चीनी उद्योग संकट में, हर्षवर्धन पाटील ने कहा अगले साल हालात इससे भी भयावह होंगे
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नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्टरीज के अध्यक्ष हर्षवर्धन पाटील ने सूखे, इथेनॉल पाबंदी और बदलती नीतियों से चीनी की किल्लत की चेतावनी दी और सरकार से मदद मांगी।
देश और महाराष्ट्र का चीनी उद्योग इस वक्त अभूतपूर्व आर्थिक मुश्किलों से गुजर रहा है। पूर्व सहकारिता मंत्री और नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्टरीज के अध्यक्ष हर्षवर्धन पाटील ने चेतावनी दी है कि अगले साल हालात इससे भी भयावह होंगे। उन्होंने इथेनॉल बनाने पर लगी पाबंदियों, चीनी की बढ़ी कीमतों, गन्ना किसानों और चीनी कारखानों पर खुलकर अपनी बात रखी।
पाटील के मुताबिक इथेनॉल को लेकर चली उठापटक से चीनी का गणित पहले ही बदल चुका है। चीनी महंगी हो गई है, और बार-बार बदलती नीतियों व सूखे ने उद्योग के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।
उन्होंने कहा कि गन्ना उगाने वाला किसान और उससे जुड़े सभी लोग मुश्किल में हैं। इस उद्योग को कर्ज देने वाले बैंक और संस्थाएं भी फंस सकती हैं, क्योंकि दिए गए कर्ज की वापसी तय समय में नहीं हो पाएगी। पाटील ने इस बात का डर जताया। एक तरह से उन्होंने पूरे अर्थचक्र पर खतरे की आशंका भी जता दी।
इस साल सूखे ने कई उद्योगों के सामने चुनौती रखी है, और पाटील ने इस पर भी बात की। उनके अनुसार पिछले साल के मुकाबले गन्ने का उत्पादन 25 प्रतिशत कम होगा। उन्होंने कहा कि अब मन में यह शंका उठ रही है कि कहीं चीनी की किल्लत न हो जाए। उनकी मांग है कि किसान को 1 हजार रुपये प्रति टन सीधे अनुदान के तौर पर दिया जाए। उन्होंने सीधा सवाल किया कि अगर किसान ने गन्ना नहीं लगाया तो देश की 280 लाख मीट्रिक टन की जरूरत कौन पूरी करेगा। बाहर के देशों से चीनी मंगाने की बात हो तो भी उसकी लागत काफी ज्यादा होगी। पाटील ने कहा कि अगले साल हालात और बुरे हैं, क्योंकि गन्ने की उस हिसाब से बुवाई ही नहीं हुई है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि देश को 365 दिन में 320 लाख मीट्रिक टन चीनी चाहिए।
इथेनॉल पाबंदी पर पाटील ने सरकार से अपील की। उनका कहना था कि यह किसान का कारोबार है, और अगर हर सीजन में चीनी की नीति बदलती रही तो यह उद्योग टिक नहीं पाएगा। उनके मुताबिक इथेनॉल बढ़ाने की स्कीम सरकार ने खुद निकाली थी। फिर परिपत्र निकालकर कहा गया कि मोलैसेस नहीं लिया जाएगा, तो उत्पादक क्या करेंगे। रेक्टिफाइड स्पिरिट के लिए बाजार नहीं है। पाटील ने कहा कि उद्योग सरकार को 14 हजार करोड़ का रेवेन्यू देता है, लेकिन इस नीति से वह भी बंद हो जाएगा। इसमें सरकार का भी नुकसान है और वित्तीय संस्थाएं मुश्किल में आएंगी। उन्होंने कहा कि इथेनॉल पर पाबंदी सिर्फ कारखानों का मामला नहीं है, इसका झटका पूरे देश की इकॉनमी को लग रहा है। सरकार इसे गंभीरता से देखे और कोई रास्ता निकाले। उन्होंने कहा कि यह अकेला ऐसा उद्योग है जिससे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर कई घटक जुड़े हैं, इसलिए इस मांग पर तुरंत ध्यान दिया जाए।
गन्ना उद्योग के लिए पाटील ने सरकार से ये मांगें रखी हैं:
किसान के खाते में सीधे प्रति टन 1 हजार रुपये का अनुदान दिया जाए।
सॉफ्ट लोन उपलब्ध कराया जाए।
चीनी की एमएसपी को 8 साल हो गए और बढ़ाई नहीं गई, उसे 47 से 48 रुपये किया जाए।
सबसे अहम यह कि इथेनॉल पर लगी पाबंदी के बावजूद कुछ हद तक उत्पादन की इजाजत दी जाए।


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