मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026

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01:13 IST

केन्या की मारा नदी में रोज़ 400 किलो सिलिकॉन पहुंचाते हैं दरियाई घोड़े

साइंस एडवांसेस में छपे अध्ययन के मुताबिक दरियाई घोड़े नदी की अन्नसाखला को सिलिकॉन से सहारा देते हैं।

केन्या की मारा नदी में रोज़ 400 किलो सिलिकॉन पहुंचाते हैं दरियाई घोड़े तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

केन्या की मशहूर मारा नदी पर हुए एक अध्ययन में दरियाई घोड़ों (Hippopotamus) को लेकर चौंकाने वाली बात सामने आई है। जिन जानवरों को हम अक्सर सिर्फ़ भारी-भरकम या खतरनाक समझते हैं, वही नदी की जीवसृष्टि और जलीय अन्नसाखला को ज़िंदा रखने में बड़ा रोल निभा रहे हैं।

अंतरराष्ट्रीय विज्ञान पत्रिका साइंस एडवांसेस (Science Advances) में "हिप्पोपोटैमस एम्फिबियस: द एनिमल सिलिकॉन पंप" नाम से एक अहम शोधपत्र छपा है। इसके मुताबिक सूखे मौसम में दरियाई घोड़े मारा नदी में हर दिन करीब 0.4 मेट्रिक टन, यानी 400 किलो सिलिकॉन पहुंचाते हैं। यह सिलिकॉन ज़मीन से सीधे नदी में आता है और पानी के सूक्ष्म जीवों के साथ पूरी अन्नसाखला को मज़बूत सहारा देता है।

दरियाई घोड़ों की रोज़ की दिनचर्या भी दिलचस्प है। दिन भर वे नदी के गहरे और ठंडे पानी में आराम करते हैं। रात होते ही खाने की तलाश में सवाना के खुले घास के मैदानों में निकल पड़ते हैं। रात भर घास चरने के बाद सूर्योदय के वक्त वे वापस नदी में लौट आते हैं। देखने में सादी यह दिनचर्या असल में एक बड़े कुदरती ट्रांसपोर्ट सिस्टम की तरह काम करती है।

सवाना की घास में ज़मीन का सिलिकॉन बड़ी मात्रा में जमा होता है। दरियाई घोड़े जब यह घास खाते हैं तो सिलिकॉन उनके पाचन तंत्र से गुज़रता है। दिन में नदी में आराम करते हुए जब वे गोबर करते हैं, तो वह सीधे पानी में मिल जाता है। आम तौर पर सिलिकॉन ज़मीन में ही अटका रहता है या उसका सफ़र बहुत धीमा होता है, लेकिन दरियाई घोड़ों की वजह से वह बिना रुकावट नदी के बहाव में पहुंच जाता है।

वैज्ञानिकों ने फरवरी 2014 में दक्षिण-पश्चिम केन्या के मासाई मारा इलाके में नदी किनारे से नमूने जमा किए थे। इस अध्ययन के आंकड़ों ने दुनिया भर के पर्यावरण विशेषज्ञों का ध्यान खींचा है। शोध के मुताबिक मासाई मारा में करीब 80 दरियाई घोड़ों का झुंड रोज़ 42.0 मेट्रिक टन सूखी घास खाता है और दिन भर में 11.1 मेट्रिक टन सूखा गोबर नदी में छोड़ता है।

इसी वजह से रोज़ 0.4 मेट्रिक टन जैविक सिलिकॉन नदी में आता है। शोधकर्ताओं ने मासाई मारा में सिलिकॉन के कुल बहाव को नापा तो पता चला कि नदी के कुल सिलिकॉन बहाव में अकेले दरियाई घोड़ों का हिस्सा 76% है। जिस हिस्से में दरियाई घोड़े मौजूद थे, वहां जैविक सिलिकॉन ऊपरी हिस्से के मुकाबले दोगुना मिला। लैब जांच में साफ़ हुआ कि दरियाई घोड़े के गोबर का 2.8% जैविक सिलिकॉन 24 घंटे के भीतर पानी में घुल जाता है, और यह आम घास के सड़ने से 17.2 गुना तेज़ी से होता है।

अब सवाल उठता है कि पानी में सिलिकॉन इतना ज़रूरी क्यों है। जवाब जलीय पौधों और सूक्ष्म जीवों से जुड़ा है। नदी के पानी में डायटम्स (Diatoms) नाम की बेहद छोटी काई (Microalgae) होती है। इसे पानी का प्राथमिक उत्पादक माना जाता है और यही जलीय अन्नसाखला की बुनियाद है।

डायटम्स को अपनी कोशिकाओं की दीवारें (Cell walls) बनाने और खुद को बचाने के लिए घुले हुए सिलिकॉन की सख्त ज़रूरत होती है। पानी में सिलिकॉन घट जाए तो डायटम्स की बढ़त रुक जाती है। फिर इन्हें खाकर जीने वाली छोटी मछलियों और कीड़ों को खाना नहीं मिलता, और पूरी नदी का मछली कारोबार और अन्नसाखला खतरे में पड़ सकती है। इस तरह दरियाई घोड़ों का दिया सिलिकॉन डायटम्स की तादाद को काबू में रखता है और नदी की जैविक विविधता बचाए रखता है।

वैज्ञानिकों ने सिर्फ़ एक अच्छी खोज ही नहीं की, एक गंभीर चेतावनी भी दी है। अगर जलवायु परिवर्तन, शिकारियों या इंसानी अतिक्रमण की वजह से दरियाई घोड़ों की संख्या घटी, तो नदियों में सिलिकॉन की सप्लाई बिगड़ जाएगी। इसका बुरा असर विक्टोरिया झील और पूर्वी अफ्रीका की दूसरी बड़ी झीलों पर पड़ सकता है।

दरियाई घोड़ों के गोबर से जैविक पदार्थ और दूसरे पोषक तत्व भी पानी में मिलते हैं, जो एक हद तक फायदेमंद हैं। लेकिन पानी का बहाव कम हो और जैविक पदार्थ बहुत बढ़ जाएं तो ऑक्सीजन घटने का खतरा भी रहता है। फिर भी कुल मिलाकर वैज्ञानिकों ने इस पर मुहर लगाई है कि दरियाई घोड़े ज़मीन के पोषक तत्व पानी तक पहुंचाने वाला कुदरत का बेजोड़ और ज़रूरी इंजन हैं।

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