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40 लाख रुपये के चेक बाउंस केस में नागपुर की अदालत से अशोक पोतभरे बरी

सनफ्लैग आयरन एंड स्टील कंपनी की शिकायत पर चल रहे मामले में अदालत ने श्री हनुमान मिनरल्स के प्रोपराइटर को बरी किया।

40 लाख रुपये के चेक बाउंस केस में नागपुर की अदालत से अशोक पोतभरे बरी तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

नागपुर की अदालत ने 40 लाख रुपये के चेक बाउंस मामले में श्री हनुमान मिनरल्स के प्रोपराइटर अशोक पोतभरे को बरी कर दिया है। यह शिकायत सनफ्लैग आयरन एंड स्टील कंपनी लिमिटेड ने परक्राम्य लिखत अधिनियम (Negotiable Instruments Act) की धारा 138 के तहत दायर की थी। विशेष न्यायाधीश, धारा 138 एनआई एक्ट, नागपुर के न्यायाधीश श्री ए.वी. डखोरे ने यह फैसला सुनाया।

न्यायाधीश ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं। शिकायत करने वाली कंपनी के गवाह की जिरह में जो बातें सामने आईं और बचाव पक्ष ने जो दस्तावेज पेश किए, उन पर भी विचार किया गया। इसके बाद आरोपी को बरी करने का फैसला हुआ।

कंपनी का आरोप था कि मैंगनीज अयस्क की प्रोसेसिंग के कारोबारी लेन-देन के बाद आरोपी पर 40 लाख रुपये की कानूनी देनदारी बनती थी और चेक उसी के भुगतान के लिए जारी किया गया था। बचाव पक्ष ने अदालत में कहा कि चेक सुरक्षा के तौर पर दिया गया था, किसी सिद्ध कानूनी देनदारी के भुगतान के लिए नहीं। उसने कंपनी के गवाह की जानकारी, कथित समझौते के दस्तावेजों और कंपनी के साक्ष्यों पर भी सवाल उठाए।

शिकायत के मुताबिक विवाद की जड़ 2013 का कारोबारी समझौता था। उस साल सनफ्लैग आयरन एंड स्टील कंपनी लिमिटेड और श्री हनुमान मिनरल्स के बीच मैंगनीज अयस्क को प्रोसेस कर सिलिको मैंगनीज बनाने का करार हुआ था। कंपनी का आरोप था कि उसने इसके लिए कुल 857.135 मीट्रिक टन मैंगनीज अयस्क दिया था।

कंपनी के मुताबिक तैयार सिलिको मैंगनीज में से आरोपी की ओर से कथित तौर पर सिर्फ 40.530 मीट्रिक टन ही लौटाया गया। उसका आरोप था कि बाकी 735.545 मीट्रिक टन मैंगनीज अयस्क वापस नहीं हुआ। कंपनी का कहना था कि समझौते के हिसाब से सामग्री लौटाना आरोपी की जिम्मेदारी थी, पर कथित तौर पर ऐसा नहीं हुआ। फिर बकाया सामग्री और उसकी कीमत को लेकर विवाद बढ़ा और भुगतान के दावे तक पहुंच गया।

शिकायत में यह भी आरोप है कि 2014 में विवाद सुलझाने के लिए दोनों पक्षों की बैठक हुई। कंपनी के अनुसार उसमें आरोपी ने कथित तौर पर बची हुई मैंगनीज सामग्री लौटाने की सहमति दी थी। शिकायतकर्ता का आरोप था कि इसके बाद भी सामग्री वापस नहीं की गई।

कंपनी ने दावा किया कि इसके बाद आरोपी ने कथित बकाया के भुगतान के लिए 40 लाख रुपये का चेक दिया। बैंक में लगाने पर चेक अनादरित हो गया। शिकायत में कहा गया कि कंपनी ने कानूनी नोटिस भेजकर भुगतान मांगा, पर रकम नहीं मिली। इसी आधार पर उसने धारा 138 के तहत शिकायत दायर की। कंपनी ने 40 लाख रुपये की मूल रकम के अलावा मुआवजे समेत कुल 80 लाख रुपये दिलाने की मांग भी की थी।

आरोपी अशोक पोतभरे की ओर से अधिवक्ता कमल सतुजा, अधिवक्ता कैलाश दोदानी और अधिवक्ता अकबर शेख ने पैरवी की। बचाव पक्ष का कहना था कि आरोपी को गलत तरीके से फंसाया गया। चेक सिर्फ सुरक्षा के लिए दिया गया था और बाद में कंपनी ने उसे आरोपी के खिलाफ इस्तेमाल किया। अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि सिर्फ चेक जारी होने और अनादरित होने से 40 लाख रुपये की देनदारी अपने आप साबित नहीं हो जाती। साबित करने के लिए शिकायतकर्ता को जरूरी साक्ष्य देने होते हैं।

बचाव पक्ष ने कहा कि जिस कथित कारोबारी समझौते और बाद की बैठक का हवाला दिया गया, उनके दस्तावेजों से 40 लाख रुपये की देनदारी स्थापित नहीं होती। इसके समर्थन में उसने संबंधित पत्राचार और दूसरे दस्तावेजों की ओर अदालत का ध्यान दिलाया। उसके अनुसार कंपनी के एक पत्र और आरोपी के जवाब से सामने आता है कि चेक सुरक्षा के लिए दिया गया था।

सुनवाई में कंपनी ने अपने एक अधिकृत प्रतिनिधि को गवाह के तौर पर पेश किया। कंपनी की ओर से अधिवक्ता दिलीप डागा ने पैरवी की। बचाव पक्ष ने जिरह में गवाह की जानकारी पर सवाल उठाए। उसकी दलील के अनुसार गवाह ने माना कि उसे कंपनी और आरोपी के बीच हुए मूल लेन-देन की सीधी जानकारी नहीं थी।

बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि कथित वर्क ऑर्डर और समझौते की शर्तों पर कंपनी के दूसरे अधिकारी जगिश झा के दस्तावेजों पर दस्तखत बताए गए, लेकिन उन्हें गवाह के रूप में पेश नहीं किया गया। अधिवक्ताओं का तर्क था कि इससे कंपनी के साक्ष्यों के पर्याप्त होने पर सवाल खड़ा होता है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और बॉम्बे हाईकोर्ट के कई फैसलों का हवाला भी दिया और आरोपी को दोषमुक्त करने की मांग की।

इस फैसले के साथ कंपनी की शिकायत पर चली कार्यवाही का नतीजा आरोपी के पक्ष में रहा। फैसले का विस्तृत आदेश और उसमें दर्ज निष्कर्ष उपलब्ध होने पर अदालत के कानूनी आधार ज्यादा साफ होंगे।

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