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मानसिक सेहत सबकी जिम्मेदारी है, शुरुआत रोज की हमदर्दी से

मानसिक सेहत सबकी जिम्मेदारी है, शुरुआत रोज की हमदर्दी से तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
सेहत PT24 टीम

गायत्री क्षीरसागर का कहना है कि मानसिक सेहत पर बातचीत एक महीने या एक कैंपेन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।

पुणे, 31 अक्टूबर 2026: अक्टूबर को मेंटल हेल्थ अवेयरनेस मंथ माना जाता है। यह महीना अभी बीता है, लेकिन गायत्री क्षीरसागर का कहना है कि मानसिक सेहत पर बातचीत किसी एक महीने, एक कैंपेन या एक जागरूकता दिवस तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उनके मुताबिक इसे पूरे साल हमारी तवज्जो, हमदर्दी और कदम मिलने चाहिए।

वे कहती हैं कि दिमागी सुकून सिर्फ इस बात से तय नहीं होता कि हम कैसा महसूस करते हैं। हम जिस माहौल में बड़े होते हैं, जो रिश्ते बनाते हैं और लोग हमारे साथ जैसा बर्ताव करते हैं, उसका भी इसमें हाथ होता है।

उन्होंने मिसालें दीं: स्कूल में बुलिंग झेल रहा बच्चा, दोस्तों के दबाव से जूझता किशोर, जिम्मेदारियां संभालते माता-पिता, संस्था की उम्मीदों को संभालता टीचर और दफ्तर की राजनीति से निपटता प्रोफेशनल। चुनौतियां अलग हैं, मगर जरूरत एक ही है: यह महसूस होना कि उनकी बात सुनी जा रही है, उन्हें इज्जत और कद्र मिल रही है।

गायत्री बताती हैं कि हमदर्दी की उनकी समझ कुछ साल पहले के एक तजुर्बे से भी बनी, जब लीला पूनावाला फाउंडेशन - इंडिया ने उन्हें पीस एम्बेसडर चुना था। यूनाइटेड किंगडम के आशा सेंटर में लीडरशिप और सस्टेनेबिलिटी की ट्रेनिंग के दौरान वे अलग-अलग देशों के लोगों से मिलीं, जिनमें ऐसे लोग भी थे जिनकी जिंदगी संघर्ष और जंग से प्रभावित हुई थी। उन बातचीतों से उन्हें समझ आया कि हमदर्दी का मतलब बस अफसोस करना नहीं है, बल्कि अपने से अलग तजुर्बों को समझने की कोशिश करना है।

एक मां के तौर पर, और साइंस कम्युनिकेशन, एजुकेशन, प्रोग्राम मैनेजमेंट और पार्टनरशिप में 12 साल से ज्यादा के अनुभव के साथ, वे अक्सर सोचती हैं कि आसपास का माहौल भावनात्मक सेहत पर कितना असर डालता है। उनका पक्का मानना है कि जवाबदेही और हमदर्दी साथ-साथ चलनी चाहिए।

उनके मुताबिक स्कूलों, दफ्तरों और संस्थाओं में ऐसा माहौल चाहिए जहां लोग अपनी बात रख सकें, इज्जत के साथ असहमत हो सकें, सराहना पा सकें और बिना हतोत्साहित हुए आगे बढ़ सकें। वे पूछती हैं कि जैसे संस्थाओं में POSH पॉलिसी और इंटरनल कमेटियां होती हैं, वैसे ही मानसिक सेहत को भी क्या ढांचे वाली मदद व्यवस्था, पेशेवर सलाह तक पहुंच और एक सही संस्कृति के जरिए गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए?

वे कहती हैं कि पद और हालात बदल सकते हैं, लेकिन हम लोगों को कैसा महसूस कराते हैं और कौन से मौके बनाते हैं, उसका असर लंबे समय तक रहता है। उनके शब्दों में सबसे अच्छे लीडर सिर्फ कामयाब प्रोग्राम या संस्थाएं नहीं खड़ी करते, वे लोगों, भरोसे और मौकों को गढ़ते हैं।

अंत में वे पूछती हैं कि आपके लिए हमदर्दी का क्या मतलब है, और हम इसे अपने स्कूलों, परिवारों और दफ्तरों में ज्यादा सार्थक ढंग से कैसे निभा सकते हैं। उनका संदेश है कि हर महीना हमें हमदर्दी निभाने की याद दिलाए।

गायत्री क्षीरसागर साइंस एजुकेशन और आउटरीच की प्रोफेशनल हैं, जिन्हें STEM एजुकेशन, साइंस कम्युनिकेशन और कैपेसिटी बिल्डिंग में 12 साल से ज्यादा का अनुभव है। उन्होंने खासकर कम सुविधाओं वाले और ग्रामीण इलाकों के विद्यार्थियों के लिए साइंस की पढ़ाई को ज्यादा सुलभ और दिलचस्प बनाने पर काम किया है। उनका काम STEM पहलें तैयार करने और लागू करने, प्रोफेशनल डेवलपमेंट प्रोग्राम से शिक्षकों की क्षमता बढ़ाने, और अनुभव व जिज्ञासा पर आधारित सीख से बच्चों को विज्ञान तलाशने के मौके देने पर केंद्रित है।

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