20 मिली के स्किन सीरम की कीमत हजारों में क्यों होती है, जानिए इसके पीछे की वजहें
नियासिनमाइड, विटामिन सी और हायलुरोनिक एसिड वाले सीरम की छोटी बोतल क्रीम से इतनी महंगी क्यों पड़ती है, इसके पीछे रिसर्च, पैकेजिंग और टेस्टिंग का खर्च है।
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
आजकल Gen-Z हो, मिलेनियल्स हों या अल्फा जनरेशन, हर किसी के स्किनकेयर रूटीन में स्किन सीरम ने अपनी खास जगह बना ली है। बाजार में नियासिनमाइड, विटामिन सी या हायलुरोनिक एसिड जैसे घटकों से भरपूर सीरम की 20 से 30 मिली की छोटी बोतलें कुछ हजार रुपये में मिलती हैं।
आम मॉइश्चराइजर या क्रीम के मुकाबले सीरम की कीमत इतनी ज्यादा क्यों होती है, यह सवाल ग्राहकों के मन में अक्सर उठता है। क्या इन महंगे दामों के पीछे सिर्फ ब्रांड का नाम और लुभावनी पैकेजिंग है, या इसकी कुछ वैज्ञानिक वजहें भी हैं? आइए इसे समझते हैं।
सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि सीरम आखिर होता क्या है। सीरम ज्यादातर पानी या तेल पर बने बहुत हल्के तरल होते हैं। आम मॉइश्चराइजर त्वचा की ऊपरी परत (Epidermis) पर एक सुरक्षा की परत बना देते हैं और त्वचा को हाइड्रेट रखते हैं। इसके उलट सीरम में जो एक्टिव घटक डाले जाते हैं, वे बेहद बारीक होते हैं। वे त्वचा की गहराई (Dermis) तक आसानी से सोख लिए जाते हैं और दाग, झुर्रियों या असमान त्वचा जैसी खास दिक्कतों पर सीधा काम करते हैं।
सीरम के महंगे होने की एक बड़ी वजह उसमें इस्तेमाल होने वाले एक्टिव इंग्रेडिएंट्स हैं। मॉइश्चराइजर में पानी और इमोलिएंट्स की मात्रा ज्यादा होती है, जबकि सीरम में विटामिन सी, हायलुरोनिक एसिड, सेरामाइड्स और रेटिनॉल जैसे घटक ज्यादा मात्रा में और शुद्ध रूप में होते हैं। इस कच्चे माल को खरीदना और उसकी शुद्धता बनाए रखना काफी खर्चीला पड़ता है।
ओटेरिया के संस्थापक विभोर रस्तोगी के मुताबिक, "सीरम की कीमत सिर्फ डिब्बे पर लिखे घटकों से तय नहीं होती, बल्कि उन घटकों के स्रोत, क्वालिटी और उन पर हुई रिसर्च (R&D) पर निर्भर करती है।"
अब हायलुरोनिक एसिड का उदाहरण लीजिए। त्वचा में नमी बनाए रखने के लिए इसका इस्तेमाल होता है, लेकिन बाजार में मिलने वाले सारे हायलुरोनिक एसिड एक जैसे नहीं होते। हाई मॉलिक्यूलर वेट वाला एसिड त्वचा की ऊपरी परत पर ही टिका रहता है, जबकि लो मॉलिक्यूलर वेट वाला बारीक एसिड त्वचा के अंदर तक जाता है। ऐसे बारीक घटक बनाना तकनीक के हिसाब से पेचीदा और बहुत महंगा होता है।
त्वचा की हिफाजत के लिए मल्टी-सेरामाइड कॉम्प्लेक्स और पॉलीपेप्टाइड्स भी डाले जाते हैं। पेप्टाइड्स को चेहरे की झुर्रियां और एक्सप्रेशन लाइन्स घटाने में बहुत असरदार माना जाता है। ये घटक बोटॉक्स जैसे महंगे इलाज का एक सुरक्षित विकल्प बनकर काम करते हैं। ऐसे घटकों का सही मिश्रण तैयार करना भी काफी खर्चीला साबित होता है।
सीरम बनाना सिर्फ घटकों को मिला देने का काम नहीं है। विटामिन सी जैसे घटक हवा और रोशनी के संपर्क में आते ही फौरन ऑक्सीडाइज हो जाते हैं, यानी खराब हो जाते हैं। इसलिए सीरम आखिरी बूंद तक असरदार रहे, इसके लिए वैज्ञानिक रिसर्च करनी पड़ती है।
इसके अलावा सीरम के औषधीय गुण बने रहें, इसके लिए कांच की गहरे रंग की बोतलें (Amber Bottles) या एयरलेस पंप वाली पैकेजिंग इस्तेमाल करनी पड़ती है। यह खास पैकेजिंग बनाने का खर्च बढ़ा देती है। साथ ही सीरम त्वचा के लिए सुरक्षित है या नहीं, यह जांचने के लिए उसे क्लिनिकल टेस्ट और लैब टेस्ट से गुजरना पड़ता है, जिसका सीधा असर आखिरी कीमत पर पड़ता है।
तो क्या महंगा सीरम खरीदना वाकई फायदे का सौदा है? एक बार में सीरम की सिर्फ 2 से 3 बूंदें काफी होती हैं, इसलिए 20 मिली की बोतल आराम से 2 से 3 महीने चल जाती है। अगर आप पिगमेंटेशन, वक्त से पहले बुढ़ापे के निशान या रूखेपन जैसी त्वचा की किसी खास दिक्कत का पक्का हल ढूंढ रहे हैं, तो आम क्रीम के बजाय सही सीरम में पैसा लगाना ज्यादा असरदार और नतीजे देने वाला साबित होता है।
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