महिला AI एजेंट को पुरुष AI से कम पैसे, लिमरिक यूनिवर्सिटी की स्टडी में खुलासा
लिमरिक यूनिवर्सिटी के रिसर्चरों की स्टडी में समान काम और समान तकनीक के बावजूद लोगों ने पुरुष AI एजेंट को 10.25% ज्यादा पैसे दिए।
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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI को अब तक एक निष्पक्ष और न्यूट्रल तकनीक माना जाता रहा है, जिसमें इंसानी गलतियां नहीं होतीं। लेकिन लिमरिक यूनिवर्सिटी (University of Limerick) के रिसर्चरों की एक नई स्टडी ने दिखाया है कि इंसानों की सोच में छिपा लिंगभेद अब AI की दुनिया में भी खुलकर सामने आ गया है। स्टडी के मुताबिक काम और तकनीक एक जैसी होने के बावजूद लोगों ने महिला AI एजेंट के मुकाबले पुरुष AI एजेंट को 10.25% ज्यादा पैसे दिए।
यह स्टडी 14वीं नॉर्डिक कॉन्फ्रेंस ऑन ह्यूमन-कंप्यूटर इंटरैक्शन (14th Nordic Conference on Human-Computer Interaction) में पेश की जा रही है। इसके बाद टेक्नोलॉजी सेक्टर के साथ पूरी कॉरपोरेट दुनिया में हलचल मच गई है और AI में इंसानी पूर्वाग्रह का सवाल जोर पकड़ने लगा है।
प्रयोग के लिए रिसर्चरों ने 189 प्रतिभागियों को वर्चुअल रियलिटी (VR) वाले एक ऑफिस के माहौल में काम करने को कहा। इस आभासी दफ्तर में उनकी मदद के लिए दो AI एजेंट रखे गए थे। एक पुरुष एजेंट, जिसका नाम जोनाह (Jonah) था, और दूसरी महिला एजेंट, जिसका नाम जोहाना (Johanna) था। दोनों के पीछे का अल्गोरिदम, तकनीक, बौद्धिक क्षमता और दिए गए काम 100% एक जैसे थे।
फिर भी जब काम के बदले पैसे देने की बारी आई, तो प्रतिभागियों ने जोनाह यानी पुरुष AI को जोहाना यानी महिला AI से 10.25% ज्यादा मेहनताना दिया। रिसर्चरों का कहना है कि यह 10.25% का फर्क बहुत मायने रखता है, क्योंकि दोनों एजेंटों में फर्क बस इतना था कि एक को पुरुष और दूसरे को महिला के तौर पर पेश किया गया था।
स्टडी की सबसे दिलचस्प और फिक्र वाली बात यह रही कि लोगों ने महिला AI एजेंट के मुकाबले पुरुष AI एजेंट को ज्यादा इंसान जैसा समझा और उस पर ज्यादा भरोसा जताया। प्रयोग के दौरान कई प्रतिभागियों ने मुंह से कहा था कि "AI पुरुष है या महिला, इससे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता।" लेकिन असल में पैसों का फैसला लेते वक्त उनके बर्ताव में साफ लिंगभेद दिखा।
प्रतिभागियों ने यह भी बताया कि उन्हें ऐसे AI पसंद हैं जो साफ तौर पर इंसान जैसे न दिखें। इसके बावजूद, जब असली काम और भरोसे का सवाल आया, तो लोगों ने ज्यादा इंसान जैसे और पुरुष जैसे लगने वाले AI वॉइस, टेक्स्ट चैटबॉट और डेस्क रोबोट पर ज्यादा भरोसा किया और उन्हीं को ज्यादा पैसे भी दिए।
यह स्टडी आज के कॉरपोरेट जगत के लिए इसलिए अहम है कि दुनिया भर के दफ्तरों में AI एजेंट का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। आईटी कंसल्टिंग सेक्टर के जानकारों के मुताबिक 2026 तक दुनिया की करीब 80% कंपनियां अपने रोजमर्रा के कामकाज में किसी न किसी रूप में AI एजेंट इस्तेमाल कर रही होंगी। ऐसे में अगर AI के डिजाइन और पेशकश में लिंगभेद रहा, तो उसका गंभीर असर दफ्तरों के माहौल और पैसों के फैसलों पर पड़ेगा।
पिछले साल के आंकड़ों के मुताबिक ब्रिटेन में पुरुषों और महिलाओं की औसत प्रति घंटे की कमाई में 6.9% का फर्क (जेंडर पे गैप) दर्ज किया गया था। समान काम और समान हुनर होने पर भी इंसानी कर्मचारियों में 1 से 2% का फर्क दिखता है। अब यही इंसानी पूर्वाग्रह डिजिटल AI एजेंटों के मामले में 10.25% तक पहुंच जाना भविष्य की तकनीक के लिहाज से बहुत खतरनाक संकेत माना जा रहा है।
स्टडी की सह-लेखिका डॉ. मेरी हॉसफेल्ड (Dr. Mary Hausfeld) ने कहा, "आम तौर पर लोग AI को एक निष्पक्ष और न्यायपूर्ण माध्यम मानते हैं। लेकिन जब हम AI को इंसानी रूप, चेहरा या जेंडर देते हैं, तो वह इंसानी दिमाग में बैठे पुराने सामाजिक पूर्वाग्रह और भेदभाव की भावना को अपने आप जगा देता है।" उनका कहना था कि तकनीक की रचना करते वक्त अगर सही सावधानी नहीं बरती गई, तो इंसानी समाज के पुराने भेदभाव, असमानता और अन्याय के नमूने इस नए डिजिटल दौर में फिर से खड़े हो जाएंगे।