चंद्रपुर में वर्धा नदी का बहाव घटा, उद्योगों पर पानी की किल्लत का साया
इस साल कम बारिश से पैदा हुआ पानी का संकट अब खेती के बाद उद्योगों तक पहुंचने का खतरा है।
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चंद्रपुर जिले में इस साल बहुत कम बारिश हुई है। इसकी वजह से पानी की किल्लत पैदा हो गई है और अब आशंका है कि यह संकट खेती के बाद उद्योगों को भी अपनी चपेट में ले लेगा। खास तौर पर वर्धा नदी के पानी पर निर्भर चंद्रपुर जिले के कई बड़े उद्योगों पर जल संकट का गहरा साया पड़ गया है। नदी में पानी का बहाव घटने से आने वाले दिनों में उद्योगों के उत्पादन पर असर पड़ने का डर जताया जा रहा है।
चंद्रपुर जिले में उद्योग, कोयला खदानें और खेती, तीनों के लिए वर्धा नदी को अहम जलस्रोत माना जाता है। चंद्रपुर, ताडाली, घुग्घुस, वरोरा और बल्लारपुर के साथ चंद्रपुर शहर के एमआईडीसी इलाके के कई उद्योगों की पानी की जरूरत इसी नदी से पूरी होती है।
पानी का संकट गहराने से पहले ही उसके नियोजन के लिए जिला प्रशासन, एमआईडीसी प्रशासन, अलग-अलग उद्योगों के प्रबंधन और औद्योगिक संगठनों के बीच बैठकों का दौर शुरू हो गया है। उद्योगों से कहा जा रहा है कि वे पानी किफायत से इस्तेमाल करें, और जो पानी उपलब्ध है उसे संभालकर खर्च करने पर जोर दिया जा रहा है। फिर भी अगर नदी में पानी की उपलब्धता और घटी, तो औद्योगिक उत्पादन पर गंभीर असर पड़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
उद्योग क्षेत्र में पानी की बढ़ती जरूरत और घटती उपलब्धता को देखते हुए एमआईडीसी प्रशासन ने पानी बचाने के उपाय शुरू कर दिए हैं। उद्योग परिसर में पानी किफायत से इस्तेमाल करने की हिदायत दी जा रही है। साथ ही नवंबर महीने से सभी संबंधित उद्योगों की पानी की सप्लाई हफ्ते में एक दिन पूरी तरह बंद रखने के विकल्प पर भी विचार चल रहा है।
इस बीच वर्धा नदी पर धानोरा इलाके में बैरेज बनाने का प्रस्ताव कई साल से अटका हुआ है, और यह मुद्दा फिर चर्चा में आ गया है। यह बैरेज बन गया होता तो उद्योग क्षेत्र को पानी मिलने के साथ-साथ चंद्रपुर शहर के पीने के पानी की समस्या में भी कुछ हद तक राहत मिल सकती थी। लेकिन प्रस्ताव जमीन पर नहीं उतरा, इसलिए पानी के भंडारण और नियोजन का सवाल जस का तस बना हुआ है।
इस साल वर्धा नदी में बाढ़ के हालात भी बने थे। मगर पानी रोककर रखने के लिए जरूरी बैरेज न होने से बाढ़ का बड़ा हिस्सा आगे बह गया। वह पानी वैनगंगा और प्राणहिता नदियों के रास्ते गोदावरी नदी में जा मिला। अब फिर यह बात उठ रही है कि बारिश के मौसम में मिलने वाले पानी को जमा करके गर्मियों में और किल्लत के दिनों में काम में लाया जा सकता था।
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