अमेरिकी मध्यावधी नतीजों से ट्रम्प को झटका, पाकिस्तान में असिम मुनीर की बढ़ी बेचैनी
अमेरिका के मध्यावधी चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी को झटका लगा है और उसका असर पाकिस्तान के सियासी और फौजी हलकों तक पहुंच गया है।
अमेरिका के मध्यावधी चुनाव (US Midterms) के नतीजे आ गए हैं। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी को इनमें बड़ा सियासी झटका लगा है। इसकी गूंज सिर्फ वॉशिंग्टन तक नहीं रही, पाकिस्तान के राजनीतिक और फौजी हलकों में भी सुनाई देने लगी है।
पिछले दो साल से पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असिम मुनीर ट्रम्प प्रशासन से सीधा और निजी रिश्ता बनाने में पूरा जोर लगाते रहे हैं। अब अमेरिकी कांग्रेस में डेमोक्रेटिक पार्टी की ताकत बढ़ गई है। ऐसे में इस्लामाबाद की व्हाइट हाउस से सीधी पहुंच और उसका असर कमजोर पड़ने के साफ संकेत दिख रहे हैं। इस अचानक बदलाव से पाकिस्तान की विदेश नीति पूरी तरह डगमगा गई है।
विश्लेषकों के मुताबिक अमेरिका के इन नतीजों की सबसे ज्यादा मार पाकिस्तान के फौजी नेतृत्व पर पड़ेगी। ट्रम्प का दूसरा कार्यकाल शुरू होते ही पाकिस्तान ने अमेरिका के करीब जाने में गैर-मामूली जल्दबाजी दिखाई थी और इसमें मुख्य कड़ी असिम मुनीर ही थे। जून 2025 में मुनीर ने व्हाइट हाउस में ट्रम्प के साथ एक खास लंच में हिस्सा लिया था। उस अहम मुलाकात में पाकिस्तान सरकार का कोई भी सिविल अफसर मौजूद नहीं था। इससे साबित हुआ कि अमेरिका से रिश्ते संभालने की पूरी कमान पाकिस्तानी फौज के हाथ में थी।
पाकिस्तानी फौज के दावे के मुताबिक यह बातचीत सिर्फ आतंकवाद विरोधी या सुरक्षा सहयोग तक सीमित नहीं थी। उसमें खनन, ऊर्जा और क्रिप्टोकरेंसी जैसे आर्थिक क्षेत्र भी शामिल थे। इसी नजदीकी के तहत पाकिस्तान आगे चलकर ट्रम्प के 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल हुआ और उसने ट्रम्प को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित भी किया। मई 2025 में पाकिस्तान ने दावा किया था कि भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव घटाने में ट्रम्प ने भूमिका निभाई। हालांकि भारत ने किसी भी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता के प्रस्ताव को साफ तौर पर ठुकरा दिया था।
पाकिस्तान की मुश्किलें सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं हैं। अब कारोबारी जांच का खतरा भी मंडरा रहा है। पाकिस्तान ने ट्रम्प के करीबियों और परिवार से जुड़ी कंपनियों के साथ कई बड़े सौदे किए हैं। ट्रम्प से जुड़ी वर्ल्ड लिबर्टी फाइनेंशियल के 'USD1 स्टेबलकॉइन' से अंतरराष्ट्रीय लेनदेन की संभावना पर पाकिस्तान ने समझौता ज्ञापन पर दस्तखत किए थे। इसके अलावा मैनहट्टन के ऐतिहासिक रूजवेल्ट होटल के पुनर्विकास का प्रोजेक्ट हो या ड्रोन बनाने वाली कंपनी 'पॉवरस' (Powerus) से फौजी साजो-सामान की खरीद, इन सभी सौदों में ट्रम्प के बेटों डोनाल्ड जूनियर और एरिक ट्रम्प का निवेश है। अब कांग्रेस में डेमोक्रेट्स का दबदबा बढ़ने से ट्रम्प परिवार के साथ हुए इन संदिग्ध और लेनदेन वाले सौदों की कड़ी जांच होने की पूरी संभावना जताई जा रही है। पूर्व राजदूत हुसैन हक्कानी के मुताबिक पाकिस्तान के ये सौदे बस फौरी स्वार्थ के थे और अमेरिका के बदलते समीकरणों में ये करार ज्यादा दिन नहीं टिक पाएंगे।
एक तरफ कूटनीतिक झटका है, तो दूसरी तरफ ईरान-अमेरिका और इस्राइल के बीच संघर्ष की वजह से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था चरमराने की कगार पर है। करीब 24 करोड़ की आबादी वाला पाकिस्तान ऊर्जा और तेल की जरूरत के लिए पूरी तरह आयात पर निर्भर है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम आसमान छू रहे हैं और आम पाकिस्तानी महंगाई से झुलस रहे हैं।
कराची के रहने वाले सज्जाद अली और असिम जफर जैसे आम लोगों को उम्मीद थी कि ट्रम्प की नीतियों से कुछ अच्छा बदलाव होगा। लेकिन अमेरिका की मध्यस्थता के बाद भी पाकिस्तान को कोई ठोस आर्थिक राहत नहीं मिली है। यूएस एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट बैंक ने रेको दीक तांबा और सोना प्रोजेक्ट के लिए 1.25 अरब डॉलर मंजूर किए हैं। मगर यूएस ट्रेजरी से जिस 10 अरब डॉलर की इमरजेंसी आर्थिक मदद की उम्मीद थी, उस पर अमेरिका ने अब तक कोई साफ रुख नहीं अपनाया है।
अटलांटिक काउंसिल के जानकार माइकल कुगेलमन के मुताबिक पाकिस्तान के पास अब भी आतंकवाद विरोधी सहयोग और ईरान से बातचीत में बिचौलिए की भूमिका जैसे कुछ अहम मुद्दे हैं। इन्हें अमेरिका की रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक, दोनों पार्टियों का समर्थन हासिल है। मगर पाकिस्तान की सबसे बड़ी चूक यह रही कि उसने अपनी पूरी विदेश नीति सिर्फ डोनाल्ड ट्रम्प और व्हाइट हाउस पर टिका दी। अब वॉशिंग्टन में सियासी ताकत डेमोक्रेट्स की तरफ झुक रही है, इसलिए इस्लामाबाद को अपना असर बनाए रखने के लिए पूरी रणनीति बदलनी पड़ेगी।
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