इलाके, नदियां, खाड़ी क्षेत्र, समुद्र किनारे और गांव-देहात की जैवविविधता का वे लगातार अध्ययन करते रहे हैं। इन सालों में उन्होंने जिले में कई वन्यजीवों और पक्षियों के रिकॉर्ड दर्ज किए हैं।
रायगड की पक्षी संपदा और जैवविविधता को पूरे महाराष्ट्र, देश और दुनिया की नजर में लाने में कुवेसकर की फोटोग्राफी और अध्ययन का अहम योगदान रहा है। स्कूल के दिनों से ही वे पर्यावरण के काम से जुड़े हुए हैं। उन्होंने रायगड के युवाओं और ग्रामीण इलाकों के लोगों में प्रकृति और वन्यजीव संवर्धन को लेकर जागरूकता पैदा करने का काम किया है।
प्रकृति फोटोग्राफी, पक्षी निरीक्षण, प्रकृति भ्रमण, पर्यटन, डॉक्यूमेंट्री और लेखन के जरिए उन्होंने रायगड की जैवविविधता दुनिया के सामने रखी। माणगाव तालुका में वन्यजीव बचाव की अलग-अलग घटनाओं में भी वे हमेशा सक्रिय रहते हैं। वन्यजीव कानून के तहत सबसे ऊंचा संरक्षण पाने वाली प्रजातियों, मगर, अजगर, माउस डियर, पैंगोलिन और जंगली बिल्ली जैसे जानवरों और कई पक्षी प्रजातियों के बचाव में उन्होंने वन विभाग और स्थानीय लोगों के साथ काम किया है।
रायगड के किनारे वाले इलाके से लेकर सह्याद्री की तलहटी तक अलग-अलग आवासों में मिलने वाले कई वन्यजीवों का निरीक्षण और दस्तावेजीकरण कुवेसकर के काम का अहम हिस्सा है। काल नदी इलाके में ऊदबिलाव के बर्ताव का अध्ययन वे दस साल से ज्यादा समय से कर रहे हैं। रायगड जिले में महाधनेश पक्षी के प्रजनन के मौसम का गहरा अध्ययन भी वे पिछले 15 साल से करते आ रहे हैं।
रायगड में सर्दियों में प्रवास करके आने वाले हिमालयन ग्रिफन गिद्ध, उल्लू की कई प्रजातियां, शिकारी पक्षी, प्रवासी पक्षी, सांप, तितलियां और कीट पतंगों की कई प्रजातियों को जिले के अलग-अलग हिस्सों में सबसे पहले कुवेसकर ने दर्ज किया है।
वन्यजीव फोटोग्राफी उनके काम का एक और अहम जरिया है। उनकी तस्वीरों में रायगड के जंगल के पक्षी, स्तनधारी प्राणी, रेंगने वाले जीव, कीट और अलग-अलग आवास दिखाई देते हैं। ई-फोटो प्रदर्शनी के अलावा रायगड के अखबारों में उनकी सैकड़ों तस्वीरों के साथ पक्षी और प्रकृति संवर्धन पर लेख भी छप चुके हैं।
शंतनु कुवेसकर हमेशा कहते हैं कि आज सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यम वन्यजीव संवर्धन के लिए असरदार मंच बन गए हैं। इनके जरिए स्थानीय जैवविविधता की जानकारी आम लोगों तक सही तरीके से पहुंचाना और प्रकृति के प्रति लगाव पैदा करना वक्त की जरूरत है।
रायगड जिले में प्रकृति पर्यटन शुरू करने वाले अग्रणी लोगों (पायोनियर) में एक के तौर पर कुवेसकर की पहचान है। जिले में व्यावसायिक स्तर पर प्रकृति भ्रमण, वन्यजीव और पक्षी निरीक्षण सफारी जैसी गतिविधियां चलाकर, देश भर से ही नहीं बल्कि विदेशों से भी कई पर्यटकों को रायगड बुलाकर उन्होंने यहां की प्रकृति संपदा की अहमियत समझाई है।
उन्होंने यह भी दिखाया है कि प्रकृति पर्यटन के कारोबार से भी वन्यजीवों का संवर्धन और उनके आवासों का संरक्षण हो सकता है। जिले में अलग-अलग जगहों पर पक्षी निरीक्षण और फोटोग्राफी मित्रों के कार्यक्रम भी वे आयोजित करते रहते हैं।