ग्रीनविच की रेखा से तय हुआ दुनिया का समय, 1884 में बना GMT और टाइम ज़ोन का आधार
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1884 की वॉशिंगटन परिषद में ग्रीनविच की रेखा को शून्य रेखांश माना गया, और उसी से GMT और टाइम ज़ोन का हिसाब बना।
घड़ी देखना, अलग-अलग देशों का समय मिलाना या हवाई जहाज़ से एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप जाना हमारी रोज़ की ज़िंदगी का हिस्सा है। लेकिन पूरी दुनिया में समय का यह सही तालमेल कैसे बैठता है, इस पर शायद ही कभी सोचा जाता है। इसी के पीछे एक काल्पनिक रेखा है, जिसकी याद में प्रधान रेखांश दिवस (Prime Meridian Day) मनाया जाता है। यह दिन सिर्फ भूगोल की एक अवधारणा का नहीं है, बल्कि इंसानी इतिहास, वैज्ञानिक सटीकता और वैश्विक सहयोग का भी एक सुनहरा अध्याय है।
1884 में वॉशिंगटन, डी.सी. में हुई अंतरराष्ट्रीय रेखांश परिषद में लंदन के पास ग्रीनविच की 'रॉयल ऑब्ज़र्वेटरी' से गुज़रने वाली रेखा को शून्य अंश रेखांश यानी 'प्रधान रेखांश' की आधिकारिक मान्यता मिली। इस ऐतिहासिक फैसले की याद में 1 नवंबर का दिन खास माना जाता है। इस एक काल्पनिक रेखा ने दुनिया के समय और नक्शे को देखने का नज़रिया पूरी तरह बदल दिया।
धरती पर खड़ी और आड़ी काल्पनिक रेखाएँ खींची गई हैं, जिन्हें क्रमशः रेखांश (Longitudes) और अक्षांश (Latitudes) कहा जाता है। अक्षांशों में विषुवत रेखा (Equator) मुख्य रेखा मानी जाती है, जो धरती को उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध में बाँटती है। लेकिन रेखांश के मामले में ऐसा कोई प्राकृतिक मध्य बिंदु था ही नहीं।
19वीं सदी के उत्तरार्ध में दुनिया के अलग-अलग देश अपनी सहूलियत के हिसाब से अलग-अलग जगहों से समय की गिनती करते थे। इससे अंतरराष्ट्रीय सफर, समुद्री व्यापार और रेलवे टाइम टेबल में भारी गड़बड़ी होती थी।
इस गड़बड़ी को दूर करने के लिए अक्टूबर 1884 में अमेरिका के वॉशिंगटन डी.सी. शहर में अंतरराष्ट्रीय रेखांश परिषद (International Meridian Conference) बुलाई गई। इसमें दुनिया के 25 देशों के प्रतिनिधि और वैज्ञानिक शामिल हुए। काफी बहस और चर्चा के बाद बहुमत से ब्रिटेन के लंदन में मौजूद ग्रीनविच की 'रॉयल ऑब्ज़र्वेटरी' (Royal Observatory, Greenwich) से गुज़रने वाली रेखा को 'शून्य अंश रेखांश' (Prime Meridian) मानने का ऐतिहासिक प्रस्ताव पास हुआ। 1 नवंबर 1884 को इस प्रस्ताव पर आखिरी मुहर लगी, इसीलिए यह दिन प्रधान रेखांश दिवस के नाम से जाना जाता है।
प्रधान रेखांश रेखा का सबसे अहम काम ग्रीनविच मीन टाइम (Greenwich Mean Time, GMT) यानी वैश्विक मानक समय बनाना है। यह रेखा धरती को दो बराबर हिस्सों में बाँटती है, पूर्वी गोलार्ध (Eastern Hemisphere) और पश्चिमी गोलार्ध (Western Hemisphere)। इस रेखा से पूरब या पश्चिम की ओर जाने पर समय कैसे बदलता है, इसका हिसाब तय किया गया है।
धरती अपनी धुरी पर 360 अंश घूमती है और एक चक्कर पूरा करने में उसे 24 घंटे लगते हैं। यानी वह एक घंटे में 15 अंश रेखांश पार करती है, या 1 अंश घूमने में 4 मिनट लगते हैं। ग्रीनविच रेखा से पूरब जाने पर हर 1 अंश पर समय 4 मिनट आगे बढ़ता है, जबकि पश्चिम जाने पर 4 मिनट पीछे जाता है। मिसाल के तौर पर भारत का मानक समय (Indian Standard Time, IST) 82.5 अंश पूर्व रेखांश पर आधारित है, इसलिए हमारा समय ग्रीनविच के समय से 5 घंटे 30 मिनट आगे (GMT +5:30) है।
आज स्मार्टफोन, जीपीएस (Global Positioning System), गूगल मैप्स और हवाई यातायात की व्यवस्था, ये सब इसी रेखांश के आधार पर चलते हैं। आज के डिजिटल दौर में समय की सटीकता के लिए 'एटॉमिक क्लॉक' और 'यूनिवर्सल कोऑर्डिनेटेड टाइम' (UTC) का इस्तेमाल होता है, फिर भी इसकी बुनियाद आज भी ग्रीनविच की प्रधान रेखांश रेखा पर ही टिकी है।
अगर 1884 में दुनिया ने एक साथ आकर यह एक जैसी व्यवस्था न अपनाई होती, तो आज अंतरराष्ट्रीय व्यापार, शेयर बाज़ार, दूरसंचार व्यवस्था और अंतरिक्ष शोध में बड़ी अराजकता फैल जाती। इसीलिए प्रधान रेखांश दिवस हमें विज्ञान की ताकत और इंसानी सहयोग की कीमत सिखाता है।
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