हार्मोन्स बिगाड़ने वाले केमिकल्स से पुरुष-महिला दोनों की फर्टिलिटी पर असर, डॉक्टर ने दी जानकारी
मुंबई के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हॉस्पिटल की IVF कंसल्टेंट डॉ हितेशा रामनानी रोहिरा ने अंडोक्राईन डिस्टरप्टिंग केमिकल्स यानी EDCs और प्रजनन क्षमता पर उनके असर के बारे में जानकारी दी।
आज के दौर में बांझपन एक बहुत गंभीर पब्लिक हेल्थ प्रॉब्लम बन चुका है, फिर भी लोग इस पर उतना ध्यान नहीं देते। दुनिया भर में हर 6 में से 1 व्यक्ति अपनी जिंदगी में कभी न कभी बांझपन की दिक्कत से गुजरता है। दूसरी तरफ, दुनिया भर के करीब 100 प्रतिशत लोगों के शरीर में जांच में "अंडोक्राईन डिस्टरप्टिंग केमिकल्स" यानी EDCs, मतलब शरीर के हार्मोन्स में गड़बड़ी पैदा करने वाले केमिकल्स पाए जा रहे हैं। ये दोनों बातें एक साथ होना सिर्फ इत्तेफाक नहीं है। बल्कि वैज्ञानिक सबूत अब साफ बता रहे हैं कि बांझपन की समस्या के पीछे EDCs कोई मामूली वजह नहीं हैं। इस बारे में मुंबई के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हॉस्पिटल की IVF कंसल्टेंट डॉ हितेशा रामनानी रोहिरा ने विस्तार से बताया है।
डॉ रोहिरा के मुताबिक, केमिकल्स में शरीर के हार्मोनल सिस्टम में सीधे दखल देने की बड़ी क्षमता होती है। सबसे चिंता की बात ये है कि इन केमिकल्स को ढूंढने कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं, क्योंकि ये पहले से ही हमारे आसपास हर जगह मौजूद हैं। खाने-पीने के डिब्बे और प्लास्टिक की बोतलें, रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीजें, कॉस्मेटिक्स और खेतों में इस्तेमाल होने वाली कीटनाशक और केमिकल्स, इन सबमें ये केमिकल्स मौजूद रहते हैं। इसलिए चाहकर भी एक आम इंसान इन केमिकल्स के संपर्क में आने से खुद को पूरी तरह नहीं बचा सकता।
डॉ रोहिरा बताती हैं कि बांझपन की असली वजहें समझने के लिए सिर्फ मेडिकल या क्लिनिकल जांच से आगे जाकर सोचना पड़ेगा। हमारे आसपास के पर्यावरण में मौजूद घातक तत्व, जैसे EDCs यानी हार्मोन्स बिगाड़ने वाले केमिकल्स और इंसान की प्रजनन क्षमता पर उनके गंभीर असर के बारे में लोगों में बड़े पैमाने पर जागरूकता लाना आज के समय की बहुत जरूरी मांग है।
अंडोक्राईन डिस्टरप्टर्स, जिन्हें "अंडोक्राईन एक्टिव सब्सटेंसेस" या "अंडोक्राईन डिस्टरप्टिंग कंपाउंड्स" भी कहा जाता है, ऐसे केमिकल्स हैं जो हमारे शरीर के हार्मोन्स के नेचुरल काम, उनकी मेटाबॉलिक प्रोसेस और शरीर में उनके बनने की प्रोसेस में सीधे रुकावट डालते हैं। जब यह रुकावट पैदा होती है, तो शरीर का पूरा कामकाज जिस पर टिका होता है, वो हार्मोन्स का बैलेंस पूरी तरह बिगड़ जाता है। हैरानी की बात ये है कि इसके घातक असर सिर्फ उस एक इंसान तक सीमित नहीं रहते, बल्कि इसका आने वाली पीढ़ियों पर क्या असर होगा, इसे लेकर भी अब दुनिया भर में बड़ी चिंता जताई जा रही है।
इस श्रेणी में कई केमिकल्स आते हैं। "बिस्फेनॉल ए" (BPA) और "थैलेट्स" (Phthalates) ये केमिकल्स आमतौर पर फूड पैकेजिंग में पाए जाते हैं और फूड प्रोसेसिंग के दौरान आसानी से खाने में पहुंच सकते हैं। कीटनाशक, खासकर "ऑर्गनोफॉस्फेट" और "ऑर्गनोक्लोराईड" कंपाउंड्स, इंसान की प्रजनन क्षमता पर बहुत घातक असर डालने की वजह बनते हैं। इसके अलावा "डायॉक्सिन्स" और डायॉक्सिन जैसे दूसरे कंपाउंड्स ज्यादातर कचरा बेतरतीब तरीके से जलाने, अचानक लगने वाली आग और कचरे के भस्मीकरण की वजह से हवा में पैदा होते हैं, जो इंसान के शरीर में मुख्य रूप से दूषित खाने और प्रदूषित पर्यावरण के जरिए पहुंचते हैं।
डॉ रोहिरा के अनुसार, हम कई तरीकों से इन केमिकल्स के संपर्क में आ सकते हैं। प्लास्टिक, कीटनाशक, इंडस्ट्रियल केमिकल्स, आग रोकने वाले केमिकल्स, पर्सनल केयर की चीजें, दूषित खाना और पानी, हवा, घर की धूल, त्वचा का सीधा संपर्क और यहां तक कि गर्भ में रहते हुए ही होने वाला संपर्क, ये सब इसकी वजह बनते हैं। ये केमिकल्स हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का इतना अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं कि इनसे खुद को पूरी तरह दूर रखना सच में बहुत मुश्किल हो गया है।
डॉ रोहिरा ने बताया कि प्रजनन क्षमता पर पड़ने वाला यह उल्टा असर पुरुष और महिला दोनों पर होता है। महिलाओं में हार्मोन्स की गड़बड़ी से अंडों के मैच्योर होने की प्रोसेस में रुकावट आ सकती है, ओवुलेशन न होने की दिक्कत हो सकती है, साथ ही गर्भाशय के विकार, एंडोमेट्रिओसिस, ओवरी का काम समय से पहले बंद होना और भ्रूण में खराबी जैसी गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इतना ही नहीं, इससे IVF इलाज के असरदार होने की दर भी घट जाती है। रिसर्च से यह भी सामने आया है कि EDCs के संपर्क में आने से "एंटी-म्युलेरियन हार्मोन" का लेवल कम होता है, अंडों की क्वालिटी खराब होती है, गर्भपात का खतरा बढ़ता है और बांझपन के इलाज से स्वस्थ बच्चा पैदा होने की संभावना बहुत कम हो जाती है।
पुरुषों के मामले में भी हालात उतने ही चिंताजनक हैं। डॉ रोहिरा के मुताबिक EDCs के संपर्क में आने से स्पर्म की क्वालिटी खराब होती है, स्पर्म की संख्या घटती है और उनकी मूवमेंट कम होती है। पिछले पांच दशकों में दुनिया भर के पुरुषों में स्पर्म की संख्या आधे से ज्यादा घट चुकी है, और गिरावट की यह रफ्तार दिन-ब-दिन बढ़ रही है। इन आंकड़ों को नजरअंदाज करना सच में मुमकिन नहीं है। इसीलिए, "अंडोक्राईन डिस्टरप्टिंग केमिकल्स" के शरीर से संपर्क को कम करना और उनके घातक असर को लेकर समाज में जागरूकता लाना, इंसान की प्रजनन क्षमता की रक्षा करने में बहुत अहम भूमिका निभा सकता है।