दुनिया की 81 फीसदी ऊर्जा जीवाश्म ईंधन से, ईरान युद्ध से सप्लाई की फिक्र बढ़ी
स्वच्छ ऊर्जा की कोशिशों के बावजूद दुनिया की ऊर्जा जरूरत का 81 प्रतिशत हिस्सा आज भी तेल, कोयला और नैचुरल गैस से पूरा होता है।
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दुनियाभर में स्वच्छ और हरित ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ाने की कोशिशें चल रही हैं, फिर भी वैश्विक ऊर्जा जरूरत का पूरा 81 प्रतिशत हिस्सा आज भी तेल, कोयला और नैचुरल गैस जैसे जीवाश्म ईंधन से ही पूरा किया जाता है। इससे साफ है कि दुनिया की ऊर्जा व्यवस्था अब भी पारंपरिक ईंधन पर बहुत ज्यादा टिकी हुई है।
ईरान के खिलाफ चल रहे अमेरिका-इजरायल संघर्ष की वजह से ईंधन की सप्लाई पर असर पड़ने की आशंका बन गई है। इस जंग ने सिर्फ मध्यपूर्व के राजनीतिक और सैन्य हालात ही नहीं बदले, बल्कि दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ऊर्जा के क्षेत्र में सौर, पवन और जलविद्युत जैसे विकल्पों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। इसके बावजूद वैश्विक अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा अभी तेल, कोयला और नैचुरल गैस पर निर्भर है। ट्रांसपोर्ट, उद्योग, बिजली बनाने और मैन्युफैक्चरिंग में इन ईंधनों का भारी इस्तेमाल होता है। इसलिए इनकी सप्लाई में थोड़ी भी रुकावट आए तो कई देशों को उसका असर झेलना पड़ता है।
विकसित देशों से लेकर विकासशील अर्थव्यवस्थाओं तक, कई देशों को अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार पर निर्भर रहना पड़ता है। नतीजा यह कि ईंधन की कीमतों के उतार-चढ़ाव का सीधा असर महंगाई और उत्पादन लागत पर पड़ता है।
इराक के खिलाफ नहीं, बल्कि ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल के बीच जारी संघर्ष से मध्यपूर्व की ऊर्जा सप्लाई को लेकर अनिश्चितता बढ़ी है। यह इलाका दुनिया की तेल और नैचुरल गैस सप्लाई के लिहाज से बेहद अहम माना जाता है। खास तौर पर होर्मुज की जलडमरूमध्य तेल की वैश्विक ढुलाई का एक अहम समुद्री रास्ता है।
इस रास्ते पर आवाजाही में रुकावट आई तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की सप्लाई घटने का डर रहता है। इसका असर कच्चे तेल की कीमतों, ईंधन की ढुलाई और अलग-अलग देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है। जंग से पैदा होने वाला डर और अनिश्चितता भी ऊर्जा बाजार की अस्थिरता बढ़ा सकती है।
मौजूदा संघर्ष ने एक बात साफ कर दी है कि सिर्फ जीवाश्म ईंधन पर टिकी ऊर्जा व्यवस्था किसी भी बड़े वैश्विक संकट में असुरक्षित साबित हो सकती है। इसलिए देशों को अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने और स्वदेशी ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने की जरूरत है।
सौर और पवन ऊर्जा जैसे अक्षय स्रोतों में निवेश बढ़ाना, ऊर्जा भंडारण की तकनीक विकसित करना और ईंधन का कुशलता से इस्तेमाल करना अहम होगा। लेकिन इन विकल्पों को बड़े पैमाने पर फैलाने के लिए भारी निवेश, आधुनिक बुनियादी ढांचा और लंबे समय की योजना चाहिए। इसलिए जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाने का सफर आसान नहीं होगा। ईरान संघर्ष ने दुनिया को एक बार फिर ऊर्जा सुरक्षा की अहमियत दिखा दी है।