दुष्कर्म पीड़िता को 28 हफ्ते का गर्भ गिराने की इजाजत, हाई कोर्ट बोला - फैसला महिला का हक
नागपुर हाई कोर्ट ने 17 साल की नाबालिग को गर्भ समाप्त करने की मंजूरी दी, साथ ही DNA सबूत सुरक्षित रखने का आदेश भी दिया।
नागपुर में बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए दुष्कर्म पीड़ित 17 साल की नाबालिग लड़की को उसका करीब 28 हफ्ते 6 दिन का गर्भ गिराने की इजाजत दे दी है। कोर्ट ने साफ कहा कि अपने शरीर को लेकर औरत का जो फैसला होता है और उसकी जो मर्जी होती है, उसे बहुत गंभीरता से लिया जाना चाहिए। गर्भ रखना है या उसे मेडिकल तरीके से खत्म कराना है, इस मामले में पीड़िता की इच्छा पर भी उतना ही सोच-विचार जरूरी है।
जस्टिस अनिल किलोर और जस्टिस रजनीश व्यास की बेंच ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट, पीड़िता के हालात और उसकी मर्जी देखने के बाद यह ऑर्डर दिया। लड़की ने अपने पिता के जरिए हाई कोर्ट में याचिका डालकर गर्भपात की परमिशन मांगी थी।
कोर्ट ने 10 सितंबर को पीड़िता की मेडिकल जांच कराने का निर्देश दिया था। पहली रिपोर्ट में तो उसे गर्भपात की प्रोसेस के लिए फिट नहीं बताया गया था। इसके करीब एक हफ्ते बाद उसकी दोबारा जांच कराई गई। 17 सितंबर को मेडिकल बोर्ड ने जो दूसरी रिपोर्ट दी, उसमें लड़की को शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से गर्भपात के लिए उपयुक्त बताया गया। यह रिपोर्ट देखते हुए कोर्ट ने नागपुर के शासकीय मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल (GMCH) के डीन को कहा कि जरूरी मेडिकल एहतियात और सेफ्टी स्टैंडर्ड का पालन करते हुए प्रोसेस जल्दी पूरी की जाए।
हाई कोर्ट ने अपने ऑर्डर में सुप्रीम कोर्ट के पहले के एक फैसले का भी हवाला दिया। कोर्ट ने माना कि यौन शोषण की वजह से ठहरा गर्भ पीड़िता के मानसिक तनाव और सदमे को और बढ़ा सकता है। ऐसे केसों में सिर्फ फिजिकल हेल्थ ही नहीं, बल्कि पीड़िता की मेंटल कंडीशन, उसकी इज्जत और उसकी इच्छा को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
लड़की ने कोर्ट के सामने अपने हालात बताते हुए गर्भपात कराने की इच्छा जताई थी। कोर्ट ने संविधान के आर्टिकल 21 के तहत जीवन, पर्सनल फ्रीडम, शारीरिक स्वायत्तता और गरिमा से जुड़े पहलू देखते हुए, मेडिकल बोर्ड की पॉजिटिव राय के आधार पर यह इजाजत दी।
क्रिमिनल जांच को देखते हुए हाई कोर्ट ने एक और अहम निर्देश दिया है। कोराडी पुलिस को कहा गया है कि वो पीड़िता और गर्भ में पल रहे बच्चे के जरूरी बायोलॉजिकल सैंपल कानून के मुताबिक लेकर DNA जांच के लिए सुरक्षित रखे। इसका मकसद यह है कि क्रिमिनल केस की जांच और आगे की कोर्ट प्रोसेस के लिए जरूरी सबूत मौजूद रहें। कोर्ट ने यह भी कहा कि मेडिकल प्रोसेस से पहले पीड़िता और उसके परिवार से इससे जुड़े संभावित खतरों के बारे में जरूरी सहमति ली जाए।
प्रेगनेंसी का पीरियड ज्यादा होने के कारण इस केस में मेडिकल रिस्क भी बड़ा फैक्टर था। इसके बावजूद मेडिकल बोर्ड की दूसरी रिपोर्ट में लड़की को फिट पाए जाने और उसकी अपनी इच्छा को कोर्ट ने अहम माना। हाई कोर्ट का यह फैसला ऐसे मामलों में पीड़िता की गरिमा, शारीरिक स्वायत्तता, मानसिक सेहत और खुद फैसला लेने के हक की अहमियत को उजागर करता है, साथ ही यह भी पक्का करता है कि मेडिकल प्रोसेस के साथ-साथ क्रिमिनल केस से जुड़े DNA सबूत भी सुरक्षित रहें।