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18:48 IST

7 अक्टूबर को मनाया जाता है विश्व कपास दिवस, जानिए 'सफेद सोने' की अहमियत

हर साल 7 अक्टूबर को दुनिया भर में विश्व कपास दिवस मनाया जाता है। कपास सिर्फ कपड़ों तक सीमित नहीं, यह अर्थव्यवस्था और करोड़ों किसान परिवारों की रोज़ी का आधार है।

7 अक्टूबर को मनाया जाता है विश्व कपास दिवस, जानिए 'सफेद सोने' की अहमियत तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

हर साल 7 अक्टूबर को दुनिया भर में 'विश्व कपास दिवस' (World Cotton Day) मनाया जाता है। कपास सिर्फ कपड़े बनाने के काम नहीं आती। यह दुनिया की अर्थव्यवस्था, व्यापार और करोड़ों किसान परिवारों की रोज़ी-रोटी की रीढ़ है। इसकी इतनी उपयोगिता और कीमत है कि इसे इज़्ज़त से "सफेद सोना" (White Gold) कहा जाता है।

इस दिन का मकसद साफ है। कपास का सामाजिक और आर्थिक महत्व दुनिया के मंच पर सामने रखना, कपास उगाने वाले किसानों की मेहनत का सम्मान करना और इस सेक्टर की चुनौतियों से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना।

इस दिवस की शुरुआत 2019 में हुई। बेनिन, बुर्किना फासो, चाड और माली, इन चार अफ्रीकी देशों ने, जिन्हें 'कॉटन-4' के नाम से जाना जाता है, संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन (FAO) और विश्व व्यापार संगठन (WTO) के सामने कपास के लिए एक खास दिन घोषित करने का प्रस्ताव रखा था। इस प्रस्ताव को दुनिया भर से अच्छा रिस्पॉन्स मिला और संयुक्त राष्ट्र ने आधिकारिक तौर पर 7 अक्टूबर को 'विश्व कपास दिवस' के रूप में मान्यता दे दी। तब से हर साल यह दिन खेती और उद्योग से जुड़े लोगों को एक मंच पर लाने का ज़रिया बन गया है।

कपास सिर्फ कुदरती रेशा नहीं है, यह ऐसी फसल है जिसका कोई हिस्सा बेकार नहीं जाता। सूत कातने और कपड़ा बनाने में इसका सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होता है। इसके अलावा कपास के बीज (बिनौला) से खाने का तेल निकलता है, जो खाना पकाने और अलग-अलग फूड प्रोसेसिंग में काम आता है। तेल निकालने के बाद जो खली (Cottonseed Cake) बचती है, वह पशुओं के लिए बेहद पौष्टिक और प्रोटीन से भरपूर चारा होती है। मेडिकल सेक्टर में भी सर्जिकल कॉटन, बैंडेज और कई दवाई से जुड़े प्रोडक्ट्स में कपास का भरपूर इस्तेमाल होता है।

भारत जैसे खेती-प्रधान देश में कपास की अहमियत बहुत ज़्यादा है। भारत दुनिया के सबसे बड़े कपास उत्पादक और खपत करने वाले देशों में से एक है। महाराष्ट्र का विदर्भ और मराठवाड़ा, गुजरात, तेलंगाना, पंजाब और राजस्थान, इन राज्यों की ग्रामीण अर्थव्यवस्था काफी हद तक कपास की फसल पर टिकी है। महाराष्ट्र में खास तौर पर काली उपजाऊ मिट्टी (Regur Soil) में कपास की भरपूर पैदावार होती है। लाखों किसान, खेत मज़दूर, जिनिंग मिल के कामगार और कपड़ा उद्योग के कर्मचारी, इन सबके घर का चूल्हा इसी सफेद सोने से जलता है।

आज बदलते मौसम के दौर में कपास की खेती के सामने कई चुनौतियां खड़ी हैं। बेमौसम बारिश, कीड़ों का हमला (खासकर बोंड इल्ली यानी बॉलवर्म), बढ़ती लागत और बाज़ार भाव के उतार-चढ़ाव से कपास किसान मुश्किल में आ जाते हैं। ऐसे में विश्व कपास दिवस ऑर्गेनिक कपास (Organic Cotton) की पैदावार और टिकाऊ खेती (Sustainable Agriculture) अपनाने का संदेश देता है। कम पानी का इस्तेमाल, रासायनिक खाद का नियंत्रित उपयोग और फसलों की सही अदला-बदली करके ज़मीन की उपजाऊ ताकत बचाए रखना आज की ज़रूरत बन गई है।

दुनिया भर में ऑर्गेनिक कपास की मांग तेज़ी से बढ़ रही है, क्योंकि ग्राहक अब पर्यावरण के अनुकूल और त्वचा के लिए अच्छे (Skin-friendly) कपड़े पसंद कर रहे हैं। इस अंतरराष्ट्रीय दिन पर दुनिया का समुदाय कपास किसानों को सही बाज़ार, आधुनिक तकनीक और वाजिब भाव दिलाने के लिए प्रतिबद्ध होता है। कपास का भविष्य सुरक्षित करने का मतलब सिर्फ एक फसल को बचाना नहीं है, बल्कि उससे जुड़े करोड़ों लोगों को आर्थिक स्थिरता देना है।

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