ब्रह्मपुरी की आश्रम शाला में 12वीं के छात्रों को मिलीं प्रतियोगी परीक्षा की किताबें
ब्रह्मपुरी की अनुदानित आश्रम शाला में 12वीं के विद्यार्थियों को स्पर्धा पुस्तकें बांटी गईं और नशामुक्ति पर मार्गदर्शन दिया गया।
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ब्रह्मपुरी की अनुदानित माध्यमिक और उच्च माध्यमिक आश्रम शाला में 12वीं के विद्यार्थियों को स्पर्धा पुस्तकें बांटी गईं। इसी मौके पर बच्चों को नशामुक्ति के बारे में भी मार्गदर्शन दिया गया।
यह किताबें मानवकुटी जीवन संशोधन केंद्र की ओर से दान के तौर पर दी गईं। केंद्र के अध्यक्ष प्राचार्य डॉ. संजय प्रभाकरराव हर्षे ने 2 अक्टूबर यानी गांधी जयंती सप्ताह के अवसर पर वडसा रोड स्थित अनुदानित माध्यमिक और उच्च माध्यमिक आश्रम शाला (श्री रमेशजी आमले) के 12वीं के लड़के-लड़कियों को 05/10/2026 को ये पुस्तकें बांटीं। इस तरह उन्होंने समाजसेवा की एक मिसाल पेश की।
डॉ. हर्षे हुतात्मा गोपालराव हर्षे के पोते हैं। वे समाजसेवक और कलाकार हैं और उन्हें दादासाहेब फाल्के पुरस्कार, महात्मा गांधी नोबेल पीस अवार्ड और इंटरनेशनल शांतिदूत समाजरत्न पुरस्कार मिल चुके हैं। वे अभिनेता, पत्रकार, शिक्षणतज्ज्ञ और साहित्यकार भी बताए गए हैं, साथ ही हेल्थकेयर योगा, नेचुरोपैथी, एस्ट्रोलॉजी, न्यूमरोलॉजी और सेल्फ हिप्नोसिस से भी जुड़े हैं।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि ब्रह्मपुरी की उपविभागीय दंडाधिकारी हर्षा पर्वनी और ब्रह्मपुरी नगर परिषद के मुख्याधिकारी डॉ. सलामे थे। अध्यक्षता गो.वा. कॉलेज नागभीड़ के पूर्व प्राचार्य देवीदासजी जगनाडे ने की। कै. विठोबाजी आमले आदिवासी शिक्षण संस्था, ब्रह्मपुरी के अध्यक्ष रमेशजी आमले भी प्रमुख रूप से मौजूद थे। किताबों का वितरण इन्हीं की मौजूदगी में और इन्हीं के हाथों से हुआ।
सभी प्रमुख वक्ताओं ने खास तौर पर इस बात पर रोशनी डाली कि नशे की लत का बुरा असर इंसान पर खुद, उसके परिवार और समाज पर कैसे पड़ता है। मुख्य अतिथियों और अध्यक्ष ने अपने भाषणों में स्पर्धा पुस्तकों की अहमियत बताई। उन्होंने विस्तार से समझाया कि MPSC और UPSC की परीक्षाएं देकर विद्यार्थी सरकारी अधिकारी कैसे बन सकते हैं।
प्रस्तावना और मेहमानों का परिचय पूर्व प्राचार्य डॉ. संजय हर्षे ने दिया। संचालन प्रा. देशपांडे सर ने किया और आभार प्रदर्शन प्रा. धकाते सर ने। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ।
पिछले साल भी डॉ. संजय हर्षे ने गांधी जयंती के दिन एक समाज के काम आने वाला उपक्रम चलाया था। तब उन्होंने ख्रिस्तानंद हॉस्पिटल और सरकारी हॉस्पिटल के बुजुर्ग और जरूरतमंद मरीजों को "गांधी काठी" दान में दी थी।