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19:22 IST

चीन का सोने का भंडार 2,410 टन के रिकॉर्ड पर, डॉलर को लेकर बढ़ी चिंता

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक सितंबर में चीन का सोने का भंडार 2,410 टन के ऐतिहासिक उच्चांक पर पहुंच गया है।

चीन का सोने का भंडार 2,410 टन के रिकॉर्ड पर, डॉलर को लेकर बढ़ी चिंता तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

चीन के एक फैसले से इन दिनों वैश्विक बाज़ार और भू-राजनीति में हलचल मची है। चीन का केंद्रीय बैंक 'पीपल्स बैंक ऑफ चाइना' (PBOC) पिछले 23 महीनों से लगातार भारी मात्रा में सोना खरीद रहा है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (WGC) की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक सितंबर में देश का सोने का भंडार बढ़कर 2,410 टन के ऐतिहासिक उच्चांक पर पहुंच गया है।

सिर्फ सितंबर महीने में चीन के केंद्रीय बैंक ने 23 टन सोना जोड़ा। अक्टूबर 2023 के बाद एक महीने में यह उसकी सबसे बड़ी खरीद रही। इस साल के पहले नौ महीनों में ही चीन ने कुल 103 टन सोना अपने खजाने में जमा किया है। जुलाई से सितंबर यानी तीसरी तिमाही में उसने 63 टन सोना खरीदा।

अब चीन के कुल विदेशी मुद्रा भंडार में सोने का हिस्सा 8.5 प्रतिशत हो गया है। अमेरिकी डॉलर के मूल्य में उतार-चढ़ाव और विदेशी संपत्तियों में गिरावट की वजह से सितंबर में चीन का विदेशी मुद्रा भंडार 2 प्रतिशत घटकर 3.8 ट्रिलियन डॉलर पर आ गया। इसके बावजूद सोने के भंडार ने उसकी अर्थव्यवस्था को एक मज़बूत सुरक्षा कवच दिया है।

जब दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश इतने बड़े पैमाने पर सोना जमा करने लगे, तो माना जाता है कि वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में बड़े बदलाव आ सकते हैं। आर्थिक विश्लेषकों के मुताबिक इस खरीद की सबसे अहम वजह अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता को धीरे-धीरे कम करना है।

विश्लेषकों का कहना है कि सोना ऐसी अकेली वैश्विक संपत्ति है जो किसी दूसरे देश की सरकार या वित्तीय संस्था की देनदारी (Liability) नहीं होती। अगर कोई देश अपना विदेशी भंडार अमेरिकी डॉलर या अमेरिकी ट्रेज़री बॉन्ड्स में रखता है, तो उसकी कीमत अमेरिका की आर्थिक नीतियों और राजनीतिक स्थिरता पर टिकी रहती है।

अमेरिका पर इस वक्त भारी सरकारी कर्ज है और बजट घाटा भी बढ़ रहा है। इसी वजह से दुनिया भर में डॉलर के भविष्य को लेकर चिंता जताई जा रही है। अगर अलग-अलग देश अमेरिकी बॉन्ड्स में निवेश घटा दें, तो अमेरिका के लिए कर्ज लेना महंगा हो जाएगा और डॉलर पर भारी दबाव आएगा। इस संभावित खतरे से बचने के लिए चीन ने सोने को सुरक्षित विकल्प चुना है।

चीन की रणनीति सिर्फ केंद्रीय बैंक के खजाने तक सीमित नहीं है। वह हांगकांग को सोने के भौतिक कारोबार (Physical Gold Trading) और पेमेंट सेटलमेंट का दुनिया का सबसे बड़ा केंद्र बनाने की कोशिश कर रहा है। इसके लिए हांगकांग में सोना रखने की क्षमता बढ़ाई जा रही है और चीनी मुद्रा 'युआन' (Yuan) में सोने का सौदा करने के लिए आधुनिक वायदा बाज़ार सिस्टम तैयार किया जा रहा है।

अभी तक अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में सोने की कीमत मुख्य रूप से डॉलर में तय होती है और सौदे भी डॉलर में ही होते हैं। लेकिन अगर सोने का अंतरराष्ट्रीय कारोबार युआन में शुरू हुआ, तो वैश्विक व्यापार में चीनी मुद्रा की अहमियत काफी बढ़ जाएगी। तब दूसरे देशों को अमेरिका और पश्चिमी देशों की बैंकिंग व्यवस्था पर निर्भर हुए बिना व्यापार का एक नया और सुरक्षित रास्ता मिलेगा।

सिर्फ सरकार और केंद्रीय बैंक ही नहीं, चीन के आम लोग और छोटे निवेशक भी सोने में बड़े पैमाने पर पैसा लगा रहे हैं। स्थानीय शेयर बाज़ार की अनिश्चितता और सरकारी बॉन्ड्स पर घटते रिटर्न की वजह से चीनी निवेशक गोल्ड ईटीएफ (Gold ETFs) की ओर मुड़े हैं। सितंबर में चीनी गोल्ड ईटीएफ में 11 टन सोना जुड़ा, जिससे तीसरी तिमाही में कुल ईटीएफ होल्डिंग 304 टन के रिकॉर्ड उच्चांक पर पहुंच गई।

दूसरी तरफ, सोने की आसमान छूती कीमतों से गहनों की थोक मांग में गिरावट दिखी है। तीसरी तिमाही में चीन में सोने के गहनों की थोक मांग 234 टन रही, जो पिछले साल के मुकाबले 21 प्रतिशत कम है। फिर भी केंद्रीय बैंक की लगातार खरीद और ईटीएफ में निवेश की वजह से सोने की कुल मांग मज़बूत बनी हुई है। विशेषज्ञों के मुताबिक डॉलर का दबदबा फौरन खत्म नहीं होगा, लेकिन चीन की इस आक्रामक नीति से भविष्य की वैश्विक आर्थिक व्यवस्था की रूपरेखा बदलने लगी है।

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