मंगलवार, 3 नवंबर 2026

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हिंजवडी मेट्रो शुरू होने से पहले धूल, अधूरे फुटपाथ और जाम से जूझ रहे यात्री

हिंजवडी मेट्रो शुरू होने से पहले धूल, अधूरे फुटपाथ और जाम से जूझ रहे यात्री तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
पढ़ाई PT24 टीम

पुणे मेट्रो लाइन 3 का पहला हिस्सा 3 नवंबर को खुलना है, लेकिन बाणेर से हिंजवडी के रास्ते पर निर्माण की मार अब भी दिख रही है।

पुणे मेट्रो लाइन 3 का पहला चालू हिस्सा 3 नवंबर को शुरू होना है। इसे पुणे महानगर क्षेत्र विकास प्राधिकरण (PMRDA) बना रहा है और उसी की निगरानी में काम चल रहा है। बाणेर, बालेवाडी और हिंजवडी के बीच रोज सफर करने वाले हजारों आईटी कर्मचारियों, छात्रों और स्थानीय लोगों को इससे बेहतर सफर की उम्मीद है। लेकिन यात्रियों का कहना है कि हिंजवडी का रास्ता सालों के निर्माण के बाद अब भी धूल, अधूरे फुटपाथ, जाम और टूटी सड़कों से भरा है।

सबसे ज्यादा शिकायत फुटपाथ के अधूरे काम की है, खासकर बाणेर वाले हिस्से में। कई जगह फुटपाथ पूरे नहीं बने या निर्माण की वजह से बंद हैं, इसलिए पैदल चलने वालों को सड़क पर उतरना पड़ता है। स्पीड ब्रेकर के पास हालत और खराब है, क्योंकि वहां फुटपाथ सड़क से बेढंगे तरीके से मिलता है और पास से गाड़ियां निकलती रहती हैं।

आईटी कर्मचारी जेनिल शाह रोज हिंजवडी आते-जाते हैं। उन्होंने बताया, "हर शाम मैं बाणेर से अपनी ऑफिस शटल की तरफ पैदल जाता हूं और कई जगह सही फुटपाथ है ही नहीं। गाड़ियों पर लगातार नजर रखनी पड़ती है, क्योंकि निर्माण ने पैदल चलने की जगह घेर ली है।"

शहरी योजनाकार भी इसे प्रोजेक्ट के अमल का नतीजा मानते हैं। आर्किटेक्ट और अर्बन डिजाइनर आदित्य चावंडे, जो Parisar में सीनियर प्रोग्राम एसोसिएट हैं, के मुताबिक मेट्रो एजेंसी अपने स्टेशनों के आसपास सुविधाएं बनाती है, लेकिन बीच के हिस्सों को भी नए सिरे से डिजाइन करना जरूरी है। उन्होंने कहा, "स्टेशन के पास नए फुटपाथ और एक्सेस सुविधाएं बन जाएं और बाकी सड़क पुराने नक्शे पर ही रहे, तो दोनों हिस्से आपस में मेल नहीं खाते। महानगरपालिका को बीच के हिस्से पूरे करने चाहिए, सिर्फ मेट्रो के नए ढांचे को पुरानी सड़क से जोड़कर छोड़ देना ठीक नहीं।"

कई सड़कों पर धूल की परत जमी है, खासकर जहां सिविल काम अब भी चल रहा है। दोपहिया सवार और साइकिल चलाने वाले सबसे ज्यादा परेशान हैं। उनका कहना है कि धूल से दिखना कम हो जाता है और रोज का सफर मुश्किल हो जाता है। गड्ढों और उखड़ी सतह की वजह से गाड़ियां धीमी चलती हैं और पीक टाइम में लाइन लग जाती है। कई यात्रियों का कहना है कि जाम अब सिर्फ भीड़ के वक्त तक सीमित नहीं रहा, क्योंकि निर्माण से सिकुड़े हिस्सों में गाड़ियां अक्सर रेंगती रहती हैं। यात्री नरेश साहू ने कहा, "कई जगह सड़क ऊबड़-खाबड़ है और गड्ढों के आसपास सबको संभलकर चलना पड़ता है, इसलिए ट्रैफिक धीमा हो जाता है। जो हिस्सा 20 मिनट में निकल जाना चाहिए, उसमें अक्सर काफी ज्यादा वक्त लग जाता है।"

मेट्रो के कई पिलर भी जाम की जगह बन गए हैं, खासकर वहां जहां वे दुकानों के पास हैं। बाणेर रोड के दुकानदारों का कहना है कि कुछ पिलरों से सड़क की असली चौड़ाई कम हो गई है और स्कूल के वक्त ट्रैफिक और बिगड़ता है। निजी स्कूलों के पास यह सबसे साफ दिखता है, जहां दोपहर में बच्चों को लेने आए अभिभावकों की गाड़ियां पिलरों के आसपास से निकलने की कोशिश में लंबी कतार में फंस जाती हैं। एक दुकानदार ने, जिसकी दुकान ऐसे ही एक संकरे मोड़ के सामने है, कहा, "स्कूल छूटते ही सड़क कुछ पिलरों के पास तंग हो जाती है और गाड़ियां जमा हो जाती हैं। ग्राहक रुकने से हिचकते हैं, क्योंकि जगह बची ही नहीं है।" कारोबारियों के मुताबिक पिछले कुछ सालों में लंबे निर्माण से ग्राहकों की आवाजाही घटी है और उन्हें उम्मीद है कि काम खत्म होने पर सड़क बनने से पहुंच आसान होगी।

चावंडे का कहना है कि ये अड़चनें डिजाइन की गहरी दिक्कत दिखाती हैं। उनके मुताबिक सड़क को एक एकीकृत कॉरिडोर की तरह बनाया जाए, तो चलती ट्रैफिक के लिए जगह एक जैसी रहनी चाहिए। स्टेशन के पास दो या तीन लेन की चौड़ाई हो, तो बीच के हिस्से भी उसी हिसाब से बनें। वरना हर स्टेशन पर गाड़ियां चौड़े हिस्से से संकरे में जाती हैं और बार-बार जाम लगता है। उन्होंने यह भी कहा कि मेट्रो का ढांचा अब स्थायी है। उनके शब्दों में, "इसके पिलर सड़क चौड़ी करने के एक और दौर के लिए हटाए नहीं जा सकते। इसलिए सड़क को मौजूदा ढांचे के हिसाब से दोबारा डिजाइन करना होगा। कुल चौड़ाई बढ़ाने से गाड़ियों के लिए इस्तेमाल लायक जगह अपने आप नहीं बढ़ती, क्योंकि मेट्रो ढांचे की जगह वही रहती है।"

माण स्टेशन से सेवा शुरू होने की उम्मीद है, पर स्टेशन का कुछ हिस्सा अब भी अधूरा है। सीढ़ियों का एक तरफ का काम चल रहा है, इसलिए यात्रियों को चिंता है कि सेवा शुरू होने से पहले फिनिशिंग पूरी हो पाएगी या नहीं। यात्री मेट्रो शुरू होने का इंतजार कर रहे हैं, पर चाहते हैं कि पहले दिन से यात्री सुविधाएं पूरी तरह चालू हों। यात्री रिया हिरानी ने कहा, "मेट्रो से हमें जरूर फायदा होगा, लेकिन लोगों को स्टेशन तक सुरक्षित पहुंच भी चाहिए। जब यात्री इस्तेमाल शुरू करें, तब स्टेशन और उसका आसपास का इलाका पूरी तरह तैयार होना चाहिए।"

चावंडे के मुताबिक असली जड़ एजेंसियों के बीच तालमेल की कमी है। उन्होंने कहा, "दिक्कत यह है कि विकास एकीकृत नहीं है। मेट्रो अपना ढांचा बनाती है, सड़क महानगरपालिका संभालती है, पर इन कामों की योजना हमेशा साथ नहीं बनती। जब तक पूरे मेट्रो कॉरिडोर की सड़क नए ढांचे के हिसाब से दोबारा डिजाइन नहीं होगी, ये अड़चनें बनी रहेंगी। इसके लिए सड़क की मालिक सभी एजेंसियों को मिलकर काम करना होगा।" साथ ही उन्होंने चेताया कि सिर्फ मेट्रो को दोष देना ठीक नहीं होगा। उनके मुताबिक मेट्रो का काम स्टेशन बनाना और वहां पहुंचने के लिए जरूरी ढांचा देना है, जबकि उस विकास को बाकी सड़क से जोड़ना महानगरपालिका का काम है। कुछ जगहों पर मेट्रो से गलतियां हुई हो सकती हैं, पर हर रुकावट को पूरी तरह उसी की गलती मान लेने के बजाय हर जगह को ध्यान से परखना चाहिए।

उदाहरण के तौर पर उन्होंने गणेशखिंड रोड का जिक्र किया। वहां मेट्रो की योजना 36 मीटर चौड़ी सड़क के हिसाब से बनी थी, जबकि बाद के रोड-चौड़ीकरण प्रस्ताव में चौड़ाई 45 मीटर कर दी गई। चावंडे ने कहा कि इससे मेट्रो के नक्शे और सड़क के नए नक्शे में फर्क आ गया। उनके मुताबिक चिंता यह थी कि यह जुगाड़ वाली योजना थी, क्योंकि मेट्रो के नीचे की सड़क कैसे चलेगी, इसकी साफ और तालमेल वाली योजना के बिना सड़क चौड़ी की जा रही थी।

अधिकारियों का कहना है कि पूरे कॉरिडोर में सड़क बहाली का काम शुरू हो चुका है। उनके मुताबिक मेट्रो कॉरिडोर के नीचे की सड़कों की मरम्मत अगले 10 दिनों में होने की उम्मीद है। जो स्टेशन 3 नवंबर से चालू होंगे, उन्हें प्राथमिकता दी जा रही है और अधिकारियों ने भरोसा दिया है कि यात्रियों के मेट्रो इस्तेमाल करने से पहले इन स्टेशनों के नीचे की सड़कें पूरी तरह ठीक कर दी जाएंगी। काम में सड़क की सतह सुधारना और निर्माण से खराब हुए हिस्सों को बहाल करना शामिल है।

चावंडे का मानना है कि सिर्फ मरम्मत से बात नहीं बनेगी। उन्होंने कहा, "मेट्रो एजेंसी (महामेट्रो और PMRDA मेट्रो) को अपनी विकास योजनाएं महानगरपालिका को साफ बतानी चाहिए और महानगरपालिका को उन्हें सड़क के डिजाइन में शामिल करना चाहिए। काम पूरे कॉरिडोर पर होना चाहिए, स्टेशनों के बीच के हिस्सों समेत। यानी ट्रैफिक लेन, फुटपाथ, साइकिल सुविधाएं, पैसेंजर ड्रॉप-ऑफ की जगह और ऑटोरिक्शा सुविधाओं की योजना साथ बने, ताकि मेट्रो का ढांचा आवाजाही में रुकावट न बने।" उन्होंने यह भी कहा कि सड़क की बची जगह पैदल चलने वालों, साइकिल सवारों और व्हीलचेयर इस्तेमाल करने वालों के हिसाब से डिजाइन होनी चाहिए।

सालों की परेशानी के बावजूद कई यात्रियों को भरोसा है कि पूरा कॉरिडोर चालू होने पर शिवाजीनगर से हिंजवडी का सफर काफी कम समय में हो सकेगा। फिलहाल रोज सफर करने वालों को धूल भरी सड़कों, अधूरे पैदल ढांचे, जाम और चल रहे निर्माण से ही निपटना पड़ रहा है। बाणेर की रहने वाली एलिना पाटिल ने कहा, "सब समझते हैं कि बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में वक्त लगता है। लेकिन इतने लंबे वक्त तक निर्माण झेलने के बाद लोग अब चाहते हैं कि फिनिशिंग का काम जल्दी पूरा हो, ताकि मेट्रो के फायदे आखिरकार तकलीफों पर भारी पड़ें।"

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