बुधवार, 4 नवंबर 2026

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किसानों के नाम पर SBI से 73.82 करोड़ के लोन का आरोप, तीन और आरोपी गिरफ्तार

किसानों के नाम पर SBI से 73.82 करोड़ के लोन का आरोप, तीन और आरोपी गिरफ्तार तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
जुर्म PT24 टीम

नागपुर ग्रामीण पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने अंतरराज्यीय गिरोह के तीन और कथित सदस्यों को पकड़ा है। आरोप है कि गरीब किसानों के दस्तावेज़ों से बैंक को करोड़ों का चूना लगाया गया।

नागपुर ग्रामीण पुलिस ने एक कथित अंतरराज्यीय गिरोह के तीन और सदस्यों को गिरफ्तार किया है। इन पर आरोप है कि इन्होंने गरीब किसानों के नाम पर फर्जी तरीके से खेती के लोन निकालकर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) को 73.82 करोड़ रुपये का चूना लगाया। मामला बैंकिंग धोखाधड़ी का है और इससे साफ दिखता है कि भोले-भाले किसान संगठित वित्तीय अपराधियों के निशाने पर कितनी आसानी से आ जाते हैं।

आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने जांच तेज की तो बेंगलुरु से डॉ. मदन गोपाल मल्लिकार्जुन पाटील (26) पकड़े गए। दो और आरोपी, प्रियरंजन अशोक कुमार चौधरी (42) उर्फ गौरव मिश्रा और गौरव जायसवाल, तथा राहुल उर्फ संदीप सतीश दुबे (37), 3 नवंबर को मध्य प्रदेश के जबलपुर के नक्षत्र नगर से पकड़े गए।

बताया गया है कि चौधरी झारखंड के जमशेदपुर का रहने वाला है और कथित तौर पर कर्नाटक के हुब्बल्ली में रह रहा था। दुबे जबलपुर का ही रहने वाला है। इन गिरफ्तारियों से कथित गिरोह का अंतरराज्यीय पहलू सामने आया है, क्योंकि आरोपी अलग-अलग राज्यों में रहकर इस धोखाधड़ी को अंजाम दे रहे थे।

पुलिस जांच के मुताबिक आरोपियों ने SBI की मौदा शाखा से 54,69,42,850 रुपये और रामटेक शाखा से 19,13,50,000 रुपये के फर्जी कृषि लोन हासिल किए। दोनों को जोड़ें तो रकम 73,82,92,850 रुपये बैठती है।

जांच में सामने आया है कि आरोपियों ने कथित तौर पर फर्जी कंपनियां खड़ी कीं और लोन की रकम इन्हीं कंपनियों के खातों में घुमा दी। जाली दस्तावेज़ों से मिला पैसा इसी तरह इधर-उधर किया गया।

आरोप है कि गिरोह ने उपज विपणन लोन योजना (Produce Marketing Loan Scheme) का फायदा उठाया। इसके लिए दिल्ली की वेयरहाउसिंग डेवलपमेंट एंड रेगुलेटरी अथॉरिटी (WDRA) के कथित फर्जी लाइसेंस बनवाए गए। इन्हीं लाइसेंस और जाली इलेक्ट्रॉनिक वेयरहाउस रसीदों के सहारे बैंक से बड़े लोन मंज़ूर करवाए गए।

सावनेर और रामटेक तहसील के गरीब और ज्यादातर अनपढ़ किसान इसका शिकार बने। आरोप है कि आरोपी इन किसानों के पास गए और फसल के नुकसान पर सरकार की तरफ से हर साल 10,000 रुपये मुआवज़ा दिलाने का वादा किया। उन्होंने किसानों को समझाया कि यह सरकारी मदद पाने के लिए बैंक खाता खुलवाना या उसकी जानकारी देना ज़रूरी है।

भरोसा करके किसानों ने अपने आधार कार्ड, पैन कार्ड और 7/12 उतारे समेत ज़मीन के अहम कागज़ात आरोपियों को दे दिए। आरोप यह भी है कि आरोपी किसानों को बैंक ले गए और अंग्रेज़ी में लिखे कागज़ों पर उनके दस्तखत करवा लिए। कई किसान न तो उन्हें पढ़ सकते थे और न समझ सकते थे, इसलिए उन्हें कथित तौर पर पता ही नहीं चला कि उनके दस्तखत से बड़े कृषि लोन निकाले जा रहे हैं।

सरकारी मुआवज़े के बहाने जमा किए गए कागज़ों से किसानों के नाम पर लाखों रुपये के लोन मंज़ूर हो गए और उन्हें खबर तक नहीं हुई। रकम गिरोह की बनाई फर्जी कंपनियों के खातों में भेज दी गई। आरोप है कि फर्जी कंपनियों, फर्जी वेयरहाउस लाइसेंस और गढ़ी गई इलेक्ट्रॉनिक रसीदों का समानांतर जाल बिछाकर धोखाधड़ी को और पुख्ता किया गया।

इस मामले में EOW पहले सचिन करेमोरे को गिरफ्तार कर चुकी है। ताज़ा गिरफ्तारियों के बाद जांचकर्ता पूरे नेटवर्क की परतें खोलने में जुटे हैं। मौदा और रामटेक पुलिस स्टेशन में दर्ज मामलों में कुल 18 लोगों के नाम आए हैं।

जांच नागपुर ग्रामीण के पुलिस अधीक्षक डॉ. हर्ष पोद्दार और अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अनिल म्हस्के की देखरेख में चल रही है। पुलिस अधिकारियों को यह भी पता चला है कि चौधरी पर कर्नाटक में भी ऐसे ही धोखाधड़ी के मामले चलने का आरोप है। इससे संकेत मिलता है कि वित्तीय अपराधों का यह सिलसिला महाराष्ट्र के बाहर भी फैला हो सकता है।

अब EOW बाकी आरोपियों की पहचान करने, पैसे का पूरा रास्ता पता लगाने और फर्जी कंपनियों की भूमिका तय करने में लगी है। यह भी देखा जा रहा है कि फर्जी वेयरहाउस लाइसेंस और इलेक्ट्रॉनिक रसीदें कैसे हासिल की गईं और कैसे प्रमाणित हुईं। जांचकर्ता फर्जी कंपनियों, बैंक लेनदेन और लोन में इस्तेमाल दस्तावेज़ों की भी पड़ताल कर रहे हैं, साथ ही यह भी खोज रहे हैं कि रकम आखिर किसके पास पहुंची।

यह मामला खेती के कर्ज़ में जांच-पड़ताल की प्रक्रिया और ग्रामीण बैंकिंग के संगठित दस्तावेज़ी जालसाज़ी के सामने कमज़ोर होने पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जिन किसानों से सरकार की ओर से 10,000 रुपये की मामूली मदद का वादा किया गया था, उन्हें कथित तौर पर 73 करोड़ रुपये से ज्यादा के लेनदेन में अनजाने मोहरे की तरह इस्तेमाल किया गया।

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