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पुणे की कोर्ट ने मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विसेज ठेके में 91.04 लाख का आर्बिट्रेशन अवॉर्ड रद्द किया

पुणे की कोर्ट ने मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विसेज ठेके में 91.04 लाख का आर्बिट्रेशन अवॉर्ड रद्द किया तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
पढ़ाई PT24 टीम

पुणे की जिला वाणिज्यिक कोर्ट ने यूनियन ऑफ इंडिया की याचिका आंशिक रूप से मंज़ूर की और अवॉर्ड का बाकी हिस्सा कायम रखा।

पुणे, 7 नवंबर 2026: पुणे की जिला वाणिज्यिक कोर्ट (District Commercial Court) ने यूनियन ऑफ इंडिया की याचिका आंशिक रूप से मंज़ूर कर ली है। याचिका में आर्बिट्रेशन अवॉर्ड को चुनौती दी गई थी। मामला आर्म्ड फोर्सेज मेडिकल कॉलेज (AFMC), पुणे में स्टोर एकोमोडेशन बनाने के 5.34 करोड़ रुपये के ठेके से जुड़ा है, जो कनिका कंस्ट्रक्शन कंपनी को दिया गया था।

कोर्ट ने अवॉर्ड में से 91,04,711.34 रुपये रद्द कर दिए। इसकी वजह पेटेंट इलीगैलिटी बताई गई और यह भी कहा गया कि ठेकेदार को दी गई कुछ रकम ठेके की शर्तों के खिलाफ थी। अवॉर्ड का बाकी हिस्सा कोर्ट ने कायम रखा। यह फैसला 6 नवंबर 2026 को डिस्ट्रिक्ट जज-2 (कमर्शियल कोर्ट) एस. एस. कंठाले ने सिविल मिसलेनियस एप्लीकेशन नंबर 1071/2016 में सुनाया।

चीफ इंजीनियर, पुणे ज़ोन के ज़रिए यूनियन ऑफ इंडिया ने आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट, 1996 की धारा 34 के तहत कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था। वह 18 जुलाई 2016 के अवॉर्ड को रद्द कराना चाहता था, जिसे बाद में 17 अगस्त 2016 को सुधारा गया था।

विवाद की शुरुआत 5 मार्च 2009 को M/s कनिका कंस्ट्रक्शन कंपनी को 5.34 करोड़ रुपये में दिए गए ठेके से हुई। प्रोजेक्ट में AFMC, पुणे में BTD, MED और QM स्टोर्स के लिए तीन विंग वाली दो मंज़िला इमारत और उससे जुड़े काम शामिल थे। मूल डेडलाइन आगे बढ़ने के बाद ठेकेदार ने 28 दिसंबर 2011 को काम पूरा किया। फिर उसने कई दावे किए, जो आर्बिट्रेशन में भेजे गए।

यूनियन ऑफ इंडिया ने अवॉर्ड के तीन हिस्सों को चुनौती दी: नींव की मिट्टी की परत बदलने से खुदाई का अतिरिक्त खर्च, खुली छतों पर वाटरप्रूफिंग ट्रीटमेंट, और सामग्री, मज़दूरी व ईंधन के दामों में फ़र्क की भरपाई।

खुदाई के दावे में ठेकेदार को 17.31 लाख रुपये मिले थे। कोर्ट ने कहा कि चट्टान में खुदाई के रेट तय करने का तरीका ठेके में पहले से था, यानी डेविएशन ऑर्डर के ज़रिए MES शेड्यूल रेट और उस पर 55%। विभाग का 9.26 लाख रुपये का आकलन विवादित नहीं था। इसलिए इस हिस्से से 8,05,631.89 रुपये रद्द हुए और विभाग का आकलन बरकरार रहा।

वाटरप्रूफिंग के लिए आर्बिट्रेटर ने ठेकेदार को 47.84 लाख रुपये दिए थे। कोर्ट ने देखा कि शेड्यूल ऑफ फिनिशेज, स्ट्रक्चरल ड्रॉइंग और संबंधित स्पेसिफिकेशन समेत ठेके के दस्तावेज़ों में वाटरप्रूफिंग मूल लंपसम ठेके का ही हिस्सा थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि संयुक्त वर्क यार्डस्टिक बनाते समय ठेकेदार ने खुद वाटरप्रूफिंग को शामिल किया था और 21 रनिंग अकाउंट बिलों में उसी आधार पर भुगतान लिया था।

कोर्ट के मुताबिक आर्बिट्रेटर ने अहम दस्तावेज़ नज़रअंदाज़ किए और दावे के 24.89 लाख रुपये पर विभाग की आपत्ति का ठीक से जवाब नहीं दिया। आरोप था कि यह रकम सबूतों से साबित नहीं होती। इसलिए इस हिस्से का पूरा 47,84,085 रुपये का अवॉर्ड रद्द कर दिया गया।

तीसरा हिस्सा 35.14 लाख रुपये के एस्केलेशन दावे का था। कोर्ट ने कहा कि ठेके की जनरल कंडीशंस ऑफ कॉन्ट्रैक्ट की कंडीशन 63 में प्राइस वैरिएशन का इंतज़ाम है और किसी दूसरे तरीके की इजाज़त नहीं है। आर्बिट्रेटर ने 2007 के मैन्युअल ऑन कॉन्ट्रैक्ट्स के एम्पिरिकल फॉर्मूले पर भरोसा किया था, जो विभाग का अंदरूनी निर्देश था और करार में शामिल नहीं किया गया था।

फैसले में दर्ज है कि ठेकेदार न तो प्राइस वैरिएशन की शर्तों का पालन साबित कर सका, न ही बही-खाते और असल भुगतान के सबूत पेश कर सका। कोर्ट ने यह भी कहा कि अवॉर्ड अपने आप में विरोधाभासी था, क्योंकि आर्बिट्रेटर ने ठेके की अवधि बढ़ने के अलग दावे को खारिज किया, फिर भी बढ़ी हुई अवधि के लिए एस्केलेशन मंज़ूर कर दिया। इसलिए इस हिस्से के 35,14,994.45 रुपये भी रद्द हुए।

इन नतीजों के साथ कोर्ट ने क्लेम नंबर 1 के तहत दी गई रकम 91.04 लाख रुपये घटा दी। खुदाई और वाटरप्रूफिंग के जो हिस्से नामंज़ूर हुए, उन पर लगा ब्याज भी रद्द हुआ। एस्केलेशन की रकम पर आगे कोई ब्याज नहीं देना होगा।

बाकी हिस्से में कोर्ट ने दखल नहीं दिया। इसमें दूसरे दावे और आर्बिट्रेटर का 12% सालाना साधारण ब्याज देने का फैसला शामिल है। कोर्ट ने कहा कि यूनियन ऑफ इंडिया के बाकी आधार धारा 34 के तहत दखल के लायक नहीं थे। अवॉर्ड का बचा हिस्सा कायम रहेगा और दोनों पक्ष अपना-अपना कानूनी खर्च खुद उठाएंगे।

यूनियन ऑफ इंडिया की ओर से एडवोकेट के. डी. रत्नपारखी पेश हुए। कनिका कंस्ट्रक्शन कंपनी और एकमात्र आर्बिट्रेटर समेत प्रतिवादियों की ओर से एडवोकेट बी. ए. भोगल ने पैरवी की।

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