मंदिर के सामने दीपमाल क्यों बनती है: रोशनी, वास्तुकला और परंपरा की पूरी कहानी
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मंदिर के आंगन या प्रवेश द्वार पर खड़ी दीपमाल रात की रोशनी का इंतजाम थी। इसकी बनावट, मान्यता और इतिहास में गांव के वैभव और विजय की निशानी भी जुड़ी है।
मंदिर के आंगन या प्रवेश द्वार के सामने खड़ी दीपमाल, जिसे दीपस्तंभ भी कहा जाता है, सिर्फ सजावट की चीज नहीं है। इसके पीछे इतिहास, वास्तुकला और अध्यात्म का पूरा सिलसिला छिपा है। खास तौर पर महाराष्ट्र में मध्ययुगीन और मराठा काल की मंदिर स्थापत्य शैली का यह एक बेहद अहम और अटूट हिस्सा माना जाता है।
सबसे पहली वजह रात की रोशनी थी। प्राचीन और मध्ययुगीन काल में आज की तरह बिजली नहीं थी। रात में या देवता के उत्सव के वक्त मंदिर परिसर रोशन रहे, इसके लिए आंगन में दीयों की सजावट करने को ये स्तंभ खड़े किए जाते थे। ऊंचाई पर जलते दीयों की वजह से दूर से आने वाले मुसाफिरों और भक्तों को अंधेरे में भी मंदिर की दिशा आसानी से पता चल जाती थी।
आध्यात्मिक और धार्मिक नजर से देखें तो हिंदू धर्म में दीये यानी अग्नि को बहुत पवित्र और सकारात्मकता की निशानी माना जाता है। दीपमाल जमीन से आसमान की ओर पतली होती जाती है। यह इंसानी जिंदगी के अंधेरे यानी अज्ञान को दूर कर रोशनी यानी ज्ञान की तरफ जाने का प्रतीक है। यह उसी विचार का रूप है, जो "तमसो मा ज्योतिर्गमय" में कहा गया है।
एक धार्मिक श्रद्धा यह भी है कि मंदिर के सामने इस तरह सैकड़ों दीये जलाने से आसपास की नकारात्मक ऊर्जा खत्म होती है और सात्त्विक माहौल बनता है।
बनावट के लिहाज से दीपमाल पत्थर, ईंट और चूने से बना मजबूत स्तंभ जैसा ढांचा होती है। नीचे एक बड़ा पत्थर का चबूतरा होता है और उस पर सीढ़ी-दर-सीढ़ी ऊपर की ओर पतला होता गोल या बहुकोणीय स्तंभ खड़ा किया जाता है। इस स्तंभ पर नीचे से ऊपर तक क्रम से छोटे पत्थर के आले (गड्ढे) या सीढ़ियों जैसे नक्काशीदार "हाथ" (दीपकलियां) बनाए जाते हैं, जिन पर तेल के दीये रखे जा सकें। स्तंभ के सबसे ऊपरी हिस्से में एक गहरा खोखला भाग होता है, जहां कपूर, ऊद या गुग्गुल जैसी आग पकड़ने वाली चीजें डालकर बड़ी लौ जलाई जाती है। उस दौर के ज्यामिति शास्त्र और स्थापत्य कला का यह एक उम्दा नमूना माना जाता है।
ऐतिहासिक संदर्भों के मुताबिक दीपमाल सिर्फ धार्मिकता तक सीमित नहीं थी। उसे मंदिर और पूरे गांव के वैभव की निशानी भी माना जाता था। राजा-महाराजा या जागीरदार किसी लड़ाई में जीत हासिल करके लौटते, या उनकी मन्नत पूरी हो जाती, तो देवता के प्रति आभार जताने के लिए मंदिर के सामने भव्य दीपमाल खड़ी करते थे।
उत्सवों में भी दीपमाल की शोभा देखने लायक होती है। महाराष्ट्र में जेजुरी के खंडोबा, औंध की यमाई देवी और तुलजापुर की भवानी माता जैसे कई मशहूर मंदिरों में विशाल दीपमालें देखने को मिलती हैं। कार्तिक पूर्णिमा (त्रिपुरी पूर्णिमा) पर या मंदिर के सालाना मेले के मौके पर जब दीपमाल के सारे दीये एक साथ जलाए जाते हैं, जिसे "दीप प्रज्वलन" कहते हैं, तब का नजारा भक्तों की आंखें चौंधिया देने वाला होता है।
मंदिर के सामने खड़ी दीपमाल आज भी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, उम्दा स्थापत्य कला और आध्यात्मिक समृद्धि की गवाही देती खड़ी है।


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