अमरावती में कपास की रिकॉर्ड बुआई, पर बारिश की कमी से किसान चिंता में
पिछले साल अच्छा भाव मिलने से अमरावती जिले के किसानों ने इस बार कपास की रिकॉर्ड बुआई की, लेकिन बारिश की तंगी से फसल और पैदावार पर असर का डर है।
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अमरावती जिले में कपास उगाने वाले किसानों के चेहरे पर इस बार खुशी की जगह चिंता साफ दिख रही है। 7 अक्टूबर को विश्व कपास दिवस मनाया जाता है, और उसी मौके पर जिले के किसान अपनी फसल को लेकर फिक्रमंद हैं। वजह यह है कि बारिश ने इस साल पीठ फेर ली है।
किसानों के लिए कपास सिर्फ एक फसल नहीं है। यह साल भर की मेहनत और उम्मीद की सफेद रसीद है, इसीलिए इसे 'सफेद सोना' कहा जाता है। पिछले साल कपास को अच्छा भाव मिला था और किसानों को इससे काफी राहत मिली थी। उसी भरोसे में किसानों ने इस साल बड़ी उम्मीद के साथ कपास की रिकॉर्ड बुआई कर दी।
पिछले सीजन के अच्छे दाम की वजह से इस बार जिले में कपास का रकबा बढ़ा। शुरुआत में फसल की हालत ठीक-ठाक दिख रही थी। लेकिन अब बारिश की बड़ी कमी हो गई है और कपास के लिए जरूरी पानी बेवक्त और अनियमित रहा है। इससे पौधों की बढ़त और उम्मीद के मुताबिक पैदावार पर असर पड़ने का डर पैदा हो गया है। किसानों की उम्मीदों को इससे झटका लगा है।
कपास का दायरा खेत तक ही नहीं है। किसानों से लेकर जिनिंग-प्रेसिंग उद्योग, ट्रांसपोर्ट और कपड़ा उद्योग तक रोजगार की एक लंबी चेन इस फसल से जुड़ी है। कपास पांचों महाद्वीपों के 75 से ज्यादा देशों में उगाया जाता है और पूरी दुनिया में इसका व्यापार होता है। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सहारा है और लाखों परिवारों की रोजी-रोटी का जरिया भी।
विश्व कपास दिवस का इतिहास भी दिलचस्प है। बेनिन, बुर्किना फासो, चाड और माली, इन चार 'कॉटन-4' देशों की पहल से इस दिन का विचार आगे बढ़ा। विश्व व्यापार संगठन ने 7 अक्टूबर 2019 को पहली बार यह दिन मनाया। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2021 में 7 अक्टूबर को आधिकारिक तौर पर विश्व कपास दिवस घोषित कर दिया।
यह दिन इसलिए मनाया जाता है कि कपास उगाने वालों को आर्थिक स्थिरता मिले, उत्पादन टिकाऊ बने और विकासशील देशों के कपास किसान मजबूत हो सकें। मगर इन मकसदों का असली फायदा तभी दिखेगा, जब कपास उगाने वाले को पक्का बाजार, सही दाम, लागत के हिसाब से भरपाई और कुदरती आफत में असरदार मदद मिले।